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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

दूरचित्री फोटोग्राफी

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right|thumb|300px|एदवर्द बेलिन और उसका 'बेलिनोग्राफ' दूरचित्र फोटोग्राफी या 'दूरचित्रण' या 'टेलीफोटोग्राफी' (Wirephoto या Telephotography) विद्युत संकेतों द्वारा (टेलीग्राफ द्वारा या टेलीफोन द्वारा) चित्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने की विधि है। इतिहास सन्‌ 1843 में सर्वप्रथम इंग्लैंड में वेन (Bain) ने तार (telegraphy) द्वारा रेखाचित्रों को भेजने का प्रयास किया था। फोटो को तार से भेजने का सर्वप्रथम प्रयास जर्मनी के कॉर्न (Korn) ने सन्‌ 1902 में किया था। उसे ग्राही केंद्र (receiving station) पर चित्र को फिल्म पर उतारा। सन्‌ 1908 में ये चित्र कई सौ मील तक भेजे जा सकते थे। आधुनिक युग में समाचार भेजने की विधि में हुई उन्नति से दूरचित्रण की भी पर्याप्त उन्नति हुई है। सिद्धान्त दूरचित्रण का सिद्धांत टेलिविजन के चित्र भेजने के सिद्धांत से बहुत सादृश्य रखता है। जो चित्र भेजना होता है, उसे प्रेषक (transmitting) केंद्र पर एक बेलन पर मढ़ देते हैं। अब प्रकाशकिरण द्वारा इस चित्र का क्रमवीक्षण (scanning) किया जाता है। बेलन लगभग 100 चक्कर प्रति मिनट की गति से घूमता रहता है। इस बेलन पर प्रकाशकिरण डाली जाती है, जो चित्र से परावर्तित होकर एक प्रकाशविद्युत सेल (photo-electric cell) या फोटोसेल पर पड़ती है। चित्र पर पड़ने से पहले प्रकाश की तीव्रता एक सेकंड में लगभग 2,400 बार घटत बढ़ती रहती है। इसको वाहक आवृत्ति (carrier frequency) संख्या कहते हैं। चित्र से परावर्तित प्रकाश की तीव्रता चित्र के कालेपन के अनुसार भी कम अधिक होती है। इस प्रकार प्रकाशकिरण की तीव्रता पर वाहक आवृत्तिसंख्या के अतिक्ति एक अन्य आवृत्ति का मॉडुलन (modulation) होता है, जो चित्र के कालेपन के अनुरूप होता है। प्रकाश की यह किरण बेलन के अक्ष के समांतर, अर्थात्‌ चित्र के ऊपरी भाग से निचले भाग की ओर एक मिनट में एक इंच खिसकती रहती है। इतने समय में बेलन 100 चक्कर लगाता है। इससे फोटो का एक इंच में 100 रेखाओं के हिसाब से क्रमवीक्षण हो जाता है। फोटो से परावर्तित होकर प्रकाशकिरण, जब प्रकाश-विद्युत्‌-सेल पर पड़ती है, तब इस सेल से प्रकाश की तीव्रता के अनुरूप मॉडुलित विद्युत संकेत प्राप्त होते हैं। इन संकेतों को प्रवर्धित करके प्रेषक द्वारा लाइन पर प्रेषित कर दिया जाता है। ग्राही केंद्र पर जब ये संकेत प्राप्त होते हैं, तब पहले इन्हें प्रवर्धित किया जाता है। इसके बाद विमाडुलन (demodulation) द्वारा इनमें से वाहक आवृत्ति अलग कर दी जाती है। इस प्रकार प्राप्त विद्युच्छंकेतों को पुन: प्रवर्धित किया जाता है। इन प्रवर्धित संकेतों को एक विद्युतीय प्रकाश स्रोत में देते हैं तो इस स्रोत से उत्पन्न प्रकाश की तीव्रता में परिवर्तन होता है। प्रकाश की तीव्रता में यह परिवर्तन बिल्कुल उसी प्रकार होता है, जैसा प्रेषक केंद्र पर चित्र से परिवर्तित प्रकाश में था। ग्राही केंद्र पर भी एक बेलन घूमता रहता है, जिसका आकार और घूमने की गति बिल्कुल प्रेषक केंद्र के बेलन की ही भाँति होती है। इस बेलन पर एक फोटोग्राफिकीय फिल्म चढ़ी रहती है। उपर्युक्त स्रोत से उत्पन्न प्रकाश इस बेलन पर केंद्रित किया जाता है। इस प्रकाश किरण द्वारा बेलन पर सर्पिलाकार (spiral shaped) रेखाएँ अंकित हो जाती हैं। रेखाओं का कालापन प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करता है। इस तरह फिल्म पर उस चित्र की छाया आ जाती है, जिसे प्रेषक केंद्र से प्रेषित किया गया था। यहाँ यह अति आवश्यक है कि प्रेषक केंद्र तथा ग्राही केंद्र पर बेलनों के घूमने की गति बिल्कुल एक सी हो। इसके लिए दोनों केंद्रों पर एक से स्वरित्र द्विभुज (tuning fork) द्वारा बेलनों को घुमानेवाले मोटरों की गति नियंत्रित की जाती है। यह भी अति आवश्यक है कि प्रेषक तथा ग्राही केंद्र पर क्रमवीक्षण बेलन पर चढ़े फोटो के ऊपरी सिरे से एक साथ आरंभ हो। इसके लिए प्रत्येक चित्र प्रारंभ करने के समय एक संकेत प्रेषित किया जाता है, जो दोनो केंद्रों पर क्रमवीक्षण आरंभ कर देता है। इन्हें भी देखें दूरसंचार का इतिहास श्रेणी:संचार का इतिहास श्रेणी:फोटोपत्रकारिता