Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

महाविद्या

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

right|thumb|300px|दस महाविद्याएँ दशमहाविद्या अर्थात महान विद्या रूपी देवी। महाविद्या, देवी पार्वती के दस रूप हैं, जो अधिकांश तान्त्रिक साधकों द्वारा पूजे जाते हैं, परन्तु साधारण भक्तों को भी अचूक सिद्धि प्रदान करने वाली है। इन्हें दस महाविद्या के नाम से भी जाना जाता है। ये दसों महाविद्याएं आदि शक्ति माता पार्वती की ही रूप मानी जाती हैं। दस महाविद्या विभिन्न दिशाओं की अधिष्ठातृ शक्तियां हैं। भगवती काली और तारा देवी- उत्तर दिशा की, श्री विद्या (षोडशी-त्रिपुर सुन्दरी)- ईशान दिशा की, देवी भुवनेश्वरी, पश्चिम दिशा की, श्री त्रिपुर भैरवी, दक्षिण दिशा की, माता छिन्नमस्ता, पूर्व दिशा की, भगवती धूमावती पूर्व दिशा की, माता बगला (बगलामुखी), दक्षिण दिशा की, भगवती मातंगी वायव्य दिशा की तथा माता श्री कमला र्नैत्य दिशा की अधिष्ठातृ है। कहीं-कहीं 24 विद्याओं का वर्णन भी आता है। लेकिन विश्व के प्राचीन आगम तंत्र (चीनानाचार) के अनुसार दशमहाविद्या की साधना का उल्लेख है परंतु मूलतः दस महाविद्या ही प्रचलन में है। इनके दो कुल हैं। इनकी साधना 2 कुलों के रूप में की जाती है। श्री कुल और काली कुल। इन दोनों में नौ-नौ देवियों का वर्णन है। इस प्रकार ये 18 हो जाती है। कुछ ऋषियों ने इन्हें तीन रूपों में माना है। उग्र, सौम्य और सौम्य-उग्र। उग्र में काली, छिन्नमस्ता, धूमावती और बगलामुखी है। सौम्य में त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी और महालक्ष्मी (कमला) है। तारा तथा भैरवी को उग्र तथा सौम्य दोनों माना गया है। देवी के वैसे तो अनंत रूप है पर इनमें भी तारा, काली और षोडशी के रूपों की पूजा, भेद रूप में प्रसिद्ध हैं। भगवती के इस संसार में आने के और रूप धारण करने के कारणों की चर्चा मुख्यतः जगत कल्याण, साधक के कार्य, उपासना की सफलता तथा दानवों का नाश करने के लिए हुई। "सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत। अतोऽहम् विश्वरूपा त्वां नमामि परमेश्वरी।।" अर्थात् ये सारा संसार शक्ति रूप ही है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए।खुलासा टीम दस महाविद्या रहस्य https://www.khulasaa.in/dharm-karam/solve-every-problem-with-dus-mahavidya/ खुलासा डॉट इन 21 अप्रैल 2019 https://web.archive.org/web/20190417101634/https://www.khulasaa.in/dharm-karam/solve-every-problem-with-dus-mahavidya/ 17 अप्रैल 2019 dead महाविद्या विचार का विकास शक्तिवाद के इतिहास में एक नया अध्याय बना जिसने इस विश्वास को पोषित किया कि सर्व शक्तिमान् एक नारी है। शाब्दिक अर्थ महाविद्या शब्द संस्कृत भाषा के शब्दों "महा" तथा "विद्या" से बना है- "महा" अर्थात महान्, विशाल, विराट ; तथा "विद्या" अर्थात ज्ञान। दस महाविद्याएँ और उनके भैरव शाक्त भक्तों के अनुसार "दस रूपों में समाहित एक सत्य की व्याख्या है - महाविद्या" जिससे जगदम्बा के दस लौकिक व्यक्तित्वों की व्याख्या होती है। महाविद्याएँ तान्त्रिक प्रकृति की मानी जाती हैं , उनके स्वरूप सहित भैरव के नाम महाकाली - काल भैरव तारा - अक्षोभ्य भैरव छिन्नमस्ता - कबंध भैरव षोडशी पंचवक्त्र / त्रिपुरेश भैरव भुवनेश्वरी - त्रियम्बकम भैरव भैरवी - दक्षिण मूर्ति भैरव धूमावती - भैरव नहीं है बगलामुखी - एकवक्त्र भैरव मातंगी - मातंग भैरव कमला - विष्णु भैरव शाक्त दर्शन, दस महाविद्याओं को भगवान विष्णु के दस अवतारों से सम्बद्ध करता है और यह व्याख्या करता है कि महाविद्याएँ वे स्रोत हैं जिनसे भगवान विष्णु के दस अवतार उत्पन्न हुए थे। महाविद्याओं के ये दसों रूप चाहे वे भयानक हों अथवा सौम्य, जगज्जननी के रूप में पूजे जाते हैं। महाविद्याओं के भैरव महाकाली - काल भेरव तारा - अक्षोभ्य बाला भुवनेशा - षोडशी विद्येशा - भैरवी - भैरव छिन्नमस्तिका - धूमावती - बगलामुखी - मातंगी - कमला - पौराणिक कथा श्री देवीभागवत पुराण के अनुसार महाविद्याओं की उत्पत्ति भगवान शिव और उनकी पत्नी सती, जो कि पार्वती का पूर्वजन्म थीं, के बीच एक विवाद के कारण हुई। जब शिव और सती का विवाह हुआ तो सती के पिता दक्ष प्रजापति दोनों के विवाह से खुश नहीं थे। उन्होंने शिव का अपमान करने के उद्देश्य से एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमन्त्रित किया लेकिन द्वेषवश उन्होंने अपने जामाता भगवान शंकर और अपनी पुत्री सती को निमन्त्रित नहीं किया। सती, पिता के द्वारा आयोजित यज्ञ में जाने की जिद करने लगीं जिसे शिव ने अनसुना कर दिया, इस पर सती ने स्वयं को एक भयानक रूप में परिवर्तित (महाकाली का अवतार) कर लिया। जिसे देख भगवान शिव भागने को उद्यत हुए। अपने पति को डरा हुआ जानकर माता सती उन्हें रोकने लगीं तो शिव जिस दिशा में गये उस दिशा में माँ का एक अन्य विग्रह प्रकट होकर उन्हें रोकता है। इस प्रकार दसों दिशाओं में माँ ने वे दस रूप लिए थे वे ही दस महाविद्याएँ कहलाईं। इस प्रकार देवी दस रूपों में विभाजित हो गयीं जिनसे वह शिव के विरोध को हराकर यज्ञ में भाग लेने गयीं। वहाँ पहुँचने के बाद माता सती एवं उनके पिता के बीच विवाद हुआ। दक्ष प्रजापति ने शिव की निंदा की और सती ने यज्ञ कुंड में प्राणों की आहुति दे दी। इन्हें भी देखें त्रिपुरसुन्दरी तारा सन्दर्भ श्रेणी:महाविद्या