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प्रोटेस्टेंट नैतिकता और पूंजीवाद की भावना
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प्रोटेस्टेंट नैतिकता और पूंजीवाद की भावना Die protestantische Ethik und der 'Geist' des Kapitalismus original cover.jpg मैक्स वेबर जर्मन जर्मनी समाजशास्त्र, आर्थिक इतिहास, धर्म का समाजशास्त्र गैर-काल्पनिक आर्चीव फर सोज़ियालविसेनशाफ्ट अंड सोज़ियालपोलिटिक (मूल निबंध) प्रिंट टैल्कॉट पार्सन्स (अंग्रेजी अनुवाद - 1930)
प्रोटेस्टेंट नैतिकता और पूंजीवाद की भावना (The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism, Die protestantische Ethik und der Geist des Kapitalismus) जर्मन समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ मैक्स वेबर द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय कृति है। 1904 और 1905 में मूल रूप से निबंधों की एक श्रृंखला के रूप में प्रकाशित इस ग्रंथ को आधुनिक समाजशास्त्र के संस्थापक ग्रंथों में से एक माना जाता है। इस पुस्तक में वेबर ने यह तर्क दिया है कि 16वीं और 17वीं सदी के उत्तरी यूरोप में 'तपस्वी प्रोटेस्टेंटवाद'-विशेष रूप से केल्विनवाद-ने आधुनिक 'पूंजीवाद' के विकास को प्रेरित करने वाली नैतिकता और कार्य संस्कृति को जन्म दिया।The Protestant ethic and the "spirit" of capitalism and other writings
मुख्य तर्क
वेबर का मुख्य उद्देश्य यह समझाना था कि पश्चिमी यूरोप में ही आधुनिक पूंजीवाद का उदय क्यों हुआ, जबकि चीन, भारत और मध्य पूर्व जैसे अन्य क्षेत्रों में भी तकनीकी और भौतिक प्रगति मौजूद थी।The Max Weber Dictionary: Key Words and Central Concepts
उनका तर्क है कि आधुनिक पूंजीवाद केवल लालच या धन कमाने की सामान्य इच्छा का परिणाम नहीं है (जो इतिहास में हमेशा से मौजूद रही है), बल्कि यह एक विशिष्ट "तर्कसंगत अनुशासन" का परिणाम है। इस अनुशासन को उन्होंने पूंजीवाद की भावना कहा है, जहाँ धन कमाना और उसे संचित करना जीवन का एक नैतिक कर्तव्य (Moral duty) बन जाता है, न कि केवल विलासिता के लिए धन खर्च करना।Giddens Anthony Capitalism and Modern Social Theory: An Analysis of the Writings of Marx, Durkheim and Max Weber https://archive.org/details/capitalismmodern0000gidd_a3i1 Cambridge University Press 1971 978-0521097857 119-124
'कॉलिंग'
वेबर ने प्रोटेस्टेंट सुधारक मार्टिन लूथर और विशेष रूप से जॉन केल्विन की धार्मिक शिक्षाओं का विश्लेषण किया।
कॉलिंग: लूथर ने यह विचार दिया कि ईश्वर की सेवा केवल मठों में संन्यासी बनकर नहीं की जा सकती, बल्कि दुनिया में रहकर अपने रोज़मर्रा के पेशे को पूरी ईमानदारी और मेहनत से करना ही ईश्वर की सच्ची सेवा है।
पूर्व-नियतिवाद: केल्विनवाद ने 'पूर्व-नियतिवाद' का सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार ईश्वर ने दुनिया के बनने से पहले ही यह तय कर दिया है कि कौन सा व्यक्ति स्वर्ग जाएगा और कौन नर्क। कोई भी व्यक्ति अपने अच्छे कर्मों से इस फैसले को बदल नहीं सकता।
इस डरावने सिद्धांत ने केल्विनवादियों में एक "अभूतपूर्व आंतरिक अकेलापन" और चिंता पैदा कर दी। यह जानने के लिए कि क्या वे "चुने हुए" लोगों में से हैं, उन्होंने सांसारिक सफलता और व्यवसाय में लाभ को ईश्वर की कृपा का 'संकेत' मानना शुरू कर दिया।Bendix Reinhard Max Weber: An Intellectual Portrait https://archive.org/details/maxweberintellec0000bend_q1k3 University of California Press 1977 978-0520031944 57-65
प्रोटेस्टेंट नैतिकता ने कड़ी मेहनत को बढ़ावा दिया, लेकिन साथ ही इसने 'लौकिक वैराग्य' की भी मांग की। इसका मतलब था कि व्यक्ति को अपनी मेहनत से कमाए गए धन को विलासिता, मनोरंजन या अनावश्यक सुख-सुविधाओं पर खर्च नहीं करना चाहिए।
जब लोग कड़ी मेहनत करते हैं (जिससे धन आता है) और कंजूसी से रहते हैं (जिससे धन खर्च नहीं होता), तो परिणाम क्या होता है? इसका अपरिहार्य परिणाम था पूंजी का संचय।
इस संचित धन को दान करने या बेकार रखने के बजाय, उन्होंने इसे अपने व्यवसायों में वापस निवेश किया। इसी निरंतर पुनर्निवेश की प्रक्रिया ने आधुनिक तर्कसंगत पूंजीवाद को जन्म दिया।
'लोहे का पिंजरा'
पुस्तक के अंत में, वेबर एक बहुत ही निराशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि 20वीं सदी तक आते-आते, पूंजीवाद अपनी धार्मिक जड़ों और प्रोटेस्टेंट नैतिकता से पूरी तरह मुक्त हो गया।
अब लोगों को कड़ी मेहनत इसलिए नहीं करनी पड़ती क्योंकि यह एक धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि इसलिए करनी पड़ती है क्योंकि आधुनिक आर्थिक व्यवस्था उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करती है। वेबर ने इस व्यवस्था को "लोहे का पिंजरा" कहा है-एक ऐसी नौकरशाही और मशीनी व्यवस्था जो मानव जीवन को पूरी तरह से नियंत्रित करती है और जिसमें से बाहर निकलना असंभव है।The Iron Cage: An Historical Interpretation of Max Weber
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
मार्क्सवादी इंटरनेट आर्काइव - प्रोटेस्टेंट एथिक
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