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सगुण ब्रह्म
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परमात्मा का वह रूप जो तीन प्राकृतिक गुणों सत्व, रज और तम से परे है,तथा जिसमे माधुर्य,ऐश्वर्य,औदार्य आदि जो दिव्य गुण है उनके सहित सर्वत्र व्यापक परमात्मा को सगुण कहते है।
जब ब्रह्म, कर्ता का भाव ग्रहण करता है जैसे सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, संहारकर्ता आदि या जब ब्रह्म के साथ कोई विशेषण लगता है जैसे सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् आदि तब वह सगुण ब्रह्म या ईश्वर कहलाता है।
मध्यकाल से उत्तरीय भारत में भक्तिमार्ग के दो भिन्न संप्रदाय हो गए थे। एक ईश्वर के निर्गुण, निराकर रूप का ध्यान करता हुआ मोक्ष की प्राप्ति की आशा रखता था और दूसरा ईश्वर का सगुण रूप राम, कृष्ण आदि अवतारों में मानकर उनकी पूजा कर मोक्ष की इच्छा रखता था। पहले मत के कबीर, नानक आदि मुख्य प्रचारक थे और दूसरे के तुलसी, सूर आदि।
श्रेणी:हिन्दू धर्म