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तैत्तिरीयोपनिषद
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तैत्तिरीयोपनिषद् 150px वेदव्यास अन्य पौराणिक ऋषि भारत संस्कृत कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद ज्ञान योग, द्वैत अद्वैत सिद्धान्त हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ
तैत्तिरीयोपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण प्राचीनतम दस उपनिषदों में से एक है। यह शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली इन तीन खंडों में विभक्त है - कुल ५३ मंत्र हैं जो ४० अनुवाकों में व्यवस्थित है। शिक्षावल्ली को सांहिती उपनिषद् एवं ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली को वरुण के प्रवर्तक होने से वारुणी उपनिषद् या वारुणी विद्या भी कहते हैं। तैत्तरीय उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तरीय आरण्यक का ७, ८, ९वाँ प्रपाठक है।
तैत्तिरीय उपनिषद में अधिलोक आदि की सन्धियों की व्याख्या, भूः, भुवः, स्वः व महः व्याहृतियों की विषद व्याख्या, अन्नमय आदि कोशों का विवरण, सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन और ब्रह्म की व्याख्या है । आनन्द की भी मीमांसा प्रस्तुत की गई है । ये सभी पठनीय हैं ।
इस उपनिषद् के बहुत से भाष्यों, टीकाओं और वृत्तियों में शांकरभाष्य प्रधान है जिसपर आनंद तीर्थ और रंगरामानुज की टीकाएँ प्रसिद्ध हैं एवं सायणाचार्य और आनंदतीर्थ के पृथक् भाष्य भी सुंदर हैं।
ऐसा माना जाता है कि तैत्तिरीय संहिता व तैत्तिरीय उपनिषद की रचना वर्तमान में हरियाणा के कैथल जिले में स्थित गाँव तितरम के आसपास हुई थी।डा बलदेव उपाध्याय- वैदिक साहित्य एवं संस्कृति -पृ १३२-१३३ http://kaithal.nic.in/history.htm History- Official Website of Kaithal Haryana Government 9 अप्रैल 2015 https://web.archive.org/web/20150416175757/http://kaithal.nic.in/history.htm 16 अप्रैल 2015 dead
परिचय
तैत्तरीय उपनिषद् अत्यन्त महत्वपूर्ण प्राचीनतम दस उपनिषदों में सप्तम उपनिषद् है तथा शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली इन तीन खंडों में विभक्त है। यह कृष्ण यजुर्वेदीय तैत्तरीय आरण्यक का 7, 8, 9वाँ प्रपाठक है। शिक्षा वल्ली में १२ अनुवाक और २५ मंत्र, ब्रह्मानंदवल्ली में ९ अनुवाक और १३ मंत्र तथा भृगुवल्ली में १९ अनुवाक और १५ मंत्र हैं। शिक्षावल्ली को सांहिती उपनिषद् एवं ब्रह्मानंदवल्ली और भृगुवल्ली को वरुण के प्रवर्तक होने से वारुणी उपनिषद् या विद्या भी कहते हैं।
वारुणी उपनिषद् में विशुद्ध ब्रह्मज्ञान का निरूपण है जिसकी उपलब्धि के लिये प्रथम शिक्षावल्ली में साधनरूप में ऋत और सत्य, स्वाध्याय और प्रवचन, शम और दम, अग्निहोत्र, अतिथिसेवा, श्रद्धामय दान, मातापिता और गुरुजन सेवा और प्रजोत्पादन इत्यादि कर्मानुष्ठान की शिक्षा प्रधानतया दी गई है। इस में त्रिशंकु ऋषि के इस मत का समावेश है कि संसाररूपी वृक्ष का प्रेरक ब्रह्म है तथा रथीतर के पुत्र सत्यवचा के सत्यप्रधान, पौरुशिष्ट के तपःप्रधान एवं मुद्गलपुत्र नाक के स्वाध्याय प्रवचनात्मक तप विषयक मतों का समर्थन हुआ है। 11वें अनुवाक मे समावर्तन संस्कार के अवसर पर सत्य भाषण, गुरुजनों के सत्याचरण के अनुकरण और असदाचरण के परित्याग इत्यादि नैतिक धर्मों की शिष्य को आचार्य द्वारा दी गई शिक्षाएँ शाश्वत मूल्य रखती हैं।
ब्रह्मानन्द और भृगुवल्लियों का आरंभ ब्रह्मविद्या के सारभूत 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' मन्त्र से होता है। ब्रह्म का लक्षण सत्य, ज्ञान और अनन्त स्वरूप बतलाकर उसे मन और वाणी से परे अचिंत्य कहा गया है। इस निर्गुण ब्रह्म का बोध उसके अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद इत्यादि सगुण प्रतीकों के क्रमश: चिंतन द्वारा वरुण ने भृगु को करा दिया है। इस उपनिषद् के मत से ब्रह्म से ही नामरूपात्मक सृष्टि की उत्पत्ति हुई है और उसी के आधार से उसकी स्थिति है तथा उसी में वह अंत में विलीन हो जाती है। प्रजोत्पत्ति द्वारा बहुत होने की अपनी ईश्वरींय इच्छा से सृष्टि की रचना कर ब्रह्म उसमें जीवरूप से अनुप्रविष्ट होता है। ब्रह्मानंदवल्ली के सप्तम अनुवाक में जगत् की उत्पत्ति असत् से बतलाई गई है, किंतु 'असत्' इस उपनिषद् का पारिभाषिक शब्द है जो अभावसूचक न होकर अव्याकृत ब्रह्म का बोधक है, एवं जगत् को सत् नाम देकर उसे ब्रह्म का व्याकृत रूप बतलाया है। ब्रह्म रस अथवा आनंद स्वरूप हैं। ब्रह्मा से लेकर समस्त सृष्टि पर्यंत जितना आनंद है उससे निरतिशय आनंद को वह श्रोत्रिय प्राप्त कर लेता है जिसकी समस्त कामनाएँ उपहत हो गई हैं और वह अभय हो जाता है।
वर्ण्य विषय
शिक्षावल्ली
शिक्षावल्ली में १२ अनुवाक हैं । उनमें वर्णित विषय निम्नलिखित हैं-
अनुवाक प्रस्तुत विषय अनुवाक १ शान्तिमन्त्र अनुवाक २ वर्ण-स्वर-मात्रा-बल-साम-सन्तान आदि क्रम से वर्णित हैं। अनुवाक ३ विश्व-ज्योति-विद्या-प्रजा-देह आदि किन तत्त्वों के संयोग से क्या उत्पन्न होता है। अनुवाकः ४ बुद्धिबलयोः अधिष्ठातृदेवतायाः इन्द्रदेवतायाः वर्णनं प्रार्थना च विद्यते । सम्पदः यशः च सम्प्रार्थ्य अधिकाः ब्रह्मचारिणः अध्ययनाय आगच्छेयुः इति वरं प्रार्थयते अनुवाकः ५ भूः भुवः स्वः महः इत्येतेषां चतुर्णां मन्त्राणाम् अर्थः उपासनाक्रमः च विवृतम् अनुवाकः ६ अन्तर्हृदये स्थितस्य पुरुषस्य उल्लेखपूर्वकम् आनन्दः नाम किम् ? अमृतं किमिति संक्षेपेण विवृतम् अनुवाकः ७ भूतेषु पञ्च भागाः देहे अपि पञ्च भागाः इति निरूप्य शरीरं पञ्चभूतैः एव निर्मितम् इति वर्णितम् अनुवाकः ८ ओङ्कारस्य विभिन्नेषु अवसरेषु दश उपयोगाः वर्णिताः अनुवाकः ९ स्वाध्याय-प्रवचनयोः आवश्यकता निरूपिता अनुवाकः १० त्रिशङ्कुना कृतस्य आत्मस्वरूपस्य वर्णनं विद्यते अनुवाक ११ अध्ययन समाप्त करके घर जाने के लिये उद्यत शिष्य को गुरु का उपदेश अनुवाक १२ शान्तिमन्त्र
ब्रह्मानन्दवल्ली
ब्रह्मानन्दवल्ली में ९ अनुवाक हैं। उनमें विषयप्रस्तुति कुछ इस प्रकार है-
अनुवाक प्रस्तुत विषय अनुवाक १ ब्रह्मा से ही विश्व की उत्पत्ति हुई है। अनुवाक २ अन्न से ही सभी वस्तुओं की उत्पत्ति हुई है। अनुवाक ३ प्राण से ही सभी जीवित हैं। अनुवाकः ४ ब्रह्म इन्द्रियातीतम् । श्रद्धा, ऋतं, सत्यं, योगः, बुद्धिश्च विज्ञानमयपुरुषस्य अवयवानि अनुवाकः ५ विज्ञानेन यज्ञ-कर्मयोः विस्तारः भविष्यति । प्रिय-मोद-प्रमोद-आनन्द-ब्रह्म एते आनन्दमयस्य आत्मनः अवयवानि अनुवाकः ६ असत् तन्नाम इन्द्रियातीतं सत्यं पूर्वम् एकमेव आसीत् । स्वसङ्कल्पेन मूर्तामूर्तवस्तुरूपेण परिणतम् अनुवाकः ७ असता सत् जातम् । वस्तुनः आनन्ददायकं तत्त्वम् असतः रूपम् । असतः साक्षात्कारतः पुरुषः निर्भयः भवति । अनुवाकः ८ ब्रह्मानन्दः कीदृशः इति निरूपितः । निष्कामिना वेदज्ञेन ब्रह्मानन्दः प्राप्यते । अनुवाक ९ आत्मज्ञानी पाप और पुण्य से परे होता है - यह निरूपण।
भृगुवल्ली
भृगुवल्ली में १० अनुवाक हैं जिनमें प्रस्तुत विषय निम्नलिखित हैं-
अनुवाक प्रस्तुत विषय अनुवाक १ भृगु ने अपने पिता से ब्रह्मज्ञान की याचना की । भूत (प्राणी) कैसे उत्पन्न होते हैं? केन आधार से वे जीवित रहते हैं ? किसमें मिल जाते हैं- ये तप द्वारा जानो, ऐसा पिता ने समझाया। अनुवाक २ अन्न ही ब्रह्म है- ऐसा पिता ने बताया । पिता पुनः तप करने को कहा। अनुवाकः ३ प्राणः एव ब्रह्म इति पितरं वदति । पिता पुनः तपसः आचरणाय प्रेषयति । अनुवाकः ४ मनः एव ब्रह्म इति पितरं वदति । पिता पुनः तपसः आचरणाय प्रेषयति । अनुवाकः ५ विज्ञानमेव ब्रह्म इति पितरं वदति । पिता पुनः तपसः आचरणाय प्रेषयति । अनुवाकः ६ आनन्दः एव ब्रह्म इति पितरं वदति । अस्य ज्ञानमेव भार्गवीवारुणीविद्या । अस्य ज्ञाता महिमावान् भवति । अनुवाकः ७ अन्नं न निन्दितव्यम् । अन्नप्राणयोः अन्योन्याश्रयः विद्यते । अस्य ज्ञाता महिमावान् भवति । अनुवाकः ८ आपतेजसोः अन्योन्याश्रयः विद्यते । उभौ अपि अन्नरूपौ एव । अस्य ज्ञाता महिमावान् भवति । अनुवाकः ९ पृथ्व्याकाशयोः अन्योन्याश्रयः विद्यते । उभौ अपि अन्नरूपौ एव । अस्य ज्ञाता महिमावान् भवति । अनुवाक १० अतिथिसत्कार करना चाहिये । शरीरदेवता की उपासना करनी चाहिये। तृप्तिबलतेज की प्राप्ति के लिये दैव्योपासन करना चाहिये, ऐसा कहा गया है।
कथा
यह उपनिषद् एक दीर्घ ग्रन्थ है , तथापि इसमें केवल एक कथा प्राप्त होती है जो भृगु-वल्ली में भृगु की कथा है जिन्होने ब्रह्मविद्या को प्राप्त किया था । यह उनके खोज की कहानी है । उनके पिता वरुण थे, जो पूर्ण ज्ञानी थे ।
एक बार भृगु पिता के पास गया और उनसे बोला, “पिताजी, मुझे ब्रह्मोपदेश करिए ।” पिता बोले, “अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी ”। उन्होने फिर कहा, “जिससे यह सब प्राणी उत्पन्न होते है, जिससे उत्पन्न होकर जीते हैं, जिससे ये (इस लोक से) प्रयाण करते हैं और जिसमें (मरणोपरान्त) प्रवेश करते हैं, उसको जानने की इच्छा (=प्रयत्न) कर क्योंकि वही ब्रह्म है ।”
भृगु ने तप आरम्भ किया । उस तप से उसने जाना कि अन्न ही वह वस्तु है जिससे प्राणी उत्पन्न होते हैं, जीते हैं, जिसके बिना वे मृत्यु को प्राप्त करते हैं और, मरणोपरान्त, अन्न में ही समाविष्ट हो जाते हैं । उन्होंने पिता को अपनी खोज का परिणाम बताया । पिता ने कहा कि ठीक है, परन्तु यह अन्तिम उत्तर नहीं है। उन्होंने भृगु को और तप करने को कहा ।
भृगु ने पुनः घोर तपस्या की और जाना कि पिता ने जो पहला विचित्र वाक्य कहा था, उसी में उत्तर छुपा है। भृगु ने जाना कि प्राण ही तो वह वस्तु है जिससे यह सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिससे उत्पन्न होकर जीते हैं, जिसके निकल जाने पर इस लोक से वे प्रयाण कर देते हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं । परन्तु पिता फिर भी सन्तुष्ट नहीं हुए और उससे और तप करने को कहा ।
अब की बार भृगु को ब्रह्म के रूप में मन ज्ञात हुआ, जिससे भी सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसकी सहायता से जीते हैं, जिसके न रहने पर मरते हैं, और अन्तकाल में उसी में विलीन हो जाते हैं । परन्तु इस उत्तर से भी पिता सन्तुष्ट नहीं हुए । तब भृगु को ब्रह्म के रूप में विज्ञान जान पड़ा, जिससे भी सब उपर्युक्त कार्य होते हैं । जब पिता ने और आगे ढूढ़ने की प्रेरणा दी, तो भृगु को आनन्द-रूपी ब्रह्म जान पड़ा । अबकी बार पिता सन्तुष्ट हुए । इन दोनों के तप से जानी गई यह विद्या भार्गवी-वारुणी विद्या कहलाई । वस्तुतः, भृगु ने ध्यान-रूपी तप से शरीर के पंच कोशों का रहस्य ढूढ़ निकाला । ये पंच कोश हैं – अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश । ये जैसे शरीर की स्थूल से सूक्ष्मतर परते हैं, जो एक के अन्दर एक बैठी हैं ।
अन्नमय कोश स्थूल शरीर है, जो कि पंच महाभूतों का बना हुआ है । इसी को हम अधिकतर अनुभव करते हैं – भूख-प्यास, चोट, बल, आदि, स्थूल शरीर के लक्षण होते हैं ।
प्राणमय कोश में श्वास-निःश्वास ही नहीं, अपितु शरीर की सभी चेष्टाएं सम्मिलित हैं । प्राणों से ही रक्त को गति मिलती है और आंतों से शरीर में रस बहता है । ध्यान करते समय, पहले भौतिक शरीर के किसी अंश के बाद, हमें अपने प्राणों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए । बृहदारण्यक में कहा गया है कि सभी इन्द्रियां, और मन भी, पाप-युक्त हो सकती हैं, परन्तु प्राण पाप से परे रहता है । प्राणों पर ध्यान लगाने से, हमारा मस्तिष्क पवित्र हो जाता है ।
और अन्दर जाने पर, योगी को मन का रूप स्पष्ट होता है – वह मन जो इन्द्रियों से बाह्य विषयों का ग्रहण करता है और फिर शरीर में चेष्टा उत्पन्न करने का संकल्प-विकल्प करता है ।
मनोमय कोश से भी सूक्ष्मतर होता है विज्ञानमय कोश, जो कि बुद्धि का पर्याय है । यहां हमारे गहन विचार स्थित होते हैं । जब हम किसी विचार में लीन होते हैं, तो अपने शरीर की सुध-बुध भूल जाते हैं, हमारा शरीर शिथिल पड़ जाता है, हमें अपने आस-पास की सुध भी नहीं रहती, हम किसी और ही संसार में होते हैं । वह विज्ञानमय कोश होता है । योगी भी इसमें प्रवेश करके शरीर और इन्द्रियों को भूल जाता है ।
इस कोश के अन्दर स्थित होता है आनन्दमय कोश । यह वह कोश है जहां आत्मा अपने को देखने लगता है, परमात्मा की झलक पाने लगता है । जैसे-जैसे वह इसमें प्रवेश करता जाता है, वैसे-वैसे प्रकृति का अंकुश उसपर से उठता जाता है, और वह अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होने लगता है । इस अवस्था में जिस आनन्द की अनुभूति उसे होती है, वह वर्णनातीत है, क्योंकि वर्णन में तो शारीरिक और मानसिक सुख-दुःख ही आते हैं । योगदर्शन में इसी स्थिति को आनन्दा समाधि कहा गया है, जिसके आगे अस्मिता समाधि में वह अपने में स्थित हो जाता है । यहीं पहुंच कर ब्रह्मलोक के द्वार खुलने लगते हैं और मोक्ष-मार्ग प्रशस्त होता है ।
शिक्षा
यह उपनिषद् शिक्षा देने की शैली में लिखा हुआ है, जिसमें आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले योगी और सांसारिक व्यक्ति – दोनों के लिए अनेक सुन्दर शिक्षाएं हैं। उदाहरण के लिये, शिक्षा-वल्ली के एकादश अनुवाक में आचार्य गुरुकुल से स्नातक होकर उसे छोड़ते हुए अन्तेवासी को अन्तिम शिक्षा देते हैं कि सांसारिक जीवन-निर्वाह किस प्रकार करना चाहिए –
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवछेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।
(अर्थ : वेदों को भली-भांति पढ़ाकर, आचार्य अन्तेवासी को शिक्षा देते हैं – सत्य बोलना । धर्म करना । (गृहस्थ-जीवन प्रारम्भ करने पर भी) स्वाध्याय बिना प्रमाद के करते रहना । (जाते-जाते) आचार्य के प्रिय धन से उसको तृप्त करके, गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके प्रजा के धागे को मत तोड़ना, अर्थात् सन्तति उत्पन्न करके कुल को बढ़ाना (उस समय यह भय होता था कि स्नातक इतना निर्मोही कहीं न हो जाए, कि विवाह ही न करे । आजकल तो यह भय ही हास्यास्पद है !) । सत्य से कभी मत डिगना । धर्म से कभी मत डिगना । शुभ, कल्याणकारी कर्मों में आलस्य कभी मत करना । भौतिक उन्नति के प्रयास से मत विरत होना । स्वाध्याय और प्रवचन – अपनी और अन्यों की धर्म में शिक्षा – से कभी विरत मत होना । देव = ज्ञानियों और पितृ = परिवार के वृद्धों की सेवा में कभी चूक मत करना ।)
मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकँ सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयाँसो ब्राह्मणाः तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयादेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् ।
('अर्थ : माता तेरे लिए देव-तुल्य हो । एवमेव पिता, आचार्य और घर आए साधु-सन्त रूपी अतिथि को देव मानना । (उनके सत्कार और सेवा में कमी न होने पाए ।) जो हमारे प्रशंसित कर्म हैं, उनका अनुसरण कर, हमारे अन्य (दुष्कर्मों) का नहीं । जो हमारे गुण हैं, उनको प्राप्त कर, अन्यों (दुर्गुणों) को नहीं । हममें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उनकी आसन आदि से सेवा-सत्कार कर । दान करते समय ध्यान रखना कि – श्रद्धा (पूर्ण मनोभाव) से देना । अश्रद्धा से मत देना (यहां ’अश्रद्धया देयम्’ पाठ भी उपलब्ध होता है, जिसका अर्थ किया जाता है कि सुपात्र को, श्रद्धा-भाव न होने पर भी, देना) । अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान करना । अहंकार-शून्य होकर देना । परमात्मा के भय से देना । सुपात्र जानकर, विवेकपूर्वक देना ।)
अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ।
(अर्थ : तुझे किसी कर्म में कोई शंका हो, या किसी आचार के विषय में शंका हो, तो तेरे आसपास जो विचारशील, स्वयं उस कार्य में लगे हुए, अथवा नियुक्त किए हुए, स्नेहमय, धर्म की कामना करने वाले ब्राह्मण हों, वे उस आचरण में जैसे वर्तें, वैसे ही तू भी वर्तना । इसी प्रकार किसी विवादास्पद कार्य और मनुष्य में भी तू उनके समान वर्तना । (अर्थात् जो ज्ञानी, आचारनिपुण और धार्मिक व्यक्ति हों, उनसे सीख लेकर अपना आचार सुधारना । आचार ऐसा विषय है जिसमें कभी भी पूर्णतया सब स्थितियां नहीं बताई जा सकतीं । जो हमने न बताया हो, जिसमें तुझे शंका हो, उसे अन्य विद्वानों के आचरण से सीखना ।) यह ही हमारी आज्ञा है । यही हमारा तुमको परामर्श है । यही वेद का गूढ़ उपदेश है । यही परम्परागत सीख है । इस प्रकार ही करने योग्य है । निश्चय से इसी प्रकार करने योग्य है ।)
सूक्तियाँ
तैत्तिरीय की कुछ अन्य सूक्तियां हैं –अद्यतेऽत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यते ॥ २।२ ॥
– खाया जाता है और खाता है प्राणियों को, इसलिए ’अन्न’ कहा जाता है ।
अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् ॥ ३।७ ॥
– अन्न ही जीवन का आधार है, इसलिए अन्न की निन्दा कभी न करना । यह तुम्हारा व्रत हो । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ॥ २।१ ॥
– ब्रह्म सत्यस्वरूप (सत्ता वाला), ज्ञानस्वरूप (सर्वज्ञ) और अनन्त (काल और दिशा के परे) है ।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
समावर्तन संस्कार
बाहरी कड़ियाँ
मूल ग्रन्थ
तैत्तिरीयोपनिषत् (संस्कृत विकिस्रोत)
उपनिषद (संस्कृत डॉक्युमेन्ट्स)
पीडीईएफ् प्रारूप, देवनागरी में अनेक उपनिषद
GRETIL
TITUS
अनुवाद
तेत्तिरीय उपनिषद
Translations of major Upanishads
11 principal Upanishads with translations
Translations of principal Upanishads at sankaracharya.org
Complete translation on-line into English of all 108 Upaniṣad-s
श्रेणी:दर्शन
श्रेणी:वैदिक धर्म
श्रेणी:उपनिषद