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जयतीर्थ
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जयतीर्थ हिन्दू धर्म धोन्डोपन्त रघुनाथ देशपाण्डेSanskrit and Maharashtra: A Symposium https://books.google.com/books?id=jRjeIY5ntUoC 44 रामाचन्द्र नरायण दाण्डेकर पुणे विश्वविद्यलय 1972 Among the authors who wrote on the other schools of Vedānta à mention must first of all be made of Jayatirtha (1365–1388 A. D.). His original name was Dhondo Raghunath Deshpande, and he belonged to Mangalwedha near Pandharpur.The History and Culture of the Indian People: The struggle for empire https://books.google.com/books?id=UQtuAAAAMAAJ 442 रमेश चन्द्र मजुमदार भारतीय विद्या भवन 1966 Jayatirtha, whose original name was Dhondo Raghunātha , was a native of Mangalvedhā near Pandharpur.Vijaynagar Visions: Religious Experience and Cultural Creativity in a South Indian Empire https://books.google.com/books?id=BP5jAAAAMAAJ William J. Jackson Oxford University Press 26 July 2007 145 978-0-19-568320-2 Jaya Tirtha was first named 'Dhondo', and he was the son of Raghunatha, who was a survivor of Bukka's war with the Bahmani Sultanate. Tradition says Raghunatha was from Mangalavede village near Pandharpur. An ancestral house still exists there, and the Deshpandes of Mangalavede claim to be descendents of his family. 1345 CE पंढरपुर के निकट मंगलवेढा (वर्तमान समय में महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में )Sharma 2000 246 रघुनाथ पन्त देशपाण्डे साकुबाई वेदान्त विद्याधीरज तीर्थ
जयतीर्थ ( 1345 - 1388 ई Chang 1991 xviii Sharma 1986 xviii Leaman 2006 177 ) एक हिंदू दार्शनिक, महान द्वैतवादी, नीतिज्ञ और मध्वचार्य पीठ के छठे आचार्य थे। उन्हें टीकाचार्य के नाम से भी जाना जाता है। मध्वाचार्य की कृतियों की सम्यक व्याख्या के कारण द्वैत दर्शन के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण विचारकों में उनकी गिनती होती है। मध्वाचार्य, व्यासतीर्थ और जयतीर्थ को द्वैत दर्शन के 'मुनित्रय' की संज्ञा दी गयी है। वे आदि शेष के अंश तथा इंद्र के अवतार माने गये हैं। Sharma 2000 456 Dalmia Stietencron 2009 165
कृतियाँ
जयतीर्थ ने कोई 22 ग्रन्थों की रचना की जिनमें से १८ ग्रन्थ मध्वाचार्य की कृतियों के भाष्य हैं। Sharma 2000 249 'न्यायसुधा' नामक उनकी कृति मध्वाचार्य के 'अनुव्याख्यान' नामक कृति का भाष्य है। यह उनकी महान कृति है। इसमें लगभग 24,000 श्लोक हैं जिनमें मीमांसा और न्याय दर्शन से लेकर बौद्ध और जैन आदि विविध दर्शनों की आलोचना की गयी है और द्वैत दर्शन को स्थापित किया गया है। सुधा वा पठनीया वसुधा वा पालनीया - यह उद्घोष न्यायसुधा के वैशिष्ट्य को प्रकट करता है।Sharma 2000 330 भाष्यग्रन्थों के अतिरिक्त उन्होंने 4 मूल ग्रंथ भी लिखे हैं जिनमें 'प्रमाणपद्धति' और 'वादावली' विशिष्ट हैं। प्रमाणपद्धति, द्वैत की ज्ञानमीमांसा पर एक संक्षिप्त ग्रन्थ है। 'वादावली' , 'वास्तविकता' और भ्रम की प्रकृति से संबंधित है। Sharma 2000 337
(१) तत्त्वप्रकाशिका टीका (ब्रह्मसूत्र भाष्य टीका)
(२) श्रीमन्न्यायसुधा (अनुव्याख्यान टीका)
(३) न्यायविवरण टीका
(४) प्रमेयदीपिका (गीता भाष्य टीका)
(५) न्यायदीपिका (गीता तात्पर्य टीका)
(६) तत्त्वसंख्यान टीका
(७) तत्त्वविवेक टीका
(८) तत्त्वोद्योत टीका
(९) विष्णुतत्त्वनिर्णय टीका
(१०) मायावाद खण्डन टीका
(११) प्रपंच मिथ्यात्वानुमान खण्डन टीका
(१२) उपाधिखण्डन टीका
(१३) कर्मनिर्णय टीका
(१४) प्रमाणलक्षण
(१५) कथालक्षण टीका
(१६) ईशावास्योपनिषद् भाष्य टीका
(२७)षट् प्रश्नोपनिषद् भाष्य टीका
(१८) ऋग् भास्य टीका
(१९) वादावलि (स्वतंत्र ग्रंथ)
(२०) प्रमाण पद्धति (स्वतंत्र ग्रंथ)
(२१) पद्यमाला (स्वतंत्र ग्रंथ)
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
न्यायसुधा
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