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बरवै
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बरवै रामायण सगुण भक्ति धारा के रामभकती शाखा के कवि तुलसीदास द्वारा लिखी गई है ।
परिभाषा
इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में १२ -१२ मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में ७-७ मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में जगण (ISI )होता है। http://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A5%88_%28%E0%A4%9B%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%29 संग्रहीत प्रति 15 जून 2020 https://web.archive.org/web/20190409123545/http://bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A5%88_(%E0%A4%9B%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6) 9 अप्रैल 2019 live
उदहारण
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित बरवै रामायण से लिया गया छंद:
चम्पक हरवा अंग मिलि,अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे ,जब कुंभिलाय।।
प्रेम प्रीति को बिरवा ,चले लगाय।
सियाहि की सुधि लीजो ,सुखी न जाय।।
ab jivaan ki hai kapii asha koye, kanguriya ki mudri, kangna house.
इन्हें भी देखें
बरवै रामायण
तुलसीदास
श्रेणी :पिंगल शास्त्र
श्रेणी : छंद
सन्दर्भ