Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

अत-तग़ाबुन

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

जून 2015 सूरा अत-तग़ाबुन (इंग्लिश: At-Taghabun) इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 64 वां सूरा (अध्याय) है। इसमें 18 आयतें हैं। नाम इस सूरा के अरबी भाषा के नाम को क़ुरआन के प्रमुख हिंदी अनुवाद में सूरा अत-तग़ाबुन सूरा अत-तग़ाबुन ,(अनुवादक: मौलाना फारूक़ खाँ) भाष्य: मौलाना मौदूदी अनुदित क़ुरआन - संक्षिप्त टीका सहित 862 से https://archive.org/details/TranslationOfTheMeaningsOfTheNobleQuranInTheHindipdfऔर प्रसिद्ध किंग फ़हद प्रेस के अनुवाद में सूरा अत्-तग़ाबुनसूरा अत्-तग़ाबुन का अनुवाद (किंग फ़हद प्रेस) https://quranenc.com/en/browse/hindi_omari/64 https://quranenc.com 16 जुलाई 2020 https://web.archive.org/web/20200622083734/https://quranenc.com/en/browse/hindi_omari/64 22 जून 2020 dead नाम दिया गया है। नाम आयत 9 के वाक्यांश “वह दिन होगा एक - दूसरे के मुक़ाबले में लोगों की हार जीत (तग़ाबुन) का" से उद्धृत है अर्थात् वह सूरा जिसमें 'तग़ाबुन ' शब्द आया है। अवतरणकाल सूरा मदनी सूरा अर्थात् पैग़म्बर मुहम्मद के मदीना के निवास के समय हिजरत के पश्चात अवतरित हुई। मुक़ातिल और कल्बी कहते हैं कि इसका कुछ अंश मक्की है और कुछ मदनी। किन्तु अधिकतर टीकाकार पूरी सूरा को मदनी ठहराते हैं। किन्तु वार्ता की विषय-वस्तु पर विचार करने पर अनुमान होताहै कि सम्भवतः यह मदीना तैबा के आरम्भिक कालखण्ड में अवतरित हुई होगी। यही कारण है कि इसमें कुछ रंग मक्की सूरतों का और कुछ मदनी सूरतों का पाया जाता है। विषय और वार्ता इस्लाम के विद्वान मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि इस सूरा का विषय ईमान और आज्ञापालन का आमंत्रण और सदाचार की शिक्षा है। वार्ता का क्रम यह है कि पहली चार आयतों में संबोधन सभी मनुष्यों से है, फिर आयत 5-10 तक उन लोगों को सम्बोधित किया गया है जो कुरआन के आमंत्रण को स्वीकार नहीं करते और इसके बाद आयत 11 से अन्त तक की आयतों की वार्ता का रुख़ उन लोगों की ओर है जो इस आमंत्रण को स्वीकार करते हैं। समस्त मानवों को सम्बोधित करके कुछ थोड़े - से वाक्यों में उन्हें चार मौलिक सच्चाइयों से अवगत कराया गया है: एक यह कि इस जगत् का स्रष्टा, मालिक और शासक एक ऐसा सर्वशक्तिमान ईश्वर है जिसके पूर्ण और दोषमुक्त होने की गवाही इस ब्रह्माण्ड की हर चीज़ दे रही है। दूसरे यह कि यह ब्रह्माण्ड निरुद्देश्य और तत्त्वदर्शिता से रिक्त नहीं है, बिल्क इसके स्रष्टा ने सर्वथा यथार्थतः और औचित्य के आधार पर इसकी रचना की है। यहाँ इस भ्रम में न रहो कि यह व्यर्थ तमाशा है , जो निरर्थक शुरू और निरर्थक ही समाप्त हो जाएगा। तीसरे यह कि तुम्हें जिस सुन्दरतम रूप के साथ ईश्वर ने उत्पन्न किया है और फिर जिस प्रकार यह तुमपर छोड़ दिया है कि तुम मानो या न मानो , यह कोई ऐसा कार्य नहीं है जो फल रहित और निरर्थक हो। वास्तव में ईश्वर यह देख रहा है कि तुम अपनी स्वतंत्रता को किस तरह प्रयोग में लाते हो। चौथे यह कि तुम दायित्व मुक्त और अनुत्तरदायी नहीं हो। अन्य में तुम्हें अपने स्रष्टा की और पलटकर जाना है , जिसपर मन में छिपे हुए विचार तक प्रकट हैं। इसके बाद वार्ता का रुख़ उन लोगों की और मुड़ता है जिन्होंने इनकार ( कुफ्र ) की राह अपनाई है और उन्हें ( विगत विनष्ट जातियों के इतिहास का ध्यान दिलाकर बताया जाता है) उनके मौलिक कारण केवल दो थे: एक यह कि उसने जिन रसूलों को उनके मार्गदर्शन के लिए भेजा था, उनकी बात मानने से उन्होंने इनकार किया। दूसरे यह कि उन्होंने परलोक की धारणा को भी रद्द कर दिया और अपनी दंभपूर्ण भावना के अन्तर्गत यह समझ लिया कि जो कुछ है बस यही सांसारिक जीवन है । मानव इतिहास के इन दो शिक्षाप्रद तथ्यों को बयान करके सत्य के न माननेवालों को आमंत्रित किया गया है कि वे होश में आएँ और यदि विगत जातियों के जैसा परिणाम नहीं देखना चाहते तो अल्लाह और उसके रसूल और मार्गदर्शन के उस प्रकाश पर ईमान ले आएँ जो अल्लाह ने क़ुरआन मजीद के रूप में अवतरित किया है। इसके साथ उनको सचेत किया जाता है कि अन्ततः वह दिन आनेवाला है जब समस्त अगले और पिछले एक जगह एकत्र किए जाएंगे और तुममें से हर एक का ग़बन सबके सामने खुल जाएगा। फिर सदैव के लिए समस्त मनुष्यों के भाग्य का निर्णय (उनके ईमान और कर्म के आधार पर कर दिया जाएगा)। इसके पाश्चात् ईमान की राह अपनानेवालों को सम्बोधित करके कुछ महत्त्वपूर्ण आदेश उन्हें दिए जाते हैं। एक यह कि दुनिया में जो मुसीबत भी आती है, अल्लाह की अनुज्ञा से आती है। ऐसी स्थितियों में जो व्यक्ति ईमान पर जमा रहे, अल्लाह उसके दिल को राह दिखाता है, अन्यथा घबराहट या झुंझलाहट में पड़कर जो आदमी ईमान की राह से हट जाए उसका दिल अल्लाह के मार्गदर्शन से वंचित हो जाता है। दूसरे यह कि ईमानवाले व्यक्ति का काम केवळ ईमान ले आना ही नहीं है, बल्कि ईमान लाने के पाश्चात् उसे व्यवहारतः अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल.) की आज्ञा का पालन करना चाहिए। तीसरे यह कि ईमानवाले व्यक्ति का भरोसा अपनी शक्ति या संसार की किसी शक्ति पर नहीं , बल्कि केवल अल्लाह पर होना चाहिए। चौथे यह कि ईमानवाले व्यक्ति के लिए उसका धन और उसके बाल - बच्चे एक बहुत बड़ी परीक्षा हैं, क्योंकि अधिकतर इन्हीं का प्रेम मनुष्य को ईमान और आज्ञापालन के मार्ग से हटा देता है। इसलिए ईमानवालों को (इनके मामले में बहुत) सतर्क रहना चाहिए। पाँचवें यह कि हर मनुष्य पर उसकी अपनी सामर्थ्य ही तक दायित्व का बोझ डाला गया है । अल्लाह को यह अपेक्षित नहीं है कि मनुष्य अपनी सामर्थ्य से बढ़कर काम करे। अलबत्ता ईमानवाले व्यक्ति को जिस बात की कोशिश करनी चाहिए वह यह है कि अपनी हद तक ईश्वर से डरते हुए जीवन व्यतीत करने में कोई कमी न होने दे। सुरह "अत-तग़ाबुन'' का अनुवाद बिस्मिल्ला हिर्रह्मा निर्रहीम अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है। बिस्मिल्लाह क़ुरआन का हिन्दी अनुवाद इस सूरा का प्रमुख अनुवाद: क़ुरआन की मूल भाषा अरबी से उर्दू अनुवाद "मौलाना मुहम्मद फ़ारूक़ खान", उर्दू से हिंदी At-Taghabun सूरा का अनुवाद http://tanzil.net/#trans/hi.farooq/64:1 http://tanzil.net 15 जुलाई 2020 https://web.archive.org/web/20180425183153/http://tanzil.net/#trans/hi.farooq/64:1 25 अप्रैल 2018 dead "मुहम्मद अहमद" ने किया। बाहरी कडियाँ इस सूरह का प्रसिद्ध अनुवादकों द्वारा किया अनुवाद क़ुरआन प्रोजेक्ट पर देखें At-Taghabun 64:1 क़ुरआन के अनुवाद 92 भाषाओं में Quran Text/ Translation - (92 Languages) https://www.australianislamiclibrary.org/quran-translations.html www.australianislamiclibrary.org 15 March 2016 https://web.archive.org/web/20200730204334/https://www.australianislamiclibrary.org/quran-translations.html 30 जुलाई 2020 dead 64 - अत-तग़ाबुन अल-मुनाफ़िक़ून अत-तलाक़ सन्दर्भ इन्हें भी देखें क़ुरआन मुहम्मद क़ुरआन का हिन्दी अनुवाद सूरा आयत (क़ुरआन) इस्लामी शब्दावली श्रेणी:सूरा