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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

षडयंत्र

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thumb|गनपाउडर प्लॉट में षड्यन्त्रकारियों का चित्रण, यूनाइटेड किंगडम की संसद को उड़ाने के लिए 1605 में एक गुप्त योजना तैयार की गई। विधि के सन्दर्भ में, षड्यन्त्र का सामान्य अर्थ साज़िश, धोखा देने की योजना, दुरभिसन्धि, गुप्तरूप से की जाने वाली कार्रवाई आदि के रूप में लिया जाता है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-क के अनुसार आपराधिक षड्यन्त्र की परिभाषा जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी अवैध कार्य या किसी वैध कार्य को अवैध तरीके से करने या करवाने को सहमत होते हैं तो उसे आपराधिक षड्यन्त्र कहते हैं। अर्थात षडयन्त्र के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना आवश्यक है, कोई अवैध कार्य करना/अकरवाना या कोई वैध कार्य अवैध साधनों द्वारा करना/करवाना आवश्यक है। अवैध कार्य – आपराधिक षड्यन्त्र के अपराध को गठित करने के लिए समझौता निश्चयतः विधि विरुद्ध अथवा विधि द्वारा निषिद्ध कोई कार्य करने के लिए होना चाहिए। अवैध साधनों द्वारा – किसी कार्य को, भले ही वह वैध हो, अवैध साधनों द्वारा करने की सहमति षड्यन्त्र मानी जाएगी। कार्य का अन्त साधनों को न्यायोचित नही ठहराता। उदाहरण के लिए प्रतिद्वन्दी व्यापारी को मात देना अवैध कार्य नही है परन्तु सस्ती वस्तुओं के विक्रेता को नष्ट करने के लिए एकीकृत होकर एक दिवालिया क्रेता को ऋण देने के लिए प्रोत्साहन देकर विक्रेता को हानि पहुचाना अवैध होगा। षड्यन्त्र का प्रमाण – आपराधिक षड्यन्त्र हेतु यह आवश्यक नही है कि किये गये अभिकथित समझौते का प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा साबित किया जाए क्योंकि ऐसा साक्ष्य सामान्यतः उपलब्ध नही होता। हीरालाल हरिलाल भगवती बनाम सी.बी.आई. (2003) उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि षड्यन्त्र के अपराध को भारतीय दण्ड संहिताकी धारा 120-B के दायरे में लाने के लिए यह सिद्ध करना आवश्यक है कि पक्षकार के बीच विधिविरुद्ध कार्य करने का करार हुआ था तथापि प्रत्यक्ष साक्ष्य से षड्यन्त्र को सिद्ध करना कठिन है। सेन्ट्रल ब्यूरो आफ इन्वेस्टिगेशन, हैदराबाद बनाम नारायण राव (2012) के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि किसी कार्य का करार आपराधिक षड्यन्त्र का मूल तत्व है। आपराधिक षड्यन्त्र का प्रत्यक्ष साक्ष्य मिलना यदा कदा उपलब्ध होता है यह घटना के पूर्व या बाद की परिस्थितियों के आधार पर सिद्ध किया जाता है। सिद्ध परिस्थितियों को यह स्पष्ट दर्शाना चाहिए कि वे एक करार के अग्रसरण में कारित की गयी है। आपराधिक षड्यन्त्र का आधार करार में निहित है लेकिन एक अवयस्क किसी प्रकार से षड्यन्त्र में शामिल नही हो सकता इसीलिए जब एक अवयस्क के साथ कोई व्यक्ति करार करके आपराधिक षड्यन्त्र गठित करता है तो वहा पर करार शून्य होने के कारण वह व्यक्ति आपराधिक षड्यन्त्र के लिए दायी नही होगा लेकिन वह धारा 107 के अधीन एक अवयस्क के दुष्प्रेरण के अपराध के लिए दायी होगा। धारा 120-B. आपराधिक षड्यन्त्र के लिए दण्ड (१) जो कोई दो वर्ष से अधिक अवधि के कठिन कारावास से दण्डनीय अपराध करने के आपराधिक षड्यन्त्र में शरीक होगा, यदि ऐसे षड्यन्त्र के दण्ड के लिए इस संहिता में अभिव्यक्त उपबन्ध नही है तो, वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण किया था। (२) जो कोई पूर्वोक्त रूप से दण्डनीय अपराध को करने के आपराधिक षड्यन्त्र से भिन्न किसी आपराधिक षड्यन्त्र में शरीक होगा वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि 6 माह से अधिक नही होगी या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जाएगा। आपराधिक षड्यन्त्र और दुष्प्रेरण में अन्तर धारा 120-क आपराधिक षड्यन्त्र की एक विस्तृत परिभाषा प्रदान करती है जिसके अन्तर्गत वे कार्य सम्मिलित हैं जो धारा 107 के अन्तर्गत षड्यन्त्र के माध्यम से दुष्प्रेरण (Abatement) के समतुल्य हैं और इसी कारण जहां कोई आपराधिक षड्यन्त्र धारा 107 के अन्तर्गत दुष्प्रेरण के समतुल्य है वहा धारा 120-क या 120-ख की सहायता आवश्यक है। धारा 107 के अन्तर्गत अपराध गठित होने के लिए कोई कार्य अथवा अवैध लोप षड्यन्त्र के अनुसरण में होना चाहिए, वहीं धारा 120-क में मात्र सहमति ही पर्याप्त है यदि वह किसी अपराध के करने के सम्बन्ध में है। जहां तक षड्यन्त्र के माध्यम से दुष्प्रेरण का सम्बन्ध है दुष्प्रेरक धारा 108 से 117 तक में वर्णित विभिन्न परिस्थितियों के अन्तर्गत दण्डनीय होगा वही धारा 120-A में वर्णित आपराधिक षड्यन्त्र का अपराध धारा 120-B के अन्तर्गत दण्डनीय है। शाब्दिक अर्थ किन्तु विश्लेषणात्मक रूप से देखें तो 'षड्यन्त्र' शब्द इस प्रकार बना है :- षड्+यन्त्र = षड्यन्त्र , अर्थात् छह यन्त्र या छह विधियाँ । इसमें जिन छह विधियों के बारे में बताया जाता है, वे हैं :- जारण , मारण , उच्चाटन , मोहन , स्तम्भन , विध्वंसन । इन्ही छह यन्त्रों या छह विधियों के माध्यम से 100 (सौ) वर्गों के समावेश करके लकड़ी के पटल मे षड्ययन्त्र खेला जाता है| आज आधुनिक समय मे 64 (चौंसठ) वर्गो के पटल मे चेस (CHESS) को खेला जाता है| 1. जारण :- ‘जारण’ का अर्थ जलाना या भस्म करना है । यह संस्कृत के ‘ज्वल्’ से निकला है । 2. मारण :- ‘मारण’ यन्त्र का आशय एकदम स्पष्ट है । शत्रु का अस्तित्व समाप्त करना ‘मारण’ कहलाता है । 3. उच्चाटन :- ‘उच्चाटन’ का अर्थ है स्थायी भाव मिटाना । वर्तमान परिस्थिति को भंग कर देना । उखाड़ना, हटाना आदि । विरक्ति, उदासीनता या अनमनेपन के लिए आम तौर पर हम जिस उचाट, दिल उचटने की बात करते हैं उसके मूल में संस्कृत का ‘उच्चट’ शब्द है जो ‘उद्’ और ‘चट्’ के मेल से बना है । उद्-चट् की सन्धि उच्चट होती है । ‘उद’ यानी ऊपर ‘चट्’ यानी छिटकना, अलग होना, पृथक होना आदि । ‘उच्चाटन’ भी इसी उच्चट से बना है जिसका अर्थ हुआ उखाड़ फेंकना, जड़ से मिटाना, निर्मूल करना आदि । 4. मोहन :- जब ‘जारण’, ‘मारण’, ‘उच्चाटन’ जैसे यन्त्रों से काम नहीं बनता तो ‘मोहिनी विद्या’ काम आती है । ‘मोहन’ का अर्थ है मुग्ध होना । इसके मूल में ‘मुह्’ धातु है जिसका अर्थ है सुध बुध खोना, किसी के प्रभाव में खुद को भुला देना । अक्सर नादान लोग ऐसा करते हैं और इसीलिए ऐसे लोग ‘मूढ़’ कहलाते हैं । मूढ़ भी ‘मुह्’ से ही निकला है और ‘मूर्ख’ भी । ‘मोहन यन्त्र’ का मक़सद शत्रु पर ‘मोहिनी शक्ति’ का प्रयोग कर उसे मूर्छित करना है । श्रीकृष्ण की छवि में ‘मोहिनी’ थी इसलिए गोपिकाएँ अपनी सुध-बुध खो बैठती थीं इसलिए उन्हें ‘मोहन’ नाम मिला । 5. स्तम्भन :- पाँचवी विधि है ‘स्तम्भन’ जिसका अर्थ है जड़ या निश्चेष्ट करना । यह ‘स्तम्भ’ से बना है । जिस तरह से काठ का खम्भा कठोर, जड़ होता है उसी तरह किसी सक्रिय चीज़ को स्तम्भन के द्वारा निष्क्रिय बनाया जाता था । 6. विध्वंसन :- षड्यन्त्र की छठी और आखिरी प्रणाली है ‘विध्वंसन’ अर्थात पूरी तरह से नाश करना। श्रेणी:शब्दार्थ