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कश्यप
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मई 2016
मई 2016
अंगूठाकार|ऋषि कश्यप तप करते हुए
thumb|200px|वामन अवतार, ऋषि कश्यप एवं अदिति के पुत्र, महाराज बलि के दरबार में।
कश्यप ऋषि एक वैदिक ऋषि थे। इनकी गणना सप्तर्षि गणों में की जाती थी। हिंदू मान्यता के अनुसार वह ऋग्वेद के सात प्राचीन ऋषियों, सप्तर्षियों में से एक हैं । बृहदारण्यक उपनिषद में कोलोफ़ोन छंद में सूचीबद्ध अन्य सप्तर्षियों के साथ, कश्यप सबसे प्राचीन और सम्मानित ऋषि हैं ।
इनके पिता ब्रह्मा के पुत्र मरीचि ऋषि थे। इन्हे परमपिता ब्रह्मा का अवतार माना गया है। माना जाता है कि द्वापर युग में कश्यप प्रजापति ही भगवान विष्णु के कृष्णावतार में उनके पिता वसुदेव थे तथा उनकी प्रथम पत्नी अदिति देवकी और उनकी द्वितीय पत्नी दिति रोहिणी थीं।
परिचय
कश्यप ऋषि प्राचीन वैदिक ॠषियों में प्रमुख ॠषि हैं जिनका उल्लेख ॠग्वेद में हुआ है। अन्य संहिताओं में भी यह नाम बहुप्रयुक्त है। इन्हें सर्वदा धार्मिक एंव रहस्यात्मक चरित्र वाला बतलाया गया है एंव अति प्राचीन कहा गया है। ऐतरेय ब्राह्मण के उन्होंने 'विश्वकर्मभौवन' नामक राजा का अभिषेक कराया था। ऐतरेय ब्राह्मणों ने कश्यपों का सम्बन्ध जनमेजय से बताया गया है। शतपथ ब्राह्मण में प्रजापति को कश्यप कहा गया है:
स यत्कुर्मो नाम। प्रजापतिः प्रजा असृजत। यदसृजत् अकरोत् तद् यदकरोत् तस्मात् कूर्मः कश्यपो वै कूर्म्स्तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः कश्यपः।
महाभारत एवं पुराणों में असुरों की उत्पत्ति एवं वंशावली के वर्णन में कहा गया है की ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक 'मरीचि' थे जिसने कश्यप ऋषि उत्पन्न हुए। कश्यप ने दक्ष प्रजापति की १७ पुत्रियों से विवाह किया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तान उत्पन्न हुई उसका विवरण निम्नांकित है। महाभारत और विष्णु पुराण के अनुसार उन सत्रह पत्नियों के नाम हैं -:
अदिति
दिति
दनु
अनिष्ठा
काष्ठा
सुरसा
इला
मुनि
सुरभि
कद्रू
विनता
यामिनी
ताम्रा
तिमि
क्रोधवशा
सरमा
पातंगी
मार्कण्डेय पुराण और भागवत पुराण के अनुसार तेरह पत्नियां
अदिति
दिति
दनु
काष्ठा
अनिष्ठा
सुरसा
मुनि
सुरभि
विनता
कद्रू
पातंगी
तिमि
इला
मत्स्य पुराण के अनुसार नौ पत्नियां
अदिति
दिति
दनु
काष्ठा
अनिष्ठा
कद्रू
सुरसा
विनता
सुरभि
भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार कश्यप की तेरह पत्नियां थीं और मत्स्य पुराण के अनुसार नौ। एक परम्परा के अनुसार देवता, दैत्य, दानव, यक्ष, गंधर्व, रक्षा, नाग इन सभी जीवधारियों की उत्पत्ति कश्यप से हुई।
एक बार समस्त पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर परशुराम ने वह कश्यप मुनि को दान कर दी। कश्यप मुनि ने कहा-'अब तुम मेरे देश में मत रहो।' अत: गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने रात को पृथ्वी पर न रहने का संकल्प किया। वे प्रति रात्रि में मन के समान तीव्र गमनशक्ति से महेंद्र पर्वत पर जाने लगे।
अरुण और गरुड़
दक्ष प्रजापति की सत्रह कन्याएं थी जिनमें से सभी का विवाह कश्यप मुनि के साथ हुआ किंतु कश्यप मुनि को कद्रु तथा विनता से विशेष प्रेम था। एक बार प्रसन्न होकर कश्यप ने उन दोनों को मनचाहा वर मांगने को कहा। कद्रु ने समान पराक्रमी एक हज़ार नाग पुत्र मांगे, तथा विनता ने उसके पुत्रों से अधिक तेजस्वी दो पुत्र मांगे। कालांतर में दोनों को क्रमश: एक सहस्त्र, तथा दो अंडे प्राप्त हुए। 500 वर्ष बाद कद्रु के अंडो से एक-एक करतें करते एक हज़ार नाग प्रकट हुए, जिनमें सबसे पहले शेषनाग बाहर आए, फ़िर दुसरे क्रमांक पर नागराज वासुकी बाहर आए, और ऐसे करते-करते नागराज तक्षक, कालिया, कर्कोटक, पद्म, महापद्म इस प्रकार १००० नाग प्रकट होते चलें गए। विनता ने ईर्ष्यावश अपना एक अंडा स्वयं ही तोड़ डाला। उसमें से एक अविकसित बालक निकला जिसका ऊर्ध्वभाग बन चुका था, अधोभाग का विकास नहीं हुआ थां उसने क्रुद्ध होकर मां को 500 वर्ष तक कद्रु की दासी रहने का श्राप दिया तथा कहा कि यदि दूसरा अंडा समय से पूर्व नहीं फोड़ा तो वह पूर्णविकसित बालक मां को दासित्व से मुक्त करेगा। पहला पुत्र अरुण बनकर आकाश में सूर्य का सारथी बन गया तथा दूसरा पुत्र गरुड़ बनकर आकाश में उड़ गया।
विनता और कद्रु एक बार कहीं बाहर घूमने गयीं। वहाँ उच्चैःश्रवा नामक घोड़े को देखकर दोनों की शर्त लग गयी कि जो उसका रंग गलत बतायेगी, वह दूसरी की दासी बनेगी। अगले दिन घोड़े का रंग देखने की बात रही। विनता ने उसका रंग सफेद बताया था तथा कद्रु ने उसका रंग सफेद, पर पूंछ का रंग काला बताया था। कद्रु के मन में कपट था। उसने घर जाते ही अपने पुत्रों को उसकी पूंछ पर लिपटकर काले बालों का रूप धारण करने का आदेश दिया जिससे वह विजयी हो जाय। जिन सर्पों ने उसका आदेश नहीं माना, उन्हें उसने शाप दिया कि वे जनमेजय के यज्ञ में भस्म हो जायें। इस शाप का अनुमोदन करते हुए ब्रह्मा ने कश्यप को बुलाया और कहा-'तुमसे उत्पन्न सर्पों की संख्या बहुत बढ़ गयी है। तुम्हारी पत्नी ने उन्हें शाप देकर अच्छा ही किया, अत: तुम उससे रूष्ट मत होना।' ऐसा कहकर ब्रह्मा ने कश्यप को सर्पों का विष उतारने की विद्या प्रदान की। विनता और कद्रु जब उच्चैःश्रवा को देखने अगले दिन गयीं तब उसकी पूंछ काले नागों से ढकी रहने के कारण काली जान पड़ रही थी। विनता अत्यंत दुखी हुई और उसने कद्रु की दासी का स्थान ग्रहण किया।
गरुड़ ने नागों से पूछा कि कौन-सा ऐसा कार्य है जिसको करने से उसकी माता को दासीत्व से छुटकारा मिल जायेगा? उसके नाग भाइयों ने अमृत लाकर देने के लिए कहा। गरुड़ ने अमृत की खोज में प्रस्थान किया। उसको समस्त देवताओं से युद्ध करना पड़ा। सबसे अधिक शक्तिशाली होने के कारण गरुड़ ने सभी को परास्त कर दिया। तद नंतर वे अमृत के पास पहुंचा। अत्यंत सूक्ष्म रूप धारण करके वह अमृतघट के पास निरंतर चलने वाले चक्र को पार कर गया। वहां दो सर्प पहरा दे रहे थे। उन दोनों को मारकर वह अमृतघट उठाकर ले उड़ा। उसने स्वयं अमृत का पान नहीं किया था, यह देखकर विष्णु ने उसके निर्लिप्त भाव पर प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि वह बिना अमृत पीये भी अजर-अमर होगा तथा विष्णु-ध्वज पर उसका स्थान रहेगा। गरुड़ ने विष्णु का वाहन बनना भी स्वीकार किया। मार्ग में देवराज इन्द्र मिले। देवराज इन्द्र ने उससे अमृत-कलश मांगा और कहा कि यदि नागों ने इसका पान कर लिया तो अत्यधिक अहित होगा। गरुड़ ने देवराज इन्द्र को बताया कि वह किसी उद्देश्य से अमृत ले जा रहा है। जब वह अमृत-कलश कहीं रख दे, देवराज इन्द्र उसे ले ले, फ़िर देवराज इन्द्र ने प्रसन्न होकर गरुड़ को वरदान दिया कि आगे सें भविष्य में नाग उसकी भोजन सामग्री होंगे। तद नंतर गरुड़ अपनी मां के पास पहुंचा। उसने नाग को सूचना दी कि वह अमृत ले आया है। नाग विनता को दासीत्व से मुक्त कर दें तथा स्नान कर लें। उसने कुशासन पर अमृत-कलश रख दिया जब तक नाग स्नान करके लौटे, देवराज इन्द्र ने अमृत चुरा लिया था। नागों ने कुशा को ही चाटा जिससे उनकी जीभ के दो भाग हो गए, अंत: वे द्विजिव्हा कहलाने लगे।
देवराज इन्द्र को वालखिल्या महर्षियों से बहुत ईर्ष्या थी। रूष्ट होकर वालखिल्या ने अपनी तपस्या का भाग कश्यप मुनि को दिया तथा देवराज इन्द्र का मद नष्ट करने के लिए कहा। कश्यप ने सुपर्णा तथा कद्रु से विवाह किया। दोनों के गर्भिणी होने पर वे उन्हें सदाचार से घर में ही रहने के लिए कहकर अन्यत्र चले गये। उनके जाने के बाद दोनों पत्नियां ऋषियों के यज्ञों में जाने लगीं। वे दोनों ऋषियों के मना करने पर भी हविष्य को दूषित कर देती थीं। अत: उनके शाप से वे नदियां (अपगा) बन गयीं। लौटने पर कश्यप को ज्ञात हुआ। ऋषियों के कहने से उन्होंने शिवाराधना की। शिव के प्रसन्न होने पर उन्हें आशीर्वाद मिला कि दोनों नदियां गंगा से मिलकर पुन: नारी-रूप धारण करेंगी। ऐसा ही होने पर प्रजापति कश्यप ने दोनों का सीमांतोन्नयन संस्कार किया। यज्ञ के समय कद्रु ने एक आंख से संकेत द्वारा ऋषियों का उपहास किया। अत: उनके शाप से वह कानी हो गयी। कश्यप ने पुन: ऋषियों को किसी प्रकार प्रसन्न किया। उनके कथनानुसार गंगा स्नान से उसने पुन: पुर्वरूप धारण किया।
सन्दर्भ
कश्यप
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