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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

ललित नारायण मिश्र

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300px|thumb|right|ललित नारायण मिश्र ललित नारायण मिश्र (2 फरवरी 1923 – 3 जनवरी 1975) भारत के एक राजनेता थे जो 1973 से 1975 तक भारत के रेलमंत्री रहे। 3 जनवरी 1975 को समस्तीपुर बम-विस्फोट कांड में उनकी मृत्यु हो गयी थी। आरम्भिक जीवन श्री ललित नारायण मिश्रा का जन्म बसंत पंचमी को 1922 में बिहार के सुपौल जिले के बलुआ में हुआ था। उन्होंने 1948 में पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए किया। युवा मिश्रा ने राष्ट्रवादियों श्रीकृष्ण सिन्हा और अनुग्रह नारायण सिन्हा को बहुत सम्मान दिया। उन्होंने कामेश्वरी देवी से विवाह की और उनकी दो बेटियां और चार बेटे थे, जिनमें राजनेता विजय कुमार मिश्रा भी शामिल थे। श्री ललित नारायण मिश्रा के साला स्वर्गीय श्री दीनानाथ मिश्रा बनगांव के प्रथम इंजीनियर थे। जिनके बेटे स्वर्गीय श्री विद्यानाथ मिश्रा अंग्रेजी के प्रखंड विद्वान थे। श्री ललित नारायण मिश्रा, स्वर्गीय श्री दीनानाथ मिश्रा के काफी करीबी थे एवं उनकी बेटी इंदिरा मिश्रा व दामाद कृष्णानन्द मिश्रा व पौत्र सुधांशु मिश्रा आज भी अपने पूर्वजों की शान को अपने गांव जीवित रखे हुए हैं। जिसमें श्री ललित नारायण मिश्रा जी एवं स्वर्गीय श्री दीनानाथ मिश्रा जी की अहम भूमिका थी इस परिवार में। श्री मिश्रा जी को कोशी मेन के नाम से भी जाना जाता है। इनकी कर्मठता व अतुलनीय योगदान के कारण। राजनैतिक जीवन वह पिछड़े बिहार को राष्ट्रीय मुख्यधारा के समकक्ष लाने के लिए सदा कटिबद्ध रहे। उन्होंने अपनी कर्मभूमि मिथिलांचल की राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए पूरी तन्मयता से प्रयास किया। विदेश व्यापार मंत्री के रूप में उन्होंने बाढ़ नियंत्रण एवं कोशी योजना में पश्चिमी नहर के निर्माण के लिए नेपाल-भारत समझौता कराया। उन्होंने मिथिला चित्रकला को देश-विदेश में प्रचारित कर उसकी अलग पहचान बनाई। मिथिलांचल के विकास की कड़ी में ही ललित बाबू ने लखनऊ से असम तक लेटरल रोड की मंजूरी कराई थी, जो मुजफ्फरपुर और दरभंगा होते हुए फारबिसगंज तक की दूरी के लिए स्वीकृत हुई थी। रेल मंत्री के रूप में मिथिलांचल के पिछड़े क्षेत्रों में झंझारपुर-लौकहा रेललाइन, भपटियाही से फारबिसगंज रेललाइन जैसी 36 रेल योजनाओं के सर्वेक्षण की स्वीकृति उनकी कार्य क्षमता, दूरदर्शिता तथा विकासशीलता के ज्वलंत उदाहरण है। मैथिली भाषा से प्रेम ललित बाबू को अपनी मातृभाषा मैथिली से अगाध प्रेम था। मैथिली की साहित्यिक संपन्नता और विशिष्टता को देखते हुए 1963-64 में ललित बाबू की पहल पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उसे 'साहित्य अकादमी' में भारतीय भाषाओं की सूची में सम्मिलित किया। अब मैथिली संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में चयनित विषयों की सूची में सम्मिलित है। हत्या 2 जनवरी, 1975 को ललित नारायण मिश्र दिल्ली से समस्तीपुर पहुंचे थे। यहां उन्हें समस्तीपुर से मुजफ्फरपुर जाने वाली रेलवे की बड़ी लाइन का उद्घाटन करना था। उद्घाटन के दौरान समस्तीपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर-तीन पर ही एक कार्यक्रम भी आयोजित हुआ, जहां कई बड़े नेता मौजूद थे। ललित नारायण मिश्र का इस दौरान मंच पर भाषण हुआ। भाषण पूरा करने के बाद जब ललित नारायण मिश्र मंच से उतरने लगे, तभी वहां इकट्ठा हुई भीड़ में से किसी ने मिश्र की तरफ हैंड ग्रेनेड फेंक दिया। हैंड ग्रेनेड सीधे एलएन मिश्र के पास फटा और वे बुरी तरह जख्मी हो गए, लेकिन इसके बावजूद उनकी सांसें चल रही थीं। इस हमले में मंच पर मौजूद एमएलसी सूर्य नारायण झा और रेलवे के क्लर्क राम किशोर प्रसाद की मौत हो गई। घटना में करीब दर्जन भर लोग बुरी तरह घायल हुए। ललित नारायण मिश्र, उनके भाई जगन्नाथ मिश्र और कुछ और लोगों को इलाज के लिए पटना ले जाया गया। दानापुर रेलवे स्टेशन रेल से पहुँचने के लिए 6-7 घंटे काफी होने चाहिए थे। आज 4-5 घंटे लगते हैं। किन्तु ललित बाबू को लेकर रवाना हुई ट्रेन 14 घंटे से ज्यादा समय लगाकर दानापुर पहुंची। ट्रेन जब तक पटना के करीब दानापुर स्टेशन पर पहुंची और एलएन मिश्र को अस्पताल पहुंचाया गया, तब तक काफी देर हो चुकी थी। अगले दिन यानी 3 जून 1975 को एलएन मिश्र की हत्या की खबर पूरे देश में रेडियो के माध्यम से पहुंची। इतनी देरी होना इस हत्याकांड से जुड़े सबसे अहम सवालों में से एक था। गाड़ी को यार्ड में खड़ा रखा गया शंटिग की गई। समर्थकों ने कहा कि जानकर देर की गई। अफवाह चली कि इस हत्या के पीछे इंदिरा गांधी का हाथ है। आनन्द मार्ग के संस्थापक प्रभात रंजन सरकार के अनुयायियों पर भी सन्देश किया गया। समस्तीपुर रेलवे पुलिस ने जो FIR दर्ज की। उसके बाद जांच का जिम्मा CID को सौंप दिया गया। फिर बिहार सरकार ने नया नोटिफिकेशन जारी किया। मामले की जांच CBI के सुपुर्द कर दी गई। CBI ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि उसे जांच बिहार से बाहर ले जाने की इजाजत दी जाए। ये अनुमति मिलने में लंबा समय लग गया। 17 दिसंबर, 1979 को सुप्रीम कोर्ट ने इसकी अनुमति दी। 22 मई, 1980 को यह मामला दिल्ली सेशन कोर्ट में ट्रायल के लिए भेजा गया। इस पूरे मामले में दो रपट सामने आईं। एक रिपोर्ट बिहार अपराध जांच विभाग (सीआईडी) के डीआईजी शशि भूषण सहाय ने मुख्यमंत्री को सौंपी थी। वहीं अगले वर्ष 1979 के फरवरी महीने में एक जांच रिपोर्ट अवकाशप्राप्त न्यायमूर्ति वीएम तारकुंडे ने भी मुख्यमंत्री को दी। दोनों ही रिपोर्ट्स में एलएन मिश्र की हत्या में गहरी साजिश की बात कही गई। हालांकि, इसमें पूरा खुलासा आज तक नहीं हो पाया। 1979 में सीबीआई के अनुरोध पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को बिहार से दिल्ली ट्रांसफर कर दिया। भारत के इतिहास में यह पहला मामला बना, जिसे सबूतों के साथ छेड़छाड़ के शक में राज्य से बाहर शिफ्ट किया गया। ललित नारायण मिश्रा हत्याकांड : ‘असली अपराधी छुपाकर फर्जी आरोप मढ़े इंदिरा सरकार ने’ बाहरी कड़ियाँ https://web.archive.org/web/20090410225344/http://164.100.47.134/newls/underprocess.htm https://web.archive.org/web/20081230184439/http://rajyasabha.nic.in/whoswho/previous_member/biograp_sketc_1d.htm#m https://web.archive.org/web/20050415164812/http://lnmu.bih.nic.in/ सन्दर्भ श्रेणी:बिहार के लोग श्रेणी:भारत में राजनीतिक हत्याएं श्रेणी:1923 में जन्मे लोग श्रेणी:१९७५ में निधन श्रेणी:भारत में हत्याकांड