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देशी प्रेस अधिनियम
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सितंबर 2021
अंग्रेज सरकार द्वारा भारत में सन् 1878 में देशी प्रेस अधिनियम (Vernacular Press Act) पारित किया गया ताकि भारतीय भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं पर और कड़ा नियंत्रण रखा जा सके। उस समय लॉर्ड लिट्टन भारत का वाइसराय था। इस अधिनियम में पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी सामग्री छापने पर कड़ी कार्यवाही का प्रावधान था जिससे जनता में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष पनपने की सम्भावना हो। वस्तुतः यह कानून भाषाई समाचार-पत्रों को दबाने के लिए लाया गया था। देशी प्रेस अधिनियम पारित होने के अगले दिन ही कोलकाता से बंगला में प्रकाशित अमृत बाजार पत्रिका ने अपने को 'अंग्रेजी दैनिक' पत्र बना दिया। इसके सम्पादक शिषिर कुमार घोष थे।
इस अधिनियम के अन्तर्गत सैकड़ों देशी पत्र-पत्रिकाएँ ज़प्त कर ली गयीं। प्रेसों में ताले डाल दिए गए। स्वदेशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने के लिए साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय (1838-1894) ‘आनन्द मठ’ का वन्देमातरम् लेकर आए जो ब्रिटिश शासकों के कोप का कारण बना। मुसलमानों को उकसाकर ‘आनन्दमठ’ की ढेरों प्रतियाँ जला दी गईं (एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका : रमेशचन्द्र दत्त)।
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट बहुत बदनाम हुआ तथा इंग्लैंड में सत्ता परिवर्तन के बाद 1881 में लॉर्ड रिपन ने रद्द कर दिया गया और १८६७ वाले पुराने कानून को ही जारी रखा गया।
ब्रिटिश सरकार द्वारा दुबारा भारतीय पत्र पत्रिकाओं पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए भारतीय सामाचार पत्र अधिनियम,1910ई लाया गया जिसमें वर्नाकुलर प्रेस एक्ट से सम्बन्धित सभी घिनोने प्रावधानों को पुनर्जिवित कर दिया।
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट गवर्नर जनरल लॉर्ड लिटन और राज्य सचिव लॉर्ड सलिसबरी के बीच गोपनीय गठजोड़ था।
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