Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

कुमाऊँ मण्डल

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

यह लेख कुमाऊँ मण्डल पर है। अन्य कुमाऊँ लेखों के लिए देखें कुमांऊॅं कुमाऊं UK 201.04 जातीयता और भाषा भाषाएं मूल निवासी: कुमाउनी, थारू (बुक्सरी), रूंगलो आधिकारिक: हिंदी Ethnic groups कुमाऊँनी, शौकस, रूंग्स, भोटिया, थारूस (भोक्सा) कुमाऊँनी, कुमायूँ आईएसटी +5:30 कुमाऊं हिमालय की सबसे ऊंची चोटी 21,035 नंदा देवी(7,817 metres)https://www.britannica.com/place/Kumaun-Himalayas Kumaun Himalayas - mountains, India कुमाऊं मंडल की सबसे ऊंची चोटी हरदेओल 7,151 m (23,461 ft) कुमाऊं मंडल की सबसे कम ऊंचाई शारदा सागर जलाशय (190 m)Ichthyofaunal Diversity of Sharda Sagar Reservoir in Tarai Region http://oaji.net/pdf.html%3Fn%3D2017/6036-1522843486.pdf%26ved%3D2ahUKEwiM5_K5y8PkAhWGknAKHeL7B-sQFjAOegQICRAB%26usg%3DAOvVaw2vDxLKmM8imKtQxbyVI49S PDF Open Academics Journal Index 9 September 2019 3 अक्तूबर 2022 https://web.archive.org/web/20221003204836/https://oaji.net/pdf.html%3Fn%3D2017/6036-1522843486.pdf%26ved%3D2ahUKEwiM5_K5y8PkAhWGknAKHeL7B-sQFjAOegQICRAB%26usg%3DAOvVaw2vDxLKmM8imKtQxbyVI49S dead सबसे बड़ी झील भीमताल http://kumaon.gov.in/ 4,228,998 भारत कुर्मांचल मानसखंड प्रशासनिक प्रभाग देवताओं का घरhttps://www.culturaltrends.in/product/kumaon-home-of-the-gods Kumaon - Home of the Gods from Nest & Wings - Kumaon Complete Travel Guide 290 3 2 center red Om Parvat Mountain.jpg Complete pic of Jageshwar temple.jpgBagnath Temple Munsiari IMG 20160617 132452119 (32987221606).jpgGori river flowing through Johar Valley. A view of Nainital lake with the morning mist.jpg KGM - DDN Exp. (36636768836).jpg Panchchuli range viewed from Kausani.jpgView of Trisul and Panchchuli peaks from Kausani Snow Fall in Ranikhet.jpg An_elephant_herd_at_Jim_Corbett_National_Park.jpg ऊपर से दक्षिणावर्त: ओम पर्वत, गोरी नदी मुनस्यारी, काठगोदाम, रानीखेत, हाथी जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में झुंड, कौसानी से हिमालयी पैनोरमा, नैनी झील, जगेश्वर Kumaon Garhwal.jpg Location in Uttarakhand देश स्थापित Metric 1815Robert Montgomery Martin, History of the Possessions of the Honourable East India Company, Volume 1, pg. 107 राजधानी नैनीताल जिलों अल्मोड़ा बागेश्वर चंपावत नैनीताल पिथौरागढ़ उधम सिंह नगर डिवीजन विधान - सभा * भारत की संसदद्विसदनीय राज्य सभा1 सीट लोकसभा2 सीटें कुमाऊँ मण्डल भारत के उत्तराखण्ड राज्य के दो प्रमुख मण्डलों में से एक हैं। अन्य मण्डल है गढ़वाल। कुमाऊँ मण्डल में निम्नलिखित जिले आते हैं:- अल्मोड़ा बागेश्वर चंपावत नैनीताल पिथौरागढ़ उधमसिंह नगर कुमाऊँ के उत्तर में तिब्बत, पूर्व में नेपाल, दक्षिण में उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम में गढ़वाल मंडल हैं I रानीखेत में भारतीय सेना की प्रसिद्ध कुमाऊँ रेजिमेंट का केन्द्र स्थित है I कुमाऊँ के मुख्य नगर रामनगर , हल्द्वानी, नैनीताल, अल्मोड़ा, रानीखेत, पिथौरागढ़, रुद्रपुर, किच्छाकाशीपुर, पंतनगर, चम्पावत तथा मुक्तेश्वर हैं I कुमाऊँ मण्डल का शासनिक केंद्र नैनीताल है और यहीं उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय भी स्थित है। https://web.archive.org/web/20090906032226/http://highcourtofuttarakhand.gov.in/ 6 सितंबर 2009उच्च न्यायालय भौगोलिक स्थिति भारतवर्ष के धुर उत्तर में स्थित हिमाच्छादित पर्वतमालाओं, सघन वनों और दक्षिण में तराई-भावर से आवेष्टित २८°४'३ से ३०°.४९' उत्तरी अक्षांस और ७८°.४४' से ८१°.४' पूर्वी देशान्तर के बीच अवस्थित भू-भाग 'कुमाऊँ' कहलाता है। सं. १८५० ई. तक तराई-भावर क्षेत्र एक विषम वन था जहां जंगली जानवरों का राज था किन्तु उसके उपरान्त जब जंगलों की कटाई-छटाई की गई तो यहाँ की उर्वरक धरती ने कई पर्वतीय लोगों को आकर्षित किया, जिन्होंने गर्मी और सर्दी के मौसम में वहां खेती की और वर्षा के मौसम में वापस पर्वतों में चले गए। तराई-भाबर के अलावा अन्य पूर्ण क्षेत्र पर्वतीय है। यह हिमालय पर्वतमाला का एक मुख्य हिस्सा है तथा यहाँ ३० से अधिक पर्वत शिखर ५५०० मी. से ऊँचे हैं। यहाँ चीड़, देवदारु, भोज-वृक्ष, सरो, बाँझ इत्यादि पर्वतीय वृक्षों की बहुतायत है। यहाँ की मुख्य नदियाँ ोरी, काली, सरयू, कोसी, रामगंगा इत्यादि हैं। काली (शारदा) नदी भारत तथा नेपाल के मध्य प्राकृतिक सीमा है। कैलाश-मानसरोवर का मार्ग इसी नदी के साथ जाता है और लिपू लेख दर्रे से तिब्बत को जाता है। ऊंटाधुरा दर्रा जहां से जोहार लोग तिब्बत में व्यापार करने जाते हैं १७५०० फुट की ऊँचाई पर है। यहाँ विश्वविख्यात पिंडारी हिमनद् है जहां विदेशी सैलानी आते हैं।पं. बद्री दत्त पाण्डे.कुमाऊँ का इतिहास.१९३७.श्याम प्रकाशन.पृ.सं.५-६ यहाँ की धरती प्रायः चूना-पत्थर, बलुआ-पत्थर, स्लेट, सीसा, ग्रेनाइट से भरी है। यहाँ लौह, ताम्र, सीसा, खड़िया, अदह इत्यादि की खानें हैं। तराई-भाबर के अलावा संपूर्ण कुमाऊँ का मौसम सुहावना होता है। बाहरी हिमालय श्रंखला में मानसून में भीतरी हिमालय से दुगुनी से भी अधिक वर्षा होती है, लगभग १००० मी.मी. से २००० मी.मी. तक। शरद ऋतु में पर्वत शिखरों में प्रायः हिमपात तो होता ही है, कुछ एक वर्षों में तो पूरे पर्वत क्षेत्र में भी हो जाता है। शीत, विशेषतः उपत्यका में तीव्र होती है। शिवांग पर्वत कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित 6,481 मीटर ऊँची पर्वत चोटी है, जो कुंगरीबिंगरी-ला और मंगस्या-ला दर्रों के बीच स्थित है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में इसका संबंध भगवान शिव से माना जाता है। यह भारत की उत्तरी सीमा और ऐतिहासिक अंतर-हिमालयी मार्गों के निकट स्थित है।Abhishek Awasthi Shiva’s Guardians in Kumaon’s Trans-Himalayan Frontier https://english.hindusthansamachar.in/Encyc/2026/7/23/Shivang-Parvat-Himalayan-Front.php?utm_source=chatgpt.com english.hindusthansamachar.in hindusthansamachar 23 सितम्बर 2026 en इसी उच्च हिमालयी क्षेत्र में बामदेव पर्वत भी स्थित है। इसका नाम वामदेव से संबद्ध माना जाता है, जिन्हें हिन्दू परंपरा में भगवान शिव का एक स्वरूप माना गया है। स्थानीय परंपराओं में इस पर्वत को कुमाऊँ के पवित्र हिमालयी भू-दृश्य का हिस्सा माना जाता है।RK Singh “Where Sacred Geography Meets Strategic Highs: Dharma Parvat and Bamdev Parvat of Kumaon” by Col RP Singh (Retd) - STRIVE https://striveindia.in/where-sacred-geography-meets-strategic-highs-dharma-parvat-and-bamdev-parvat-of-kumaon-by-col-rp-singh-retd/ 9 अक्टूबर 2026 28 जुलाई 2026 संस्कृति सांस्कृतिक वैभव, प्राकृतिक सौंदर्य और सम्पदा से श्री सम्पन्न कुमाऊँ अंचल की एक विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान है। यहाँ के आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा, प्रथा-परम्परा, रीति-रिवाज, धर्म-विश्वास, गीत-नृत्य, भाषा बोली सबका एक विशिष्ट स्थानीय रंग है। औद्योगिक वैज्ञानिकता के जड़-विकास से कई अर्थों में यह भू-भाग अछूता है। अपनी विशिष्ट सामाजिक संरचना में बद्ध यहाँ की लोक परंपरा मैदानी क्षेत्रों से पर्याप्त भिन्न है। लोक साहित्य की यहाँ समृद्ध वाचिक परम्परा विद्यमान है, जो पीढी-दर-पीढ़ी आज भी जीवन्त है। कुमाऊँ का अस्तित्व भी वैदिक काल से है। स्कन्द पुराण के मानस खण्ड व अन्य पौराणिक साहित्य में मानस खण्ड के नाम से वर्णित क्षेत्र वर्तमान कुमाऊँ मंडल ही है। इस क्षेत्र में भी अनेक प्राचीन मंदिर और तीर्थ स्थल हैं। बोली-भाषा कुमांऊँ क्षेेत्र में कई उपभाषाऐंं बोली जाती हैं। कुछ मुख्य स्थानीय भाषाऐं इस प्रकार हैं:- https://web.archive.org/web/20120305211927/http://www.uttaranchal.org.uk/dialects.php 5 मार्च 2012 कुमाऊँनी भाषाएँ विस्तृत जानकारी के लिये कुमाऊँनी भाषा देखें। हिन्दी अल्मोड़िया कुमांऊँनी काली कुमांऊँ की कुमांऊँनी सोर इलाके की कुमांऊँनी पाली पछांऊॅं की कुमांऊँनी दानपुर की कुमांऊँनी जोहार (भोटिया) भाषा गोरखाली डोट्याली थारू बोक्षा भावर की उपभाषाएं जौनसारी कुमांऊँ शब्द की व्युत्पति कुमांऊँ शब्द की व्युत्पति के सम्बध में विभिन्न मत प्रचलित रहे हैं। भाषा की दृष्टि से यही उचित जान पड़ता है कि यह शब्द मूलतः संस्कृत में कूर्म है। चम्पावत के समीप २१९६ मीटर ऊँचा कान्तेश्वर पर्वत है जिसके सम्बध में मान्यता है कि भगवान विष्णु अपने द्वितीय अवतार (कूर्मावतार) में इस पर्वत पर तीन वर्ष तक रहे। तब से वह पर्वत कान्तेश्वर के स्थान पर कूर्म-अंचल (कूर्मांचल) नाम से जाना जाने लगा। इस पर्वत की आकृति भी कच्छप की पीठ जैसी जान पड़ती है। सम्भवतः इसी कारण इस क्षेत्र का नाम कूर्मांचल पड़ा होगा। पहले शायद कूर्म शब्द प्रयोग में आता होगा, क्योंकि कूर्म शब्द का प्रयोग स्थानीय भाषा में बहुतायत से मिलता है। कूर्म के स्थान पर कुमूँ शब्द निष्पन्न होने का एक कारण यह भी हो सकता है कि यहाँ की बोलियों में उकारान्तता अधिक पाई जाती है। कालान्तर में साहित्यिक ग्रन्थों, ताम्रपत्रों में कुमूँ के स्थान पर कुमऊ और उसके बाद कुमाऊँ शब्द स्वीकृत हुआ। संस्कृत ग्रन्थों में भी कूर्मांचल शब्द का प्रयोग मिलता है। कुमांऊँ के मूल निवासी प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्यों के अभाव में निश्चित रूप से कहना कठिन है कि मूलतः कुमाऊँ क्षेत्र में किन-किन मानव जातियों का प्रभुत्व था। महाभारत, पुराण और प्राचीन संस्कृत साहित्य में उपलब्ध कतिपय सन्दर्भों से ज्ञात होता है कि यहाँ किरात, किन्नर, यक्ष, तंगव, कुलिंद, खस इत्यादि जातियाँ निवास करती थीं। महाभारत के वन पर्व में मध्य हिमालय की उपत्यकाओं में निवास करने वाली जातियों को किरात, तंगव तथा कुलिंट बताया गया है। किरांततंगणाकीर्ण कुलिंद शत संकुलम्‌। युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में उपस्थितों के नाम गिनाते हुए दुर्योधन कहता है कि मेरु मंदिर पर्वतों के मध्य शैलोक्ष नदी के किनारे निवास करने वाले खस-एकासन, पारद, कुलिंद, तंगव और परतंगण नामक पर्वतीय राजा काले रंग का चंबर और पिपीलिका जाति का स्वर्ण लाए थे। (महाभारत वनपर्व अध्याय ५२) द्रोणपर्व में आया है कि उक्त पर्वतीय जातियों ने पत्थर के हथियारों से महाभारत की लड़ाई में दुर्योधन की ओर से भाग लेकर कृष्ण के सारथी सात्यकि पर चारों ओर से पथराव किया था, किन्तु सात्यकि के नाराचों के समक्ष वे न टिक सके। (महाभारत द्रोणपर्व अध्याय १४१/४२-४३) ब्रह्मपुराण और वायुपुराण में मध्य हिमालय में किरात, किन्नर, यक्ष, गंधर्व, विद्याधर, नाग, इत्यादि जातियों के अस्तित्व के संकेत उपलब्ध होते हैं। स्कन्द पुराण के मानस खंड में कोसी (कौशिकी) स्थित काषाय पर्वत नाम से वर्णित गिरिमाला को अल्मोड़ा का पहाड़ी भू-भाग माना गया है- कौशिकी शाल्मली मध्ये पुण्यः काषाय पर्वतः। तस्य पश्चिम भागे वै क्षेत्र विष्णो प्रतिष्ठितम्‌। अल्मोड़ा में जाखन देवी का मंदिर इस बात का प्रमाण है कि अत्यन्त प्राचीन काल में यहाँ दक्षों का आवास रहा है। कालिदास के '[मेघदूत]' का नामक यक्ष मेघ को अल्कापुरी की पहचान के चिह्न बताते हुए कहता है कि उसकी प्रिया ने अपने दरवाजे की देहली पर शंख-पद्म की अल्पनाओं के ऊपर पुष्प बिखेरे होंगे। द्वारापान्ते लिखित वपुषों शंखपद्मौ च दृष्टवा (मेघदूत २००) तथा विन्यस्यन्ती भूविगणनया देहलीदन्त पुष्पै : (उ. मेघदूत ७०) कला सांस्कृतिक जीवन के विविध पक्षों में यह परिपाटी कुमांऊँ में विभिन्न त्यौहारों के अवसरों पर आज भी विद्यमान है। यक्ष जाति के अलावा आदि युग में कुमांऊँ में नाग जाति के निवास के संकेत भी मिलते हैं। पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग नामक स्थान में बीनाग/बेनीनाग का प्रसिद्ध मंदिर है। नागों के नाम पर कुमांऊँ में और भी कई मंदिर है। जैसे धौलनाग, कालीनाग, पिंगलनाग, खरहरीनाग, बासुकि नाग, नागदेव इत्यादि। कुमाऊँ की आदिम जातियों में यक्ष और नाग जाति के अस्तित्व की कल्पना अनुमानों पर आधारित है किन्तु किरात जाति के सम्बध में कुछ समाज शास्त्रीय एवं नृवैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रागैतिहासिक युग में कुमांऊँ-गढ़वाल के भू-भाग किरात, मंगोल आदि आर्येतर जातियों के निवास क्षेत्र रहे, जिन्हें कालान्तर में उत्तर-पश्चिम की ओर से आने वाले अवैदिक खस आर्यों ने विजित कर लिया। यह भी सम्भावना है कि इस प्रदेश पर आग्नेय परिवार की मुंडा भाषा-भाषी किरात जाति का प्रभुत्व दीर्घकाल तक रहा, अन्यथा प्राचीन काल में इसे किरातमण्डल की संज्ञा न मिलती। अपने स्वतंत्र भाषाई अस्तित्व के साथ किरातों के वंशज आज भी कुमाऊँ के अस्कोट एवं डीडीहाट नामक स्थानों में मौजूद हैं। कुमाऊँ की बोलियों में आज भी अनेक ऐसे शब्द प्रचलित हैं, जो प्रागैतिहासिक किरातों की बोली के अवशेष प्रतीत होते हैं, जैसे- ढुड़ (पत्थर), लिडुण (लिंगाकार कुंडलीमुखी जलीय पौधा), जुंग (मूंद्द), झुंगर (अनाज का एक प्रकार), फांग (शाखा), ठांगर (बेलयुक्त पौधों को सहारा देने के लिए लगाई जाने वाली वृक्ष की सूखी शाखा), गंगा (नदी), ल्यत (बहुत गीली मिट्टी) आदि शब्दावली के अतिरिक्त कतिपय-व्याकरण तत्व भी आग्नेय परिवार की भाषाओं से समानता रखते हैं, जैसे कुमांऊँनी कर्म कारक सूचक कणि/कन प्रत्यय मुंडा की भोवेसी तथा कोर्क बालियों में के/किन या खे/खिन है। बीस के समूह के आधार पर गिनने की पद्धति राजी और कुमाऊँनी में समान रूप से मिलती है। बीस के समूह के लिए कुमांऊँनी में बिसि शब्द है। किरात जाति के अलावा कुमांऊँ क्षेत्र में हिमालय के उत्तरांचल में निवास करने वाली भोटिया जाति का भी प्रभुत्व रहा। भोटिया शब्द मूलतः बोट या भोट है। तिब्बत को भोट देश या भूटान भी कहा जाता है तथा उस देश से संबंधित होने के कारण वहाँ के निवासियों को भोटिया कहा गया। भोटियों की भाषा तिब्बती कही गई। यह तिब्बती से निकटता रखती है। जोहार दारमा, ब्याँस तथा चौदाँस की भाषा में स्थानगत विभेद पाए जाते हैं। भोटियों की बोली जोहारी पर कुमाऊँनी का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि आर्यों के आगमन से पहले यहाँ मुंडा तथा तिब्बती परिवार की भाषा बोलने वाले लोग निवास करते रहे होंगे। कुमांऊँ में शक संवत् के प्रचलन एवं अल्मोड़ा में कोसी के समीप स्थित कटारमल सूर्य मंदिर के अस्तित्व से इस संभावना की पुष्टि होती है कि किरात, राजी, नाग इत्यादि आदिम जातियों के पश्चात यहाँ शक जाति का अस्तित्व रहा है। गडनाथ, जागनाथ, भोलानाथ आदि लोक देवताओं के मंदिरों तथा गणनाथ आदि नामों के आधार पर यहाँ नाथ जाति के अस्तित्व की भी संभावना व्यक्त की जा सकती है। इतना निर्विवाद है कि कुमाऊँ के आदि निवासी कोल, किरात, राजी नाग, हूण, शक, बौर, थारु, बोक्सा, भोटिया और खस जाति के लोग हैं। इनमें सबसे सशक्त जाति खस थी, जो अन्य जातियों के बाद कुमाऊँ में आई। यहां भाषा और संस्कृति की आधार भूमि के निर्माण में भी खसों का योगदान रहा है। मूलतः आर्य जाति से संबंधित होते हुए भी खस ऋग्वेद के निर्माण से पूर्व अपने मूल आर्य भाइयों से अलग होकर पृथक-पृथक दलों में मध्य एशिया से पूर्व दिशा में की ओर चले होंगे। यही कारण है कि वे अवैदिक आर्य भी कहलाते हैं। अनुमान है कि वे ई.पू. द्वितीय सहस्राब्दी के लगभग पश्चिम से पूर्व की ओर भारत के विभिन्न भागों में फैल गए। कुमाऊँ में खसों के प्रवेश का निश्चित समय बताना दुष्कर कार्य है, तो भी इतना निश्चित है कि यहाँ राजपूतों के आगमन से पूर्व खसों का प्रभुत्व था। कुमांऊँ के शासक कत्यूरी शासन कुमांऊँ में सबसे पहले कत्यूरी राजाओं ने शासन की बागडोर संभाली। राहुल सांकृत्यायन ने इस समय को सन्‌ ८५० से १०६० तक का माना है। कत्यूरी शासकों की राजधानी पहले जोशीमठ थी, परन्तु बाद में यह कार्तिकेयपुर हो गई। यद्यपि इस विषय में भी विद्वानों व इतिहासकारों में मतभेद है। कुमाऊँ निवासी 'कत्यूर' को लोक देवता मानकर पूजा अर्चना करते हैं। यह तथ्य प्रमाणित करता है कि कत्यूर शासकों का प्रजा पर बहुत प्रभाव था क्योंकि उन्होंने जनता के हित में मन्दिर, नाले, तालाब व बाजार का निर्माण कराया। पाली पहाड़ के 'ईड़ा' के बारह खम्भा में इन राजाओं की यशोगाथा अंकित है। तत्कालीन शिलालेखों तथा ताम्रपत्रों से पता चलता है कि कत्यूर राजा वैभवशाली तथा प्रजावत्सल थे तथा काली, कुमाऊँ, डोरी, असकोट, बारामंडल, द्वाराहाट, लखनपुर तक इनका शासन फैला हुआ था। ११वीं शताब्दी के बाद इनकी शक्ति घटने लगी। राजा धामदेव व ब्रह्मदेव के बाद कत्यूरी शासन समाप्त होने लगा था। डॉ॰ त्रिलोचन पांडे लिखते हैं- 'कत्यूर शासकों का उल्लेख मुख्यतः लोक गाथाओं में हुआ है। प्रसिद्ध लोक गाथा मालसाई का सम्बन्ध कत्यूरों से है। कत्यूरी राजाओं की संतान असकोट, डोरी, पाली, पछाऊँ में अब भी विद्यमान है। कुमाऊँ में आज भी यह प्रचलित है कि कत्यूरी वंश के अवसान पर सूर्य छिप गया और रात्रि हो गई, किन्तु चन्द्रवंशी चन्द्रमा के उदय से अंधकार मिट गया। चन्द्रवंशी शासन की स्थापना पर नया प्रकाश फैल गया।‘ चन्द्रवंश कत्यूरी वंश के अंतिम राजाओं की शक्ति क्षीण होने पर छोटे-छोटे राज्य स्वतंत्र हो गए, तथा उन्होंने संगठित होकर अपने राज्य का विस्तार कर लिया। सम्पूर्ण कुमाऊँ में कोई एक शक्ति न थी, जो सबको अपने अधीन कर पाती। इस संक्रान्ति काल में राज्य बिखर गया तथा कत्यूरी राजाओं द्वारा प्रारंभ किए गए विकास कार्य या तो समाप्त हो गए या उनका स्वरूप ही बदल गया। कत्यूर वंश के अंतिम शासकों ने प्रजा पर अत्यधिक अत्याचार भी किए। उसी परम्परा में इस संक्राति काल में भी स्थानीय छोटे-छोटे राजाओं ने भी प्रजा पर अत्यधिक अत्याचार किए गए, परन्तु शनैः-शनैः चन्द्रवंशी राजाओं ने अपने एकछत्र राज्य की नींव डाली। कुछ इतिहासकार चन्द्रवंशी शासन काल का प्रारंभ १२६१ ई. से मानते हैं तो कुछ सन ९५३ से। बद्रीदत्त पांडे के अनुसार चन्द्रवंश का प्रथम राजा सोमचन्द सन्‌ ७०० ई. के आसपास गद्दी पर बैठा। चन्द्रवंशी राजाओं के कुमाऊँ में आने का कारण भी स्पष्ट नहीं है। विद्वानों के अनुसार कत्यूरी शासन की समाप्ति के बाद देशी राजाओं के अत्याचारों से दुखी प्रजा कन्नौज के राजा सोमचन्द के पास गई और उन्हें कुमाऊँ में शांति स्थापना के लिए आमंत्रित किया। अन्य इतिहासकारों के अनुसार सोमचन्द इलाहाबाद के पास स्थित झूंसी के राजपूत थे। सोमचन्द्र के बद्रीनाथ यात्रा पर आने पर सूर्यवंशी राजा ब्रह्मदेव ने उन्हें अपना मित्र बना लिया। सोमचन्द्र ने अपने व्यवहार एवं परिश्रम से एक छोटा-सा राज्य स्थापित कर लिया तथा कालांतर में खस राजाओं को हटाकर अपने राज्य का विस्तार कर लिया। इस प्रकार कुमाऊँ में चन्द्रवंश की स्थापना हुई। सम्पूर्ण काली, कुमाऊँ, ध्यानीरौ, चौमेसी, सालम, रंगोल पट्टियाँ चंद्रवंश के अधीन आ गई थीं। राजा महेन्द्र चंद (१७९० ई.) के समय तक सम्पूर्ण कुमांऊं में चन्द राजाओं का पूर्ण अधिकार हो चुका था। साढ़े पांच सौ वर्षों की अवधि में चन्दों ने कुमाऊँ पर एकछत्र राज्य किया। इसी समय कन्नौज आदि से कई ब्राह्मण जातियाँ कुमांऊँ में बसने के लिए आईं तथा उनके साथ छुआछूत, खानपान में भेद, वर्ण परम्परा एवं विवाह सम्बन्धी गोत्र जाति के भेद भी यहाँ के मूल निवासियों में प्रचलित हो गए, जो कुमाऊँ में आज भी है। चन्द राजाओं के शासन काल में कुमाऊँ में सर्वत्र सुधार तथा उन्नति के कार्य हुए। चन्दों ने जमीन, कर निर्धारण तथा गाँव प्रधान या मुखिया की नियुक्ति करने का कार्य किया। चन्द राजाओं का राज्य चिह्न 'गाय' था। तत्कालीन सिक्कों, मुहरों और झंडों पर यह अंकित किया जाता था। उत्तर भारत में औरंगजेब के शासनकाल में मुस्लिम संस्कृति से कुमाऊँनी संस्कृति का प्रचुर मात्रा में आदान-प्रदान हुआ। कुमाऊँ में मुस्लिम शासन कभी नहीं रहा, परन्तु 'जहाँगीरनामा' और 'शाहनामा' जैसी पुस्तकों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि चंद राजाओं से मुगल दरबार का सीधा सम्बन्ध था। यद्यपि यह सम्बन्ध राजा से राज्य तक ही सीमित रहा परन्तु आगे चलकर यह संबंध भाषा व साहित्य में दृष्टिगोचर होने लगा। इसी समय कुमाऊँ भाषा में अरबी, फारसी, तुर्की भाषाओं के कई शब्द प्रयुक्त होने लगे। गोरखा शासन अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में आपसी दुर्भावनाओं व राग-द्वेष के कारण चंद राजाओं की शक्ति बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन्‌ १७९० ई. में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया। गोरखा शासन काल में एक ओर शासन संबंधी अनेक कार्य किए गए, वहीं दूसरी ओर जनता पर अत्याचार भी खूब किए गए। गोरखा राजा बहुत कठोर स्वभाव के होते थे तथा साधारण-सी बात पर किसी को भी मरवा देते थे। इसके बावजूद चन्द राजाओं की तरह ये भी धार्मिक थे। गाय, ब्राह्मण का इनके शासन में विशेष सम्मान था। दान व यज्ञ जैसे कर्मकांडों पर विश्वास के कारण इनके समय कर्मकांडों को भी बढ़ावा मिला। जनता पर नित नए कर लगाना, सैनिकों को गुलाम बनाना, कुली प्रथा, बेगार इनके अत्याचार थे। ट्रेल ने लिखा है- 'गोरखा राज्य के समय बड़ी विचित्र राज-आज्ञाएँ प्रचलित की जाती थीं, जिनको तोड़ने पर धन दंड देना पड़ता था। गढ़वाल में एक हुक्म जारी हुआ था कि कोई औरत छत पर न चढ़े। गोरखों के सैनिकों जैसे स्वभाव के कारण कहा जा सकता है कि इस काल में कुमाऊँ पर सैनिक शासन रहा। ये अपनी नृशंसता व अत्याचारी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। जब अंग्रेजों ने इस राज्य पर आक्रमण किया, तो एक प्रकार से कुमाऊँ ने मुक्ति की ही साँस ली। २७ अप्रैल १८१५ ई. को अंग्रेजों के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर करके गोरखाओं ने कुमाऊँ की सत्ता अंग्रेजों को सौंप दी। अंग्रेजी शासन अंगूठाकार|अंग्रेजी शासन काल में कुमांऊँ मण्डल के जिले, १९०९ ई। गार्डनर ने गोरखों से कुमांऊँ की सत्ता का कार्यभार लिया था। १८९१ तक कुमांऊँ कमिश्नरी में कुमांऊँ, गढ़वाल और तराई के तीन जिले शामिल थे। उसके बाद कुमांऊँ को अल्मोड़ा व नैनीताल दो जिलों में बाँटा गया। ट्रैल, लैशिगंटन, बैटन, हेनरी, रामजे आदि विभिन्न कमिश्नरों ने कुमांऊँ में समय-समय पर विभिन्न सुधार तथा रचनात्मक कार्य किए। जमीन का बंदोबस्त, लगान निर्धारण, न्याय व्यवस्था, शिक्षा का प्रसार, परिवहन के साधनों की उपलब्धता के कारण अंग्रेजों के शासनकाल में कुमांऊँ की खूब उन्नति हुई। हेनरी रामजे के विषय में बद्रीदत्त पांडे लिखते हैं- 'उनको कुमांऊँ का बच्चा-बच्चा जानता है। वे यहाँ के लोगों से हिल-मिल गए थे। घर-घर की बातें जानते थे। पहाड़ी बोली भी बोलते थे। किसानों के घर की मंडुवे की रोटी भी खा लेते थे।' अंग्रेजों ने शासन व्यवस्था में पर्याप्त सुधार किए, वहीं अपने शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए कठोरतम न्याय व्यवस्था भी की। कुमाऊंनी अपनी वीरता और साहस के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। दिल्ली के शक्तिशाली मुस्लिम राजवंशों द्वारा कुमाऊंनी कभी पूरी तरह से अधीन नहीं हुए। उनकी वीरता को अंग्रेजों ने मान्यता दी और उन्हें ब्रिटिश सेना में भर्ती किया गया। कुमाऊं से भर्ती होने वाली अन्य सेनाओं में तीसरी गोरखा राइफल्स में कुमाऊंनी के साथ-साथ गढ़वाली और गोरखा भी शामिल थे।https://lovedevbhoomi.com/history-of-kumaun-in-hindi/ जानिए कुमाऊं का समृद्ध इतिहास (History of Kumaun in Hindi) Kothyari Piyush 19 Aug 2024 Lovedevbhoomi १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में कुमांऊँ के लोगों की भागीदारी उल्लेखनीय रही, परन्तु १८७० ई. में अल्मोड़ा के शिक्षित व जागरूक लोगों ने मिलकर सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समस्याओं के समाधान के लिए चंद्रवंशीय राजा भीमसिंह के नेतृत्व में एक क्लब की स्थापना की। १८७१ में 'अल्मोड़ा अखबार' का प्रकाशन प्रारंभ किया। १५ अगस्त १९४७ को सम्पूर्ण भारत के साथ कुमाऊँ भी स्वाधीन हो गया। सन्दर्भ वाह्य कड़ियाॅं 3 कुमाऊँनी लोग कुमाऊँनी भाषा कुमाऊँ रेजीमेंट कुमाऊँ हिमालय कुमाऊँ विश्वविद्यालय कुमांऊँ की लोककला कुमाऊँ अभियान्त्रिकी महाविद्यालय कुमाऊँ विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों की सूची श्रेणी:उत्तराखण्ड श्रेणी:उत्तराखण्ड के मण्डल