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411 समाचार
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विष्णु वामन शिरवाडकर कुसुमाग्रज

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विष्णु वामन शिरवाडकर 200px कुसुमाग्रज death_place भारतीय अंगूठाकार|विष्णु वामन शिरवाडकर कुसुमाग्रज विष्णु वामन शिरवाडकर कुसुमाग्रज (27 फरवरी 1912 – 10 मार्च 1999) एक मराठी साहित्यकार थे। इन्हें 1987 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। भारतीय साहित्य में विशिष्ट एवं सक्रिय योगदान के लिए वर्ष 1987 का ज्ञानपीठ पुरस्कार श्री विष्णु वामन शिरवाडकर को समर्पित किया गया । मराठी काव्य और नाटक को, 'कुसुमाग्रज' के नाम से लोकप्रिय, शिरवाडकर की देन अमूल्य है। तथापि उन्होंने प्रमुखतः एक कवि के रूप में समसामयिक साहित्यिक परिदृश्य पर गहरी छाप छोड़ी है। चिंतन के क्षेत्र की ऊंचाइयों तक पहुंचती प्रकृति और प्रणय के ऐन्द्रिय पक्षों की सूक्ष्म चेतना के धनी कुसुमाग्रज सामाजिक जीवन में अन्याय, असमानता तथा अत्याचार से उपजते द्वन्द्ध का चित्रण भी करते हैं। उनका प्रेरणादायक आदर्शवाद जीवन के अन्धकारमय तथा विद्रूप पक्ष की अवहेलना नहीं करता। परन्तु वह इस अन्धकार को विजित करनेवाली मानव-शक्ति के प्रति तीव्रतापूर्वक सचेत हैं। अतः उनका काव्य गीतात्मक तथा विचारात्मक दोनों ही है। कुसुमाग्रज की कविता को विशिष्टता-मंडित करने वाली बहुमुखी कल्पना अमूर्त को रूप प्रदान करती है, असीम को सीमाओं में खींच लाती है और राग-दीप्त बिम्ब रचती है। और यह असामान्य कल्पना स्वयं एक ऐसी शैली एवं भाषा में उली है जिसमें क्लासिकी संस्कृत की महिमा तथा गरिमा विद्यमान हैं। यह गहन कविता शिरवाडकर के नाटकों में भी व्याप्त है। अकेला 'नटसम्राट' ही उन्हें खाडिलकर तथा गडकरी जैसे महान नाटककारों की परम्परा में रखने के लिए पर्याप्त है। उनके नाटकों के केन्द्र में सामान्यतः बाजीराव, झांसी की रानी, ययाति, बेलवलकर आदि जैसा कोई एक सशक्त व्यक्तित्व होता है जो नियति तथा परिस्थितियों से संघर्ष करता है। शिरवाडकर में इस संघर्ष की एक अद्वितीय तदनुभूति है तथा वह उसे समृद्ध कविता, उच्च भावावेग तथा प्रबल नाटक से रंग देते हैं। कविता पर कुसुमाग्रज के विचार बहुत ही अनोखे थे, कविता का विश्लेषण करते हुए वे लिखते हैं- "कविता एक इंसान और उसके आस-पास के हालात के बीच बातचीत है! इंसान की यह बेसिक आदत है कि हम जो महसूस करते हैं, उसे दूसरे इंसान तक पहुंचाते हैं। इंसान की इसी आदत से कविता बनती है। जब कोई कवि अपनी रचना के ज़रिए कोई अनुभव बताता है, तो वह अनुभव सिर्फ़ उसका नहीं, बल्कि सबका होता है, और इससे कवि को यह संतुष्टि मिलती है कि वह और बड़ा हो गया है।" उनकी रचना 'वेदत मराठे वीर दौले सात' को उनकी कविता के विश्लेषण का एक सही उदाहरण कहा जा सकता है। यह रचना बहादुरी की कहानी है, उन वीरों की जिन्होंने स्वराज्य की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, उन वफ़ादार मावलों की जो छत्रपति शिवाजी महाराज से बिना शर्त प्यार करते थे! इस कहानी को शब्दों में पिरोते हुए कुसुमाग्रज ने घटना को इतने असलियत के साथ बताया है कि हमें ऐसा लगता है जैसे यह सब हमारी आंखों के सामने हो रहा हो। कड़तोजी गूजर याल, जो मुगलों के अन्याय से गांव की रक्षा करते हैं। वी.वी. शिरवाडकर का असली नाम गजानन रंगनाथ शिरवाडकर था, चाचा के गोद लेने के बाद उनका नाम विष्णु वामन शिरवाडकर रखा गया। उनका जन्म 27 फरवरी, 1912 को हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई पीपलगांव में की। उन्होंने अपनी सेकेंडरी पढ़ाई नासिक के न्यू इंग्लिश स्कूल में की, जो अब जे.एस. रुंगथा विद्यालय है। उन्होंने मुंबई यूनिवर्सिटी से मैट्रिक की परीक्षा पास की। कुसुमाग्रज 1930 में एच.पी. ठाकरे स्कूल में थे, तब उनकी कविताएँ 'रत्नाकर' मैगज़ीन में छपी थीं। उन्होंने 1932 में कालाराम मंदिर में अछूत माने जाने वाले लोगों को मंदिर में प्रवेश दिलाने के लिए सत्याग्रह में भाग  लिया, जिससे उनके बचपन की लिखाई बड़े होने की चमक हासिल कर ली और उनका साहित्य धीरे-धीरे आसमान तक पहुँच गया। कुसुमाग्रज को ज़रूरतमंद और गरीब लोगों के प्रति बहुत हमदर्दी थी। आदिवासी लोगों के लिए उनका प्यार उनके काम में साफ़ दिखता है। इसीलिए उन्होंने कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान की योजना बनाई। जिसके लिए उन्होंने 1 लाख रुपये दान दिए। उन्होंने कई स्वयंसेवकों को साथ लिया और सामाजिक हित हेतु अनेक योजनाओं को क्रियान्वित किया, जैसे- बड़ों की शिक्षा, स्वास्थ्य  सुविधाएँ, सांस्कृतिक और विविध खेलों के कैंप शामिल थे। नासिक के आस-पास के 7 गाँवों को गोद लिया और इन सभी में कुसुमाग्रज लाइब्रेरी स्थापित करने में मदद की। वे 1962 से 1972 तक नासिक की मशहूर पब्लिक लाइब्रेरी के प्रेसिडेंट रहे। 1942 में प्रकाशित कविता संग्रह  'विशाखा' मराठी साहित्य की अनुपम कृति मानी जाती है और आज भी मराठी साहित्य प्रेमियों को आकर्षित करता है। 1946 में, उपन्यास 'वैष्णव' और नाटक 'दूरचे दिवे' प्रकाशित हुए । 1960 और 1966 के बीच 'मराठी माटी', 'स्वागत', 'हिमरेखा' , 'ययाति और देवयानी' और 'विज अकाबिली धरती' भी प्रकाशित हुए ।  'नटसम्राट' न केवल उनकी कलम से निकली सबसे अच्छी कलाकृति थी, बल्कि उनके रंगमंच प्रयोग भी बहुत लोकप्रिय हुए। मराठी रंगमंच-प्रेमियों ने उनका ज़बरदस्त स्वागत किया। इस नाटक ने, जो एक बहुत ही संवेदनशील और भावनात्मक विषय पर था, बुज़ुर्गों का नज़रिया बदल दिया क्योंकि इस नाटक को देखने के बाद कई बुज़ुर्गों ने अपनी सोच बदल ली। बुज़ुर्गों के प्रति युवाओं का नज़रिया भी बदल गया। उन्होंने न केवल कविताएँ बल्कि कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, आदि विधाओं में साहित्य-सृजन किया और प्रभा वीकली, प्रभात अख़बार, सारथी, धनुर्धारी और नवयुग में पत्रकारिता भी की। उनके पसंदीदा लेखक पी. जी. वुडहाउस और पसंदीदा एक्टर चार्ली चैपलिन थे। उनकी अधिकाँश साहित्यिक रचनाओं को राज्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।       कुसुमाग्रज जी बहुत ही सरल स्वभाव के व्यक्ति थे और अपने अंतिम समय तक बहुत ही विनम्र और नेक-दिल इंसान  बने रहे। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत मार्गदर्शन दिया । उनका मानना ​​था कि आज का शिक्षा में परीक्षा-व्यवस्था  बच्चों के लिए एक क्रूर व्यवस्था है। वे हमेशा लोगों को उचित मार्गदर्शन देते थे तभी तो उनका घर एक तीर्थस्थल बन गया था। कुसुमाग्रज जी की याद में स्थापित कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान समाज के गरीब, ज़रूरतमंद और पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए समर्पित होकर कार्य कर रहा है । साहित्य रचना कविता संग्रह अक्षरबाग (१९९0) किनारा(१९५२) चाफा(१९९८) छंदोमयी (१९८२) जाईचा कुंज (१९३६) जीवन लहरी(१९३३) थांब सहेली (२००२) पांथेय (१९८९) प्रवासी पक्षी (१९८९) मराठी माती (१९६०) महावृक्ष (१९९७) माधवी(१९९४) मारवा (१९९९) मुक्तायन (१९८४) मेघदूत(१९५६) रसयात्रा (१९६९) वादळ वेल (१९६९) विशाखा (१९४२) श्रावण (१९८५) समिधा ( १९४७) स्वगत(१९६२) हिमरेषा(१९६४) निबंधसंग्रह आहे आणि नाही (पुस्तक) - लघुनिबंध संग्रह प्रतिसाद (पुस्तक) - लघुनिबंध संग्रह नाटक ऑथेल्लो आनंद आमचं नाव बाबुराव एक होती वाघीण किमयागार कैकेयी कौंतेय जेथे चंद्र उगवत नाही दिवाणी दावा दुसरा पेशवा दूरचे दिवे (रूपांतरित, मूळ इंग्रजी नाटक ॲन आयडियल हजबंड. लेखक ऑस्कर वाईल्ड) देवाचे घर नटसम्राट नाटक बसते आहे बेकेट महंत मुख्यमंत्री ययाति देवयानी राजमुकुट विदूषक वीज म्हणाली धरतीला वैजयंती कथासंग्रह अंतराळ (कथासंग्रह) अपॉईंटमेंट (कथासंग्रह) एकाकी तारा काही वृद्ध काही तरुण (कथासंग्रह) जादूची होडी (बालकथा) प्रेम आणि मांजर (कथासंग्रह) फुलवाली (कथासंग्रह) बारा निवडक कथा (कथासंग्रह) सतारीचे बोल (कथासंग्रह) उपन्यास कल्पनेच्या तीरावर जान्हवी वैष्णव आठवणीपर वाटेवरच्या सावल्या (पूर्वीचे नाव- विरामचिन्हे) एकांकी नाटक दिवाणीदावा १९५४, ४ आवृत्ती १९७३. देवाचे घर १९५५, २री आवृत्ती १९७३. नाटक बसते आहे आणि इतर एकांकिका१९६०, २ री आवृत्ती १९८६. प्रकाशाची दारे मौज दिवाळी अंक, १९५९. बेत, दीपावली, १९७०. संघर्ष, सुगंध दिवाळी अंक, १९६८. लघुनिबंध और इतर लेखन आहे आणि नाही एकाकी तारा एखादं पण, एखादं फूल प्रतिसाद बरे झाले देवा मराठीचिए नगरी विरामचिन्हे कुसुमाग्रज संबंधी पुस्तकें कुसुमाग्रज शैलीचे अंतरंग (डाॅ. सुरेश भृगुवार) कुसुमाग्रज/शिरवाडकर : एक शोध, लेखक : द.दि. पुंडे, मेहता प्रकाशन, पुणे, १९९१, (दुसरी आवृत्ती) कुसुमाग्रजांचा सामाजिक साहित्यविचार : डॉ. देवानंद सोनटक्के लिखित 'समीक्षेची अपरूपे-हर्मिस प्रकाशन (पुणे, २०१७) या पुस्तकातील एक लेख कुसुमाग्रजांच्या प्रतिभेचा उगम आणि विकास (डाॅ. द.दि. पुंडे) भारतीय साहित्याचे निर्माते कुसुमाग्रज (अनुवादित, मूळ इंग्रजी लेखक, निशिकांत मिरजकर; मराठी अनुवाद - अविनाश सप्रे, साहित्य अकादमी, २०११) सौंदर्याचे उपासक कुसुमाग्रज (संपादक - डाॅ. नागेश कांबळे) वि.वा. शिवाडकरांसंबंधी पुस्तकें रूपरेषा, वि.वा .शिरवाडकर, संपादक : सुभाष सोनवणे, चेतश्री प्रकाशन, अमळनेर, १९८४ शिरवाडकरांची नाटके (शोभा देशमुख) पुरस्कार महाराष्ट्र सरकार का उत्कृष्ट पुस्तक के लिये पुरस्कार ’मराठी माती’ला (१९६० में) ’स्वगत’ला (१९६२ में) ’हिमरेषा’ला १९६२ साली ’नटसम्राट’ला (१९७१ में) ’नटसम्राट’ला साहित्य अकादमीचा पुरस्कार (१९७४) "ययाती आणि देवयानी" या नाटकास १९६६ या वर्षी तर संगीत "वीज म्हणाली धरतीला" या नाटकास १९६७ मध्ये राज्य शासनाचे पुरस्कार मिळाले. विशाखा कवितासंग्रहाला ज्ञानपीठ पुरस्कार भारत सरकारचा साहित्यक्षेत्रातील योगदानाबद्दल पद्मभूषण पुरस्कार (१९९१ साली) भारत सरकारचा ज्ञानपीठ पुरस्कार अखिल भारतीय नाट्यपरिषदेचा "राम गणेश गडकरी" पुरस्कार त्यांना १९६५ मध्ये प्राप्त झाला‌. अंतराळातील एका ताऱ्यास "कुसुमाग्रज" हे नाव दिले गेले आहे. १९७४ साली 'नटसम्राट' नाटकाला 'साहित्यसंघ' पुरस्कार मिळाला. १९८६ मध्ये पुणे विद्यापीठाने त्यांना डि.लिट्. (D.Litt.) ही सन्माननीय पदवी प्रदान केली. १९८८ मध्ये संगीत नाटयलेखन पुरस्कार मिळाला. वि.वा. शिरवाडकरांना मिळालेले सन्मान १९६० मध्ये मुंबई मराठी ग्रंथसंग्रहालयाच्या अध्यक्षपदी निवड १९६४ च्याच मडगाव येथील अखिल भारतीय मराठी साहित्यसंमेलनाचे अध्यक्षपद त्यांनी भूषवले. १९७० साली कोल्हापूर येथे भरलेल्या ५१व्या मराठी नाट्यसंमेलनाचे अध्यक्षपद १९९० साली मुंबईत भरलेल्या पहिल्या जागतिक मराठी परिषदेचे ते अध्यक्ष होते. त्यांचा जन्म दिवस (२७ फेब्रुवारी) हा मराठी भाषा दिवस म्हणून साजरा केला जातो. कुसुमाग्रज के नाम से पुरस्कार नक्षत्राचे देणे काव्यमंच संस्थेचा कुसुमाग्रज स्मृति गौरव पुरस्कार : हा कवी प्रा. शांताराम हिवराळे यांना मिळाला होता. यशवंतराव चव्हाण मुक्त विद्यापीठाच्या कुसुमाग्रज अध्यासनाच्यावतीने देण्यात येणारा कुसुमाग्रज राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान (नाशिक) यांच्यातर्फे देण्यात येणारा जनस्थान पुरस्कार. एक लाख रुपये रोख, स्मृतिचिन्ह, मानपत्र, शाल आणि श्रीफळ असे पुरस्काराचे स्वरूप असते. २०१३साली भालचंद्र नेमाडे यांना हा पुरस्कार प्रदान करण्यात आला होता. नशिकच्या यशवंतराव चव्हाण मुक्त विद्यापीठाच्या कुसुमाग्रज अध्यासनाच्या वतीने देण्यात येणारा कुसुमाग्रज राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार. एक लाख रुपये रोख, स्मृतिचिन्ह, मानपत्र, शाल आणि श्रीफळ असे याही पुरस्काराचे स्वरूप असते. २०१० साली कन्नड साहित्यिक जयंत कैकिणी, २०११ साली हिंदी साहित्यिक डॉ. चंद्रकांत देवतळे, २०१२ साली मल्याळी साहित्यिक के.सच्चिनानंदन आणि २०१३ साली गुजराती कवी, नाटककार आणि समीक्षक डॉ. सितांशू यशश्चंद्र यांना हा पुरस्कार देण्यात आला होता. महाराष्ट्र साहित्य परिषदेच्या वतीने काव्य विभागासाठी दिला जाणारा कुसुमाग्रज पुरस्कार : हा, हत्ती इलो (काव्यसंग्रह-कवी अजय कांडर) आणि कल्लोळातील एकांत (काव्यसंग्रह-कवी अझीम नवाज) यांना विभागून मिळाला होता. नाशिक येथील कुसुमाग्रज प्रतिष्ठानतर्फे विविध क्षेत्रातील असामान्य कामगिरीसाठी कुसुमाग्रज यांच्या स्मृतीदिनी, १० मार्चला एक वर्षाआड ‘गोदावरी गौरव पुरस्कार' देण्यात येतात. अभिनेते नाना पाटेकर, नालंदा नृत्य संशोधन केंद्राच्या संस्थापिका डॉ. कनक रेळे, रॅम सायकल शर्यत विजेते डॉ. महाजन बंधू, प्रसिद्ध वास्तुरचनाकार डॉ. बाळकृष्ण दोशी, जागतिक कीर्तीचे शास्त्रज्ञ डॉ. शशीकुमार चित्रे व महिला सबलीकरणाचे कार्य करणाऱ्या चेतना सिन्हा यांना हा पुरस्कार मिळाला आहे, (२०१६) महाराष्ट्र साहित्य परिषदेतर्फे काॅन्टिनेन्टल प्रकाशनपुरस्कृत कुसुमाग्रज स्मृती पुरस्कार जालना येथील संजीवनी तडेगावकर यांच्या 'संदर्भासहित' कवितासंग्रहाला प्रदान झाला. (२८ फेब्रुवारी २०१९) संदर्भ ग्रंथ सौंदर्याचे उपासक कुसुमाग्रज (संपादक - डाॅ. नागेश कांबळे) कुसुमाग्रज/शिरवाडकर : एक शोध, लेखक : द.दि. पुंडे, मेहता प्रकाशन, पुणे, १९९१, (दुसरी आवृत्ती) कुसुमाग्रजांचा सामाजिक साहित्यविचार : डॉ. देवानंद सोनटक्के लिखित 'समीक्षेची अपरूपे-हर्मिस प्रकाशन (पुणे, २०१७) या पुस्तकातील एक लेख रूपरेषा, वि.वा .शिरवाडकर, संपादक : सुभाष सोनवणे, चेतश्री प्रकाशन, अमळनेर, १९८४ भारतीय साहित्याचे निर्माते कुसुमाग्रज, निशिकांत मिरजकर (मूळ इंग्रजी, मराठी अनुवादक अविनाश सप्रे, साहित्य अकादमी, २०११) बाहरी कड़ियाँ कुसुमाग्रज जी की प्रसिद्ध कविता कणा - मराठीमाती श्रेणी:मराठी साहित्यकार श्रेणी:ज्ञानपीठ सम्मानित श्रेणी:1912 में जन्मे लोग