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बंगभाषा प्रकाशिका सभा
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मई 2026
बंगभाषा प्रकाशिका सभा कालीनाथ रायचौधुरी , प्रसन्नकुमार ठाकुर , हरचंद्र बंद्योपाध्याय १९३६ कोलकाता बंगाल प्रारंभ में बंगाली भाषा और साहित्य की उत्कृष्टता को बढ़ावा देना और बाद में देशवासियों के हितों के विरुद्ध सरकारी निर्णयों का विरोध करना बांग्ला भाषा अध्यक्ष गौरीशंकर भट्टाचार्य संपादक दुर्गाप्रसाद तर्कपंचानन प्रिंस द्वारकानाथ ठाकुर प्रसन्नकुमार ठाकुर
बंगभाषा प्रकाशिका सभा ब्रिटिश भारत का पहला राष्ट्रवादी राजनीतिक संगठन था। বঙ্গভাষা প্রকাশিকা সভাमई 2026 InternetArchiveBot आधुनिक भारत के जनक और भारत में नए युग के प्रवर्तक राजा राममोहन राय के सहयोगी बंगाल के कुछ कुलीन जमींदारों ने राममोहन राय की मृत्यु के बाद १८३६ ईस्वी में इस संगठन की स्थापना की थी। हालांकि इसकी स्थापना बंगाली भाषा और साहित्य की उत्कृष्टता को बढ़ाने के लिए एक सभा के रूप में की गई थी, लेकिन बाद में देशवासियों के हितों के खिलाफ सरकारी निर्णयों का विरोध करना इस संगठन की मुख्य नीतियों में से एक के रूप में स्वीकार किया गया।
पृष्ठभूमि
उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान पराधीन भारत में विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं, सामाजिक बुराइयों को रोकने और राष्ट्र व जाति की आत्म-प्रतिष्ठा के लिए कई सभाएं और समितियां बनाई गईं। उनमें से प्रमुख थीं -
१८१५ ईस्वी में राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित आत्मीय सभा, जो बाद में १८२८ ईस्वी में ब्राह्म समाज में परिवर्तित हो गई।
१८३८ ईस्वी में द्वारकानाथ ठाकुर की पहल पर 'जमींदार सभा' या 'लैंड होल्डर्स सोसाइटी' या 'भूम्याधिकारी समाज'।
१८६० ईस्वी में राजनारायण बसु द्वारा स्थापित 'सुरापान निवारणी सभा'।
१८६१ ईस्वी में कालीप्रसन्न सिंह द्वारा स्थापित 'विद्योत्साहिनी सभा'।
१८५१ ईस्वी में 'ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन'।
१८७६ ईस्वी में 'इंडियन एसोसिएशन' या भारत सभा की स्थापना हुई, जो बाद में १८८६ ईस्वी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियों में विलीन हो गई।
दूसरी ओर, अविभाजित बंगाल में बंगाली भाषा के अभ्यास और बंगाली में विदेशी पुस्तकों के अनुवाद के संगठित प्रयास के लिए १८१७ ईस्वी में कोलकाता में कलकत्ता स्कूल-बुक सोसाइटी की स्थापना की गई थी। १८३२ ईस्वी में राममोहन राय ने 'सर्वतत्त्वदीपिका सभा' की स्थापना की थी।
इतिहास
१८१३ ईस्वी में ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों द्वारा तैयार की गई पहली शिक्षा नीति पर लंबे विवाद के बाद, १८३५ ईस्वी में सार्वजनिक शिक्षा समिति के अध्यक्ष थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने लॉर्ड विलियम बेंटिक के सामने अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी शिक्षा का प्रस्ताव पेश किया। इसे 'मैकाले मिनट्स' नाम से जाना जाता है। लॉर्ड बेंटिक ने मैकाले की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार को सरकारी नीति घोषित करते हुए पश्चिमी शिक्षा पर जोर दिया।बंगभाषा प्रकाशिका सभा १८३५ ईस्वी में बंगाली भाषियों में भय व्याप्त हो गया। १८३३ ईस्वी में भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद, १८३६ ईस्वी में टाकि के जमींदार कालीनाथ रायचौधरीसुबोध सेनगुप्त और अंजलि बसु द्वारा संपादित, संसाद बंगाली चरिताभिधान, पहला खंड, साहित्य संसाद, कोलकाता, नवंबर २०१३, पृष्ठ १२९, आईएसबीएन : 978-81-7955-135-6, प्रसन्नकुमार ठाकुर, 'संवाद पूर्णचंद्रोदय' पत्रिका के संपादक हरचंद्र बंद्योपाध्याय और अन्य अनुयायियों ने अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के बीच बंगाली भाषा के अभ्यास और उसके हितों की रक्षा के लिए बंगभाषा प्रकाशिका सभा की स्थापना की। उसी वर्ष ८ दिसंबर को प्रसिद्ध लेखक, सुधारक और 'सम्वाद भास्कर' एवं 'सम्वाद रसराज' पत्रिकाओं के संपादक गौरीशंकर भट्टाचार्य की अध्यक्षता में पहली बैठक आयोजित की गई थी। वह भी इस सभा के संस्थापकों में से एक थे। सुबोध सेनगुप्त और अंजलि बसु द्वारा संपादित, संसाद बंगाली चरिताभिधान, पहला खंड, साहित्य संसाद, कोलकाता, नवंबर २०१३, पृष्ठ ४४, आईएसबीएन : 978-81-7955-135-6 पंडित दुर्गाप्रसाद तर्कपंचानन इसके संपादक बने। Bangabhasha Prakasika Sabha (1836) - Modern India History Notes
उद्देश्य और विशेषताएं-
इस संगठन की स्थापना के उद्देश्य ये थे:
बंगाली भाषा और साहित्य का अभ्यास जारी रखना ;
देश के कल्याण के लिए वाद-विवाद के माध्यम से चर्चा और विश्लेषण करना ;
सरकारी नीतियों और कार्यों की आलोचना करना ;
सभा का सत्र हर गुरुवार को आयोजित किया जाता था (बाद में इसे बदल दिया गया) ;
सभा में धार्मिक चर्चा प्रतिबंधित थी।
गतिविधियां-
जब १८२८ ईस्वी में रेगुलेशन एक्ट लागू करके ब्रिटिश राज ने कर-मुक्त भूमि पर कर वसूलना शुरू किया, तो सभा ने इसका कड़ा विरोध किया।
सभा ने अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी शिक्षा के प्रसार में बंगाली भाषा की उपेक्षा न हो, इसके लिए राजनीतिक चेतना बढ़ाने का प्रयास किया।
सरकारी नीतियों और निर्णयों के विरोध के मुद्दे पर इस सभा के सदस्यों के बीच गुटबाजी और मतभेद चरम पर पहुँच गए। इस कारण बंगभाषा प्रकाशिका सभा की अवधि अल्पकालिक रही। भले ही बंगभाषा प्रकाशिका सभा लंबे समय तक नहीं चली, लेकिन यह १८३८ ईस्वी में द्वारकानाथ ठाकुर की पहल पर स्थापित राजनीतिक संगठन 'जमींदार सभा' या 'लैंड होल्डर्स सोसाइटी' की अग्रदूत थी।
टिप्पणी
संवाद प्रभाकर के संपादक ईश्वरचंद्र गुप्त ने अपने समाचार पत्र में लिखा था - "राजकीय विषयों पर विचार करने के लिए जो अन्य सभाएँ बनी थीं, उनमें बंगभाषा प्रकाशिका सभा को प्रथम कहा जाना चाहिए।"
प्रसिद्ध पत्रकार, शोधकर्ता और इतिहासकार योगेशचंद्र बागल ने बंगभाषा प्रकाशिका सभा को भारत का पहला राजनीतिक संगठन बताया है।
सन्दर्भ
श्रेणी:१९३६ में स्थापित संगठन
श्रेणी:१९३६ में भारत में स्थापित
श्रेणी:विलुप्त राजनीतिक संगठन
श्रेणी:भारत स्थित राजनीतिक संगठन
bn:বঙ্গভাষা প্রকাশিকা সভা