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सत्रीया नृत्य
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thumb| सत्त्रिया नृत्य 15वीं शताब्दी के असम में मध्ययुगीन बहुश्रुत महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव द्वारा इसके निर्माण के बाद से एक जीवित परंपरा बनी हुई है। इस चित्र में असम की एक सत्त्रिया नर्तकी द्वारा माटी अखाड़ा मुद्रा को दर्शाया गया है।
अंगूठाकार|सूत्रधार नृत्य (सत्रिया)
सत्रीया नृत्य (असमिया: সত্ৰীয়া নৃত্য), असम का शास्त्रीय नृत्य हैhttps://books.google.com/books?id=zLOiaGDLYOAC&newbks=0&printsec=frontcover&dq=sattriya+dance&hl=en The Sterling Book of INDIAN CLASSICAL DANCE Narayan Shovana 2011-12-30 Sterling Publishers Pvt. Ltd 978-81-207-9078-0 en और आठ मुख्य भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपराओं में से एक है। वर्ष 2000 में इस नृत्य को भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में सम्मिलित होने क गौरव प्राप्त हुआ। इस नृत्य के संस्थापक महान संत श्रीमन्त शंकरदेव हैं। शंकरदेव ने सत्रीया नृत्य को 'अंकिया नाट' (शंकरदेव द्वारा तैयार किया असमिया एकांकी नाटकों का एक रूप) के लिए एक संगत के रूप में बनाया था। यह नृत्य सत्र नामक असम के मठों में प्रदर्शित किया गया था। यह परंपरा सत्रों के भीतर बढ़ी तथा विकसित हुइ और यह नृत्य रूप सत्रीया नृत्य कहा जाने लगा।https://books.google.com/books?id=1SCVMQEACAAJ&newbks=0&hl=en Sattriya: Classical Dance of Assam Kothari Sunil 2013 Marg Foundation 978-81-921106-6-0 en
नृत्य
सत्रीया नृत्य का मूल आमतौर पर पौराणिक कहानियाँ होती हैं। यह एक सुलभ, तत्काल और मनोरंजक तरीके से लोगों को पौराणिक शिक्षाओं को पेश करने का एक कलात्मक तरीका था। परंपरागत रूप से, यह नृत्य केवल मठों में 'भोकोट' (पुरुष भिक्षुओं) द्वारा, अपने दैनिक अनुष्ठान के एक भाग के रूप में या विशेष त्योहारों को चिह्नित करने के लिए, प्रदर्शन किया जाता था। आज सत्त्रिया नृत्य केवल पौराणिक विषयों तक सीमित नहीं हैं और दोनो पुरुषों और महिलाओं द्वारा मंच पर प्रदर्श्न किया जाता है।
सत्रीया नृत्य कई पहलुओं में विभाजित है जैसे कि: अप्सरा नृत्य, बेहार नृत्य, छली नृत्य, दसावतारा नृत्य, मंचोक नृत्य, नातौ नृत्य, रसा नृत्य, राजघारिया छली नृत्य, गोसाई प्रबेश, बार प्रबेश, झूमूरा, नाडू भंगी और सुत्रधरा। भारतीय शास्त्रीय नृत्य के अन्य सात स्कूलों की तरह, सत्त्रिया नृत्य में भी शास्त्रीय नृत्य शैली के लिए आवश्यक सिद्धांत शामिल हैं : नृत्य और नाट्य शास्त्र के ग्रंथ जैसे कि नाट्यशास्त्र, अभिनयदर्पण और संगीतरत्नाकार; एक विशिष्ट प्रदर्शनों की सूची और नृतता (शुद्ध नृत्य), नृत्य (अर्थपूर्ण नृत्य) और नाट्य (अभिनय) के पहलुओं को अभिनय में शामिल करते हैं।
thumb|खजुराहो नृत्य महोत्सव 2026 में सत्त्रिया नृत्य
इतिहास
सत्रीया नृत्यकला ५०० से अधिक वर्षों से चली आ रही परंपरा हैं। यह नृत्य असम की वैष्णव मठों, जो की सत्र के नाम से जाना जाता है, की परंपरा हैं। यह मूल रूप से पौराणिक नृत्य नाटक के रूप में ब्रह्मचारी भिक्षुओं द्वारा अभ्यास किया था। ये नृत्य नाटक, मुख्य रूप से, असमिया वैष्णव संत और समाज सुधारक श्रीमन्त शंकरदेव और उनके प्रमुख शिष्य माधवदेव द्वारा लिखे एवं अभिनीत किये गये थे। ये ज्यादातर १६ वीं सदी के दौरान लिखे गये थे। इस नृत्य कला को पहले केवल पुरुषों द्वारा प्रदर्शित किया गया था लेकिन अब यह महिला नर्तकियों द्वारा भी किया जाता है। १५ नवम्बर २००० में संगीत नाटक अकादमी ने सत्त्रिया नृत्य को भारत के शास्त्रीय नृत्य रूपों में से एक के रूप में मान्यता दे दी है।
ब्रह्मा द्वारा रचित गन्धर्व वेद या नाट्यवेद और सदाशिव द्वारा रचित द्वादश सहस्री के आधार पर ही मृत्युलोक में भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र की रचना की थी।बिष्णुप्रसाद राभा रचना संभार राभा रचनावली प्रकाशन संघ राभा, बिष्णुप्रसाद नृत्य कला २००८ ७७ यह ईसा पूर्व की शताब्दियों से ही प्रचलित है।सत्रीया संस्कृतिर स्वर्णरेखा लॉयर्स बुक स्टाल देवगोस्वामी, नारायण चंद्र शंकरी संगीत की धारा और मार्गदर्शन १९८४ ५७८, ५७९, ५८८श्रीहस्त मुक्तावली असम प्रकाशन परिषद नेओग, महेश्वर भूमिका २००८ १८ भरत के नाट्यशास्त्र में नृत्य में प्रयोग होने वाली विभिन्न कला-कौशलों के आधार पर इसे चार प्रकार की प्रवृत्तियों में विभाजित किया गया है- दाक्षिणात्य, अवन्ती, पांचाली और ओड्र-मागधी। ओड्र-मागधी भारत के पूर्वी छोर के स्थानों को दर्शाता था। भारत के पूर्वी छोर पर स्थित प्रागज्योतिषपुर ओड्र-मागधी के अंतर्गत आता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान असम नामक भूखंड में ईसा की पहली शताब्दी से ही नृत्य-गीत का प्रचलन था। बाद के समय में भास्कर वर्मन के काल से असम क्षेत्र की नृत्यकला और अधिक उन्नत और विकसित हुई। प्राचीन नृत्यकला को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है- ताण्डव और लास्य। तण्डु मुनि से प्राप्त नृत्य शिक्षा ही ताण्डव नृत्य है। शास्त्रानुसार, ब्रह्मा के आदेश पर उनके द्वारा रचित "अमृतमन्थन" नाटक का भरतमुनि ने मंचन किया था। लेकिन शिव उस नाटक का आनन्द नहीं ले पाए, इसलिए ब्रह्मा ने पुनः "त्रिपुर दाह" की रचना की और हिमालय पर्वत के पीछे इसका मंचन करवाया। किन्तु नृत्य-गीत न होने के कारण शिव असंतुष्ट हुए और शिव के परामर्शानुसार भरतमुनि ने तंडु मुनि से नृत्य की शिक्षा ग्रहण की। तण्डु मुनि से सीखा गया नृत्य ही तांडव नृत्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भास्कर वर्मा के काल से शंकरदेव के पूर्व तक असम में विभिन्न शैलियों के नृत्य प्रचलित थे। शंकरदेव और माधवदेव, इन दोनों वैष्णव गुरुओं ने स्थानीय रूप से प्रचलित नृत्य तत्वों और संस्कृत नाटकों तथा नृत्य का सहारा लेकर असम में एक विशेष श्रेणी के नृत्य का प्रचलन किया, जिन्हें वर्तमान में सत्रीया नृत्य के रूप में जाना जाता है।
शंकरदेव द्वारा प्रवर्तित नृत्य
210px|thumb|right|सत्रीया नृत्य की एक भंगिमा
असम में पहली शताब्दी से ही नृत्य परंपरा प्रचलित थी, लेकिन इसे शास्त्रीय रूप से विकास शंकरदेव के हाथों ही मिला। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के दिशा-निर्देशों और स्थानीय तत्वों को लेकर उन्होंने नृत्य-गीत की एक नई धारा का सृजन किया। बाद में सत्रों में इसका विकास और विस्तार हुआ। इसलिए, भले ही इसकी शुरुआत शंकरदेव ने की थी, लेकिन माधवदेव सहित सभी आता-अतई-संत-महंतों के प्रयासों से सत्रों में विकसित हुई इस नृत्य शैली को "सत्रीया नृत्य" कहा जाता है।<ref name="सत्र">गरियसी साहित्य प्रकाश, ट्रिब्यून भवन गोगोई, मणिमाला सत्रीया नृत्य के निष्ठावान साधक यतीन गोस्वामी २००९ २५ उदाहरण के लिए, चालि नाच और बहा नाच माधवदेव की रचनाएँ हैं। दूसरी ओर, वर्तमान में प्रचलित लोकप्रिय भोरताल नृत्य, जिसे सत्रीया की मान्यता प्राप्त है, बरपेटा सत्र के भक्त नरहरि बुढ़ाभक्त की रचना है।
15 नवंबर 2000 को इस विशिष्ट शैली के नृत्य को संगीत नाटक अकादमी द्वारा भारत के शास्त्रीय नृत्यों में से एक का दर्जा प्रदान किया गया।http://janasadharan.com/yat/32.htm संगीत नाटक अकादमी 24 December 2024 15 October 2007 https://web.archive.org/web/20071015090502/http://janasadharan.com/yat/32.htm yes
माधवदेव का योगदान
शंकरदेव ने अपनी मृत्यु के समय धर्म-कर्म और कला-संस्कृति की रक्षा का भार अपने प्रमुख शिष्य माधवदेव को सौंपा था। इसके बाद माधवदेव ने मथुरादास बुढ़ा आता, नारायण दास ठाकुर आता आदि के साथ मिलकर महापुरुषिया वैष्णव धर्म के साथ-साथ कला-संस्कृति के प्रसार और प्रचार का कार्य किया। उन्होंने बरपेटा में "रंगियाल गृह" का निर्माण किया और युवा कलाकारों को स्त्री वेश में सजाकर चालि नाच का प्रदर्शन करवाया। रामचंद्र ठाकुर के 'गुरु चरित' में उल्लेख है:
हृदयत स्तन खोपा करा सिन्दूर
नयने काजल दिले देखिते प्रचुर।
हाते खारु गले मणि कुण्डल कर्णत
दिला चारि जेठि आरु ज्वले कपालत।
पाट शारी पिन्धाई कापेली दिला माथे।
स्त्री हेन देखे लोके बुलिला साक्षाते।
बेशक, इतना सब करने से पहले माधवदेव को काफी कष्ट सहने पड़े थे। राजा के कोप से बचने के लिए शंकरदेव ने "बड़घर बड़मेल न करने और नर्तकों (नटुवा) को न नचाने" की सलाह दी थी, लेकिन गुरु के देहावसान के बाद नामधर्म की गति धीमी पड़ने लगी। भक्तों को कृष्ण की महिमा के प्रति आकर्षित करने के लिए उन्होंने गुरु के वचनों का उल्लंघन करते हुए रंगियाल गृह का निर्माण कराया।
माधवे बोलन्त आवे कि करिबो आमि
एकखानि कथा कहो शुनियोक तुमि।
चारिगुटि कथा गुरु बुलिलन्त मोक।
नकरिबा बापु आवे हाक दिलो तोक।
बड़ घर बड़ मेल नकरिबा तुमि
नटुवाक नचोवाब हाक देओ आमि।
कहियोक सखि आवे आमि कि करिबो।
केनमते आवे गुरु धर्मक राखिबो।
गुरु धर्म की रक्षा के हित में माधवदेव ने नाट्य-नृत्य का अभ्यास जारी रखा। कोच राजा के मंत्री सुरानंद द्वारा रंगियाल गृह को जला दिए जाने के बाद भी उन्होंने गुप्त रूप से कला-संस्कृति का अभ्यास जारी रखा। बाद में मथुरादास बुढ़ा आता, नारायण दास ठाकुर आता, बरविष्णु आता, भवानीपुरिया गोपाल आता और पद्म आता के सम्मिलित प्रयासों से सत्रीया नृत्य-गीत की यह धारा प्रवाहित होती रही।
thumb|सत्रिया नृत्यांगना प्रियाखी दत्ता और सत्रिया गुरु अभिजीत खटिया बोरुआ के साथ साक्षात्कार
माटी आखरा
सत्रीया नृत्य की प्रारंभिक शिक्षा को माटी आखरा (माटी अखाड़ा) कहा जाता है। शरीर के अंगों का मिट्टी (भूमि) के साथ संबंध रखकर की जाने वाली साधना ही माटी आखरा है। सत्रीया नृत्य के लिए शरीर साधना और हस्त साधना हेतु माटी आखरा किया जाता है। माटी आखरा शरीर के अंग संचालन पर गहरा प्रभाव डालता है।
कुल मिलाकर ६४ माटी आखरा हैं, लेकिन कमलाबाड़ी सत्र में बहत्तर (72) माटी आखरा प्रचलित हैं। कुछ माटी आखरा व्यायाम की प्रकृति के होते हैं, जिन्हें 'लोन' कहा जाता है। माटी आखरा का पहला भाग 'दंडवत' है। कमलाबाड़ी सत्र में प्रचलित माटी आखरा इस प्रकार हैं-
4
धेनु भंगा (धनुष तोड़ना)
काछ बांध (कछुआ मुद्रा)
मता ओरा
माइकी ओरा
बुकु चोवा
गेरोवा चोवा
हात सलोवा
मोइराई पानी खोवा
एटीया हात पकोवा
दुटीया हात पकोवा
पचला तोला
पानी सिंचा
हाड़ भंगा
यातनी
मोरोपा
कँकिला खोचा
खहकी
तेलटुपी
आठुवा
तमाल मोचरा
टेटेला
छलना
छत्रावली
बहि मुरुका
थिय मुरुका
एटीया मुरुका
बाघजाँप (बाघ की छलांग)
भोकोला जाप
ओरात जाप
जलक
सिंह जलक
तिनटीया जलक
चारिटीया जलक
चिटिका
चिटिया नाधेई
उधाचटा
काटि चटा
बहि चटा
ओरा चटा
एटीया चटा
चौघुरी बहि चटा
चौघूरी ओरा चटा
ओरात बहा उटा
आठु लोन
ठिय लोन
काटि लोन
उधा लोन
चौघुरी काटि लोन
काटि खर
चित खर
लुटी खर
मता पाक
माइकी पाक
आकल पाक
शारी पाक
चिता पाक
गेरि पाक
उधा पाक
चेरेकी पाक
उधा चेरेकी पाक
एटीया भरिर पाक
काटि पाक
उरु पाक
टुकुरा पाक
ठेंग मेला टुकुरा पाक
उरपाक टुकुरा
एटीया कामिटना
जोर कामीटना
धेकोरा धेई
धेर धिनाओंता
धिना खितिति तातधेई
धेई दाओ तातखिति नाधेई
माटी आखरा में महारत हासिल करने के बाद, इसे पूर्ण नृत्य में परिवर्तित करना ही सत्रीया नृत्य है। माटी आखरा के भाग वास्तव में नृत्य के सूक्ष्म अंश हैं। इन्हें जोड़कर ही बाद में पूर्ण नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है।
सत्रीया नृत्य प्रचार-प्रसार
इन वर्षों में, सत्रीया नृत्य को असम राज्य के बाहर और भारत से बाहर दोनों में अधिक से अधिक स्वीकृति और संरक्षण प्राप्त हुआ है।https://timesofindia.indiatimes.com/city/thiruvananthapuram/award-presented-to-sattriya-dancer/articleshow/81181259.cms Award presented to Sattriya dancer Thiruvananthapuram News - Times of India Feb 24 TNN / 2021 The Times of India en 2021-08-06 Ist 04:41
नृत्य के प्रकार
thumb|right|ज्योत्सना गोस्वामी द्वारा प्रस्तुत सत्रीया नृत्य
सत्रीया नृत्य विभिन्न प्रकार के होते हैं। मूल रूप से सत्रीया नृत्य के प्रकार नीचे दिए गए अनुसार थे।
2
बहा नाच (बैठकर किया जाने वाला नाच)
चाली नाच
प्रवेश नाच
नादुभंगी नाच
झुमुरा नाच
कृष्ण और रामचंद्र का नाच
बालककृष्ण का नाच
स्त्री नाच
राजा वीर आदि का प्रवेश नाच
ऋषि मुनि, गरुड़ हनुमंत आदि का प्रवेश नाच
युद्ध का नाच
सूत्रधारी नाच
शुद्ध चाली नाच कुल आठ हैं, जबकि राजसी (रजदीनिया) चाली नाच चार प्रकार के हैं।
नृत्य के प्रमुख प्रतिपादक
बापुराम बरबायान अतैई
मनिराम डटा मुकतियार बरबायान
गहन चंद्रा गोस्वामी
जीबेश्वर गोस्वामी
प्रदीप चलीहा
ललित चंद्रा नाथ ओझा
गोपीराम/गुपीराम बरगयन
रामेश्वर सैकिया
हरीचरण सैकिया
कोशा काँटा देवा गोस्वामी
आनंदा मोहन भगवती
गुणकँता डटा बरबायान
प्रभात शर्मा
जतीन गोस्वामी
परमान्दा बरबायान
माणिक बरबायान
घनकन्ता बोरा बरबायान
जिबनजीत डटा
टांकेश्वर हज़ारीका बरबायान
मूही कांत बोरह गायन बरबायान
भाबनांदा बरबायान
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्तकर्ता
मनिराम डटा मुकतियार बरबायान (1963)
बापुराम बरबायान अतैई (1978)
रोसेश्वर सैकिया बरबायान (1980)
इंदिरा पी. पी. बोरा (1996)
प्रदीप चलीहा (1998)
परमान्दा बरबायान (1999 - 2000)
घनकन्ता बोरा बरबायान (2001)
जतिन गोस्वामी (2004)
गुणकँता डटा बरबायान (2007)
माणिक बरबायान (2010)
चित्रावली
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
भाओना
सत्र
बिहु नृत्य
श्रेणी:असम की संस्कृति