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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

महाराजा ध्रुव

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सितंबर 2020 right|thumb|300px|भगवान विष्णु ध्रुव के समक्ष प्रकट हुए। (राजा रवि वर्मा की कलाकृति) हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार ध्रुव भगवान विष्णु के महान तपस्वी भक्त थे। इनकी कथा विष्णु पुराण और भागवत पुराण में आती है। वे उत्तानपाद (स्वयंभू मनु के पुत्र) के पुत्र थे। ध्रुव ने बचपन में ही घरबार छोड़कर तपस्या करने की ठानी। महाराजा ध्रुव के वंशजों को ध्रुव गोत्रीय कहा जाता है।यह ज्यादातर राजगोंड क्षत्रिय समाज और गौड़ ब्राह्मण समाज के लोग इस वंश से अपना दावा करते हैं । क्योंकि ध्रुव के पिता उत्तानपाद राजा थे अर्थात् क्षत्रिय थे।और दादा स्वयंभू मनु ब्रह्मा के वंशज थे अर्थात् ब्राह्मण थे। हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार राजा उत्तानपाद की दो रानियों ने दो पुत्रों को जन्म दिया। रानी सुनीति के पुत्र का नाम 'ध्रुव' और सुरुचि के पुत्र का नाम 'उत्तम' रखा गया। पिता की गोद में बैठने को लेकर सुरुचि ने ध्रुव को फटकारा तो माँ सुनीति ने पुत्र को सांत्वना देते हुए कहा कि वह परमात्मा की गोद में स्थान प्राप्त करने का प्रयास करे। माता की सीख पर अमल करने का कठोर व्रत लेकर ध्रुव ने पांच वर्ष की आयु में ही राजमहल त्याग दिया ध्रुव अपने घर से तपस्या के लिए जा रहे थे रास्ते में उन्हें देवर्षि नारद मिले उन्होंने ध्रुव को"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"का जाप कर के भगवान विष्णु की तपस्या करने को कहा ध्रुव ने नारद जी की बात मानकर एक पैर पर खड़े होकर छह माह तक कठोर तप किया। बालक की तपस्या देख भगवान विष्णु ने दर्शन देकर उसे उच्चतम पद प्राप्त करने का वरदान दिया। इसी के बाद बालक ध्रुव की याद में सर्वाधिक चमकने वाले तारे को नाम ध्रुवतारा दिया गया। इन्हें भी देखें नचिकेता प्रह्लाद श्रेणी:पौराणिक कथाएँ