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पिट्स इंडिया एक्ट

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पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 (Pitt's India Act, 1784) अधिनियम की पृष्ठभूमि और प्रमुख कारण (Causes) 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट की विफलता: 1773 के एक्ट ने गवर्नर-जनरल और उसकी 4 सदस्यीय परिषद के बीच गतिरोध पैदा कर दिया था। परिषद में बहुमत न होने पर वॉरेन हेस्टिंग्स के फैसले रुक जाते थे। भ्रष्टाचार और वित्तीय संकट: कंपनी के अधिकारी निजी व्यापार से अत्यधिक अमीर हो रहे थे, जबकि कंपनी भारी कर्ज में डूबकर ब्रिटिश सरकार से बेलआउट मांग रही थी। मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी की मनमानी: दोनों प्रेसीडेंसियों ने बिना बंगाल की पूर्व अनुमति के मराठों और मैसूर के साथ युद्ध छेड़ दिए, जिससे भारी वित्तीय और राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई। फॉक्स का इंडिया बिल (1783): चार्ल्स जेम्स फॉक्स ने कंपनी के नियंत्रण को सीधे संसद के अधीन लाने वाला बिल पेश किया था, जो हाउस ऑफ लॉर्ड्स में गिर गया और सरकार गिर गई। इसके बाद नए प्रधानमंत्री विलियम पिट ने यह संशोधित एक्ट पेश किया। मुख्य उद्देश्य (Objectives) ईस्ट इंडिया कंपनी के वाणिज्यिक (Commercial) और राजनीतिक (Political) कार्यों को स्पष्ट रूप से विभाजित करना। भारत में ब्रिटिश सरकार की संप्रभुता और अंतिम निगरानी शक्ति स्थापित करना। गवर्नर-जनरल की शक्तियों को मजबूत कर प्रशासनिक गतिरोध को खत्म करना। भारत में बिना अनुमति के क्षेत्रीय विस्तार और महंगे युद्धों पर रोक लगाना। प्रमुख व्यक्तित्व (Key Figures) विलियम पिट 'द यंगर' (William Pitt the Younger): ब्रिटेन के तत्कालीन सबसे युवा प्रधानमंत्री, जिन्होंने ब्रिटिश क्राउन और कंपनी के शेयरधारकों के बीच संतुलन साधते हुए यह कानून तैयार किया। वॉरेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings): भारत के पहले गवर्नर-जनरल, जिनके कार्यकाल के प्रशासनिक संघर्षों और युद्धों ने इस कानून की तात्कालिक आवश्यकता तय की। लॉर्ड कॉर्नवालिस (Lord Cornwallis): इस एक्ट के ढांचे के तहत पूर्ण प्रशासनिक और सैन्य अधिकार लेकर भारत आने वाले पहले गवर्नर-जनरल (1786)। सफलताएं और असफलताएं (Achievements vs Failures) पहलूक्या हासिल हुआ (What was Achieved)क्या हासिल नहीं हुआ (What was Not Achieved)प्रशासनिक नियंत्रणबोर्ड ऑफ कंट्रोल (6 सदस्य) के जरिए ब्रिटिश कैबिनेट का सीधा राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हुआ।बोर्ड ऑफ कंट्रोल और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के बीच अधिकारों की अस्पष्टता से कई बार प्रशासनिक भ्रम बना रहा।निर्णय प्रक्रियागवर्नर-जनरल की परिषद घटाकर 3 सदस्य कर दी गई, जिससे एक सदस्य के समर्थन और अपने कास्टिंग वोट से गवर्नर-जनरल मजबूत हुआ।गवर्नर-जनरल को परिषद के फैसले को पूरी तरह खारिज करने (वीटो) की शक्ति 1786 के संशोधन अधिनियम के बाद ही मिल सकी।विस्तारवादी नीतिएक्ट ने आधिकारिक रूप से घोषणा की कि "भारत में साम्राज्य विस्तार ब्रिटिश राष्ट्र के सम्मान और नीति के विरुद्ध है।"आक्रामक विस्तार रुका नहीं; लॉर्ड वेलेजली जैसे बाद के गवर्नरों ने सहायक संधि (Subsidiary Alliance) के जरिए निरंतर विस्तार जारी रखा।संवैधानिक स्थितिपहली बार आधिकारिक तौर पर कंपनी के क्षेत्रों को "ब्रिटिश अधिकृत भारतीय प्रदेश" (British Possessions in India) घोषित किया गया।कंपनी की स्थानीय लूट और वाणिज्यिक एकाधिकार पर तत्काल पूर्ण रोक नहीं लग सकी। पिट्स इंडिया एक्ट ने भारत में द्वैध शासन प्रणाली (Dual System of Control) की ठोस नींव रखी, जो 1858 तक चली। इसने कंपनी की स्वायत्तता को समाप्त किए बिना भारत के राजनीतिक भाग्य की चाबी ब्रिटिश संसद को सौंप दी और आधुनिक केंद्रीकृत ब्रिटिश भारतीय शासन तंत्र का खाका तैयार किया।Joshi V.C. 1972-06 Book Reviews : National Archives of India, Index to the Foreign and Political Department Records, Vol. II, 1781-83, Manager of Publications, Government of India, 1968, pp. ix, 414, Rs. 28.00. National Archives of India, Descriptive List of Secret Department Records, Vol. II, 1776-80 (Editor: K. D. Bhargava), Manager of Publications, Government of India, Delhi, 1969, pp. xv, 406, Rs. 35.75 https://doi.org/10.1177/001946467200900209 The Indian Economic & Social History Review 9 2 231–233 10.1177/001946467200900209 0019-4646 चार्टर एक्ट, 1813 (Charter Act of 1813) __सूचीबद्ध__ __विषय_जोड़ें_कड़ी__