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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

बसंत पंचमी मेला, कोटद्वार

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बसन्त पंचमी हिन्दू समाज का प्रमुख पर्व है, परिवर्तन व आशा-उमंग के इस पर्व का विभिन्न धार्मिक स्थलों पर उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। जनपद पौडी में कोटद्वार के समीप (कोटद्वार से 14 कि.मी.) कण्वाश्रम ऐतिहासिक, सांस्कृतिक महत्व का स्थल है। यहॉ पर प्रति वर्ष बसन्त पंचमी पर्व पर दो दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। जिसमें हजारों की संख्या में दर्शक मौजूद रहते हैं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इस मेले की पृष्ठभूमि समझने से पहले कण्वाश्रम की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, व धार्मिक पृष्ठभूमि का समझना आवश्यक है। कण्वाश्रम यानी कण्व का आश्रम। इसका सम्बन्ध ऋषि कण्व से है। जिनका समय आज से लगभग 5900 वर्ष पूर्व माना जाता है, इस इतिहास की पृष्ठभूमि का समझने हेतु द्वापर युग के इतिहास में जाना होगा। भगवान कृष्ण की मृत्यु के दिन से युधिष्ठिर संवत अथवा कलिसंवत का आरम्भ होता है। उसी दिन से कलियुग का प्रारम्भ व द्वापर युग का अन्त माना जाता है। युधिष्ठिर से 18 पीढी पूर्व महाराजा दुष्यन्त हुए उनके समय में महर्षि कण्व हुए जो कि आज से 5900 वर्ष लगभग पूर्व की अवधि है, उस वक्त कण्वाश्रम में एक गुरूकुल पद्धति का विश्वविद्यालय था तथा ऋषि कण्व इस आश्रम के कुलपति थे। इस अवधि में एक अनोखी ऐतिहासिक घटना के कारण इस स्थल का अतिशय ख्याति प्राप्त हुई, यह घटना थी इस आश्रम के तपस्वी विश्वामित्र व अप्सरा मेनका प्रणय से उत्पन्न व परित्यक्त कन्या शकुन्तला का जन्म व उससे चक्रवर्ती राजा भरत का जन्म विद्धानों के अनुसार अप्सरा मेनका की परित्यक्त कन्या शकुन्तला को कण्व ऋषि ने पाल पोसकर बडा किया, तो संयोगवश इस क्षेत्र के सम्राट दुष्यन्त के आखेट हेतु आने पर शकुन्तला से उनका परिणय हुआ, जिसका परिणाम पराक्रमी यशस्वी शकुन्तला दुष्यन्त पुत्र भरत का जन्म तथा राज्याभिषेक के उपरान्त भरत का चक्रवर्ती सम्राट का पद प्राप्त करना एक ऐतिहासिक घटना है। इन्ही भरत सम्राट के नाम पर देश का नाम भारतवर्ष होने की मान्यता है। इस प्रकार का वर्णन महाभारत में महर्षि व्यास द्वारा तथा पुराणों में भी है। महाकवि कालिदास ने भी अभिज्ञान शाकुंतलम में (महाराजा भरत पहिव में) इस आश्रम को कण्व के नाम से ख्याति प्रदान कर दी। इस प्रकार शैक्षणिक क्षेत्र में ख्याति प्राप्त स्थल होने के साथ-साथ ऐतिहासिक क्षेत्र में भी ख्याति प्राप्त स्थल होने से इस स्थान का अतिशय महत्व रहा है। मान्यता है कि आज से 1500 वर्ष पूर्व तक इस आश्रम में शिक्षा दीक्षा का कार्य समाप्त हो गया था यह स्थान अपनी वैभव हेतु भी विख्यात रहा है। विकास वर्ष 1956 में अविभाजित उत्तर प्रदेश के तक्कालीन मुख्यमंत्री डॉ॰ संपूर्णानन्द जी जब इस क्षेत्र में आये तो उन्होने जनता की मांग पर तत्कालीन जिलाधिकारी गढवाल को इस स्थल के विकास हेतु निर्देश दिये इस स्थान पर वन्य जन्तु विहार की स्थापना के साथ-साथ कण्वाश्रम विकास समिति का गठन हुआ। इस समिति द्वारा पंचमी कण्वाश्रम की ऐतिहासिक व प्राचीन गौरव का बोध कराने के उपलक्ष में प्रतिवर्ष बसन्त पंचमी के पर्व के अवसर पर एक मेला आयोजन का भी निर्णय लिया गया। सह समिति अब "कण्वाश्रम मेला व विकास समिति " के नाम से जानी जाती है व पर्यटन विभाग के सहयोग से प्रतिवर्ष बसन्त पंचमी जैसे शुभ पर्व पर यहॉ पर विशाल मेले का आयेजन होता है, जिसमें सांस्कृतिक, कार्यक्रमों, खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन स्थानीय शिक्षण संस्थाओं व सांस्कृतिक दलों के माध्यम से सम्पन्न होता है। विकास प्रदर्शनी आदि का भी इस अवसर पर आयोजन किया जाता है। यह समिति इस स्थान के प्राचीनतम गौरव पूर्ण इतिहास का जन सामान्य को बोध कराती है व इस क्षेत्र के विकास हेतु शासन व पर्यटन विभाग का ध्यान आकर्षित करती है। कैसे पहुंचें कण्वाश्रम कोटद्वार से 14 किमी की दूरी पर स्थित है तथा बस, टैक्सी तथा अन्य स्थानीय यातायात की सुविधायें उपलब्ध है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोटद्वार 14 किमी0 निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट 65 किलोमीटर श्रेणी:गढ़वाल