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411 समाचार
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नसीरुद्दीन शाह

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फ़रवरी 2018 फ़रवरी 2018 फ़रवरी 2018 नसीरुद्दीन शाह Naseeruddin Shah Audio release of 'Maximum' 06 (cropped).jpg 210px नसीरुद्दीन शाह 1949 8 16 yes रत्ना पाठक 1982 3 (ईमाद शाह, विवान शाह) नसीरुद्दीन शाह हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं। नसीरुद्दीन शाह, जिन्हें हिंदी फ़िल्म उद्योग में अदाकारी का एक पैमाना कहा जाए तो शायद ही किसी को एतराज हो। नसीर की काबिलियत का सबसे बड़ा सुबूत है, सिनेमा की दोनों धाराओं में उनकी कामयाबी। नसीर का नाम अगर पैरेलल सिनेमा के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं की सूची में शामिल हुआ तो बॉलीवुड की मुख्य धारा या व्यापारिक फ़िल्मों में भी उन्होंने बड़ी कामयाबी हासिल की है। नसीर अपने शानदार अंदाज से मुख्य धारा के चहेते सितारे बन गए, ऐसा सितारा जिसने हर तरह के किरदार को बेहतरीन अभिनय से जिंदा कर दिया। ये सितार जब भी स्क्रीन पर आया देखने वाले के दिल पर उस किरदार की यादगार छाप छोड़ गया। उसकी कॉमेडी ने पब्लिक को खूब गुदगुदाया तो एक्शन में भी उसका अलग ही अंदाज नजर आया। मुख्य धारा सिनेमा में नसीरुद्दीन शाह के सफर की शुरुआत 1980 में आई फ़िल्म 'हम पांच' से हुई। फ़िल्म भले ही व्यापारिक थी, लेकिन इसमें नसीर के अभिनय की गहराई समानांतर सिनेमा वाली फ़िल्मों से कम नहीं थी। गुलामी को अपनी तकदीर मान चुके एक गांव में विद्रोह की आवाज बुलंद करते नौजवान के किरदार में नसीर ने जान फूंक दी। हालांकि फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नहीं रही और एक व्यापारिक एक्टर के तौर पर सफलता साबित करने के लिए नसीर को टिकट खिड़की पर भी बिकाऊ बनने की जरूरत थी। और उनके लिए ये काम किया 'जाने भी दो यारों' ने। बॉलीवुड की ऑल टाइम बेस्ट कॉमेडी फ़िल्मों में शुमार 'जाने भी दो यारों' में रवि वासवानी और नसीर की जोड़ी ने बेजोड़ कॉमिक टाइमिंग दिखाई और फ़िल्म बेहद कामयाब रही। लेकिन कमर्शियल सिनेमा में नसीर की सबसे बड़ी कामयाबी बनी 'मासूम'। बाप और बेटे के रिश्तों को उकेरती 'मासूम' में नसीर ने कमाल की अदाकारी से ना केवल खूब वाहवाही बटोरी बल्कि फ़िल्म भी सुपरहिट हुई और नसीर को एक स्टार का दर्जा मिल गया। नसीर के इस स्टार स्टेटस को और मजबूत किया 1986 में आई सुभाष घई की मल्टीस्टारर मेगाबजट फ़िल्म 'कर्मा' ने। फ़िल्म में नसीर के लिए अपनी छाप छोड़ना आसान नहीं था क्योंकि वहां अभिनय सम्राट "दिलीप कुमार भी थे। और उस दौर के नए नवेले सितारे जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर भी थे। 1987 में गुलजार की 'इजाजत' नसीर के लिए कामयाबी का एक और जरिया बन कर आई। एक जज्बाती कहानी, बेहतरीन निर्देशन, शानदार अभिनय और यादगार संगीत। 'इजाजत' ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त कामयाबी हासिल की और बतौर व्यापारिक एक्टर नसीर का रुतबा और बढ़ गया। 'त्रिदेव' जैसी सुपरहिट फ़िल्म देकर, 90 का दशक आते-आते नसीर ने व्यापारिक फ़िल्मों में भी अपनी अलग पहचान बना ली थी। 2003 में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'द लीग ऑफ एक्सट्रा ऑर्डिनरी जेंटलमेन' में नसीरुद्दीन ने कैप्टन नीमो का किरदार निभाया तो दूसरी तरफ पाकिस्तानी फ़िल्म 'खुदा के लिए' में भी उन्होंने शानदार काम किया। देश से लेकर परदेस तक, नसीरुद्दीन शाह ने अपनी अदाकारी का लोहा सारी दुनिया में मनवाया है। लेकिन नसीर अपनी काबिलियत को खुशकिस्मती का नाम देते हैं। वो कहते हैं, 'मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि मुझे इतने मौके मिले, लेकिन मैं व्यापारिक फ़िल्मों से अभी संतुष्ट नहीं हूँ।' 2008 में आई 'अ वेडनेसडे' ने नसीर की कमाल की अदाकारी का एक और नजराना पेश किया तो 'इश्किया', 'राजनीति', 'सात खून माफ' और 'डर्टी पिक्चर' जैसी फ़िल्मों के जरिए नसीरुद्दीन ने बार-बार ये साबित किया कि एक सच्चे कलाकार को उम्र बांध नहीं सकती। हाल ही में रिलीज हुई फ़िल्म 'मैक्सिमम' में भी नसीर की जोरदार एक्टिंग ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया है। आज के नसीरुद्दीन शाह की बात करें तो शायद ही ऐसा कोई रोल है जो उनपर फिट नहीं बैठे। आखिर वो एक्टर ही ऐसे हैं कि हर रोल के मुताबिक खुद को ढाल लेते हैं। लेकिन एक समय था जब नसीर को दो रोल करने की इच्छा थी जो उस समय उन्हें नहीं मिले। लेकिन बाद 'मिर्जा गालिब', दूरदर्शन धारावाहिक में उन्हें दो रोल मिले जिसमें उन्होंने ग़ालिब का वास्तविक चित्र उभारने की कोशिश की। लेकिन आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि गालिब बनने की नसीर की तमन्ना उनके दिल में एक अधूरे ख्वाब की तरह अटकी हुई थी। 1988 में सीरियल बनाने से सालों पहले गुलजार साहब गालिब पर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे और उस फ़िल्म में गालिब के तौर पर उनकी दिली इच्छा संजीव कुमार को लेने की थी। नसीर साहब ने इस बारे में बताते हुए कहा, 'मैंने गुलजार भाई को चिठ्ठी लिखी और अपनी फोटोग्राफ्स भेजी, मैंने लिखा कि ये क्या कर रहे हैं, इस फ़िल्म में आपको मुझे लेना चाहिए।' लेकिन संजीव कुमार को दिल का दौरा पड़ गया था और सेहत उनका साथ नहीं दे रही थी। फिर उसके बाद गुलजार साहब के दिल में उस रोल के लिए अमिताभ के नाम का खयाल आया। लेकिन वहां भी बात नहीं बनी और आखिरकार गालिब पर फ़िल्म बनाने का प्लान ही ठंडे बस्ते में पड़ गया। शायद उस वक्त गुलजार को भी नहीं मालूम होगा कि इस किरदार पर तो तकदीर ने किसी और का नाम लिख दिया है। कई साल बाद गुलजार साहब ने एक दिन नसीर को फोन लगाया। नसीर ने बताया, 'एक दिन मुझे गुलजार भाई का फोन आया कि सीरियल में काम करोगे। मैंने पूछा कौन सा सीरियल तो उन्होंने बताया गालिब पर है। मैंने बिना कुछ सोचे फौरन हां कह दिया।' साल 1982 में 'गांधी' के रिलीज होने के अट्ठारह साल बाद कमल हासन ने 'हे राम' बनाई, जिसने नसीर साहब की गांधी बनने की तमन्ना को भी पूरा कर दिया। सधी हुई अदाकरी और बेजोड़ अंदाज से उन्होंने ना केवल गांधी के किरदार में जान डाल दी। बेजोड़ एक्टिंग और गजब की क्षमता से हर तरह के किरदार निभाने वाले नसीर ने अपनी छाप नकारात्मक भूमिकाओं में भी छोड़ी। समानांतर सिनेमा का ये हीरो कमर्शियल फ़िल्मों में एक ख़तरनाक विलेन के तौर पर भी हमेशा याद किया जाता रहेगा। हिन्दी सिनेमा में विलेन का ये नया चेहरा था, खूंखार और अजीबोगरीब शक्ल वाला कोई गुंडा नहीं बल्कि सोफेस्टिकेटेड इंसान जिसके दिमाग में सिर्फ जहर ही जहर था। विलेन का ये किरदार जितना संजीदा था उससे भी ज्यादा संजीदगी से उसे निभाया था नसीरुद्दीन शाह ने। वैसे खलनायक के तौर पर उनकी एक दो फ़िल्में नहीं थीं। 'मोहरा' में उन्होंने दिखाया विलेन का वो चेहरा जो किसी के भी दिल में खौफ पैदा कर सकता है। अंधा होने का नाटक करने वाला एक शिकारी, लेकिन ये नसीर की असली पहचान नहीं थी। नसीर की असली पहचान समानांतर सिनेमा था। सिनेमा की वो धारा जिसमें एक स्टार के लिए कम और एक्टर के लिए गुंजाइश ज्यादा होती है। और ये बात किसी से छुपी नहीं कि नसीर एक एक्टर पहले और स्टार बाद में हैं। समानांतर सिनेमा के इस सितारे ने स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, अमरीश पुरी और ओम पुरी जैसे माहिर कलाकारों के साथ मिलकर आर्ट फ़िल्मों को एक नई पहचान दी। 'निशान्त' जैसी सेंसेटिव फ़िल्म से अभिनय का सफर शुरू करने वाले नसीर ने 'आक्रोश', 'स्पर्श', 'मिर्च मसाला', 'भवनी भवाई', 'अर्धसत्य', 'मंडी' और 'चक्र' जैसी फ़िल्मों में अभिनय की नई मिसाल पेश कर दी। व्यक्तिगत जीवन नसीरुद्दीन शाह का जन्म 20 जुलाई 1950 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुआ था। नसीरूद्दीन शाह ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लिया। अभिनय के इस प्रतिष्ठित संस्थान से अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण लेने के बाद वे रंगमंच और हिन्दी फ़िल्मों में सक्रिय हो गए। नसीरूद्दीन शाह की फ़िल्मों की सूची में समानांतर और मुख्य धारा की फ़िल्मों का अनूठा सम्मिलन देखने को मिलता है। आपके भाई लेफ्टिनेंट जनरल (सेवा निवृत्त) ज़मीर उद्दीन शाह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। प्रमुख फिल्में नसीरूद्दीन शाह का कॅरियर नसीरूद्दीन शाह ने अपने कॅरियर की शुरुआत फ़िल्म निशांत से की थी जिसमें उनके साथ स्मिता पाटिल और शबाना आजमी जैसी अभिनेत्रियां थीं। ‘निशांत’ एक आर्ट फ़िल्म थी। यह फ़िल्म कमाई के हिसाब से तो पीछे रही पर फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह के अभिनय की सबने सराहना की। इस के बाद नसीरुद्दीन शाह ने आक्रोश, ‘स्पर्श’, ‘मिर्च मसाला’, ‘अलबर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है’, ‘मंडी’, ‘मोहन जोशी हाज़िर हो’, ‘अर्द्ध सत्य’, ‘कथा’ आदि कई आर्ट फ़िल्में कीं। आर्ट फ़िल्मों के साथ वह व्यापारिक फ़िल्मों में भी सक्रिय रहे। ‘मासूम’, ‘कर्मा’, ‘इजाज़त’, ‘जलवा’, ‘हीरो हीरालाल’, ‘गुलामी’, ‘त्रिदेव’, ‘विश्वात्मा’, ‘मोहरा’, सरफ़रोश जैसी व्यापारिक फ़िल्में कर उन्होंने साबित कर दिया कि वह सिर्फ आर्ट ही नहीं कॉमर्शियल फ़िल्में भी कर सकते हैं। नसीरूद्दीन शाह के फ़िल्मी सफर में एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्होंने मसाला हिन्दी फ़िल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कोई हिचक नहीं दिखायी। वक्त के साथ नसीरूद्दीन शाह ने फ़िल्मों के चयन में पुन: सतर्कता बरतनी शुरू कर दी। बाद में वे कम मगर, अच्छी फ़िल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगे। नसीरूद्दीन शाह ने एक फ़िल्म का निर्देशन भी किया है। हाल ही में वह “इश्किया”, “राजनीति” और “जिंदगी ना मिलेगी दुबारा” जैसी फ़िल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेर चुके हैं। वर्ष फ़िल्म चरित्र टिप्पणी२०२५ फतेह२०१६ जीवन  हठीतेरा  सुररूर २०१५चार्ली  के  चक्कर  में वेलकम  बैकडर्टी  पॉलिटिक्स  २०१४फाइंडिंग  फन्नीडेढ़  इश्किया२०१३जॉन  डेज़िंदा  भाग सिद्धार्थ२०११देओलगर्ल  इन  येलो  बूट्स  डर्टी  पिक्चर ज़िन्दगी  न  मिलेगी  दोबारा ७ खून माफ़ २०१० अल्लाह  के  बन्देराजनीति इश्किया पीपली  लाइव२००९ फ़िराकबारह  आना २००८दस  कहानियां जाने तू या जाने नाएक बुधवार!बॉम्बे से बैंकॉक अमल २००७ जाने तू ... या जाने ना शूट ऑन साइट हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड २००६ कृश शून्य वैली ऑफ फ्लौवर्स एक धुन बनारस की मिक्सड डबल्स ओमकारा 2005 पहेली इकबाल होम डिलीवरी बींग साइरस मैं मेरी पत्नी और वो परज़ानिया द ग्रेट न्यू वण्डरफुल 2004 असंभव मैं हूँ ना 2003 तीन दीवारें मकबूल द लीग ऑफ एक्सट्राऑर्डिनरी जेंटलमैन 2002 एनकाउन्टर 2001 कसम मोक्ष मानसून वैडिंग मुझे मेरी बीवी से बचाओ गुरु महागुरु 2000 तूने मेरा दिल ले लिया हे राम गज गामिनी 1999 सरफ़रोश भोपाल एक्सप्रेस 1998 चाइना गेट दंड नायक धूँढते रह जाओगे सर उठा के जियो बॉम्बे बॉयेज़ सच अ लौंग जर्नी 1997 अग्निचक्र दावा लहू के दो रंग प्राइवेट डिटेक्टिव 1996 चाहत राजकुमार हिम्मत १९९५ टक्कर नाजायज़ मिस्टर अहमद १९९४ द्रोह काल पोंथन मादा त्रियाचरित्र मोहरा १९९३ लुटेरे सर कभी हाँ कभी ना हस्ती बेदर्दी गेम १९९२ विश्वात्मा चमत्कार पनाह देवा डाकू और पुलिस इलेक्ट्रिक मून तहलका टाइम मशीन १९९१ लक्ष्मण रेखा शिकारी एक घर माने १९९० पुलिस पब्लिक चोर पे मोर १९८९ खोज त्रिदेव १९८८ हीरो हीरालाल मालामाल पेस्तॉन जी रिहाई द पर्फेक्ट मर्डर ज़ुल्म को जला दूँगा लिबास मिर्ज़ा ग़ालिब १९८७ जलवा इजाज़त महेन्द्र ये वो मंज़िल तो नहीं १९८६ जेनेसिस शर्त एक पल मुसाफ़िर कर्मा १९८५ गुलामी मिसाल मिर्च मसाला त्रिकाल अघात अनंतयात्रा खामोश १९८४ मान मर्यादा लोरी होली मोहन जोशी हाज़िर हो कंधार पार पार्टी १९८३ जाने भी दो यारों मासूम हादसा मंडी अर्द्ध सत्य कथा वो सात दिन १९८२ बाज़ार दिल आखिर दिल है स्वामी दादा अधरशिला सितम तहलका १९८१ चक्र उमराव जान तजुर्बा बेज़ुबान सज़ाये मौत १९८० आक्रोश अलबर्ट पिन्टो को गुस्सा क्यों आता है अलबर्ट हम पाँच सूरज स्पर्श भवनी भवाई १९७९ सुनयन शायद १९७८ जुनून १९७७ भूमिका गोधूलि १९७६ मंथन 1975 निशांत बतौर निर्देशक वर्ष फ़िल्म टिप्पणी2006 यूँ होता तो क्या होता पुरस्कार 1984 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - मासूम 1982 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - चक्र 1981 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - आक्रोश नसीरूद्दीन शाह को 1987 में पद्म श्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है। 1979 में फ़िल्म ‘स्पर्श’ (Sparsh) और 1984 में फ़िल्म ‘पार’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ट अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 2006 में फ़िल्म ‘इकबाल’ के लिए नसीरुद्दीन शाह को सर्वश्रेष्ट अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 1981 में फ़िल्म ‘आक्रोश’, 1982 में फ़िल्म ‘चक्र’ और 1984 में फ़िल्म ‘मासूम’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ट अभिनेता के फ़िल्मफेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया। वर्ष 2000 में उन्हें “संगीत नाटक अकादमी अवार्ड” से सम्मानित किया गया। अपनी अलग शैली और अभिनय कला की वजह से आज भी बॉलीवुड में उन्हें सम्मान दिया जाता है। आने वाले दिनों में उनकी कई फ़िल्में आने वाली हैं जिनसे उनके प्रशंसकों को काफी उम्मीदें हैं। सन्दर्भ श्रेणी:श्रेष्ठ अभिनेता के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार विजेता श्रेणी:हिन्दी अभिनेता श्रेणी:1949 में जन्मे लोग श्रेणी:उत्तर प्रदेश के लोग श्रेणी:जीवित लोग श्रेणी:भारतीय फ़िल्म अभिनेता