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411 समाचार
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भारतीय विवाह

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भारतीय विवाह विवाह दो व्यक्तियों का सामाजिक, धार्मिक या/तथा कानूनी रूप से साथ रहने का सम्बन्ध है। विवाह मानव समाज की अत्यंत महत्वपूर्ण प्रथा है। विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग आस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनो में परमात्मा ने कुछ विशेषतायें और कुछ अपूर्णताऐं दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से एक दूसरे की अपूर्णताओं को अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं। इसलिये विवाह को मानव जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह समाज का निर्माण करने वाली सबसे छोटी इकाई परिवार का मूल है। इसे मानव जाति के सातत्य को बनाए रखने का प्रधान साधन माना जाता है। हिन्दू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना गया है। विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना। हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे कि किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारे को साक्षी मान कर और पाॅच वचन सुनाये जाते हैं तो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है। भारत में अनेक राज्य हैं और इन अनेक राज्यों में अनेक तरह के लोग रहते हैं और उसके साथ-साथ उनके अलग-अलग विवाह के तरीके होते हैं। इस लेख में हम भारत के कुछ राज्यों के विवाह के बारे में चर्चा करेंगे। पंजाबी विवाह: अंगूठाकार|300x300पिक्सेल|पंजाबी शादी पंजाबी शादी की परम्परा पंजाबी संस्कृति का एक मजबूत प्रतिबिंब है। शादी से पूर्व की रस्में: मंगनी या शगुन: लड़की के परिवार वाले उपहार, गहने और अन्य सामान के साथ सगाई की पुष्टी के लिये लड़के वालों के घर पर जाते हैं। रोका: यह एक अनौपचारिक सगाई की रस्म है। यहाँ परिवार और दोस्त होने वाले जोड़े को आशीर्वाद देते हैं। लड़की के मामाजी लड़की को उपहार में नथ देते हैं जिसे वह अपने शादी में पहनती है। सगाई: शादी का समारोह टीके की रस्म के साथ शुरू होती है जो शादी से दस दिन या एक सप्ताह पहले रखी जाती है। इसमें लड़की का परिवार लड़के के घर पर सुंदर उपहार और टीके का सामान लेकर जाते हैं। लड़की के पिता लड़के के सर पर टीका लगाते हैं और आशीर्वाद देते हैं। इसके बदले में लड़की वालों को सात सूखे फलों की टोकरी दी जाती है और बाद में दोनोॆ एक-दूसरे को अंगूठी पहनाते हैं। मेंहदी:मेंहदी विवाह से पहले होने वाला एक प्रमुख समारोह है। मेंहदी लगाने वालियों को लड़के और लड़की वाले के घर पर बुलाया जाता है और घर में सारी महिलाओं को मेंहदी लगाई जाती है। लड़की को हाथ और पैरों दोनों में मेंहदी लगाई जाती है। यह मेंहदी लड़की की होने वाली सास भेजती है। दुल्हन के घर पर होने वाली रस्में: चूड़ा: लड़की के घर पर अनुष्ठान चूड़ा समारोह के साथ शुरू होता है। चूड़ा मूल रूप से लाल और क्रीम चूडियों का एक सेट है जो लड़की का मामा उसे देता है, लेकिन लड़की उसे शादी से पहले देख नही सकती है। हल्दी: चार दीये जलाये जाते हैं और लड़की को उसके सामने बिठाया जाता है। इस समारोह में लड़की के दोस्त और परिवार वाले हल्दी और तेल का उबटन लड़की के शरीर पर लगाते हैं। यह लड़की के चेहरे पर चमक लाने के लिये लगाया जाता है। इस रस्म के बाद लड़का-लड़की शादी तक एक दूसरे से नहीं मिल सकते। दूल्हे के घर पर होने वाली रस्में: सरवाला: एक छोटे बच्चे, भतीजे या भाई को दूल्हे की तरह सजाया जाता है और बाद में यही बच्चा दूल्हे के साथ घोड़ी पर बैठता है। सेहराबंदी: लड़के को दूल्हे की तरह तैयार करने के बाद एक पूजा की जाती है और उसके बाद लड़के की बहन उसे सेहरा बाँधती है। वारना: यह बुरी नज़र को हटाने के लिये किया जाता है। यहाँ भाभी दूल्हे को काजल लगाती है। घोड़ी चढ़ना: यह अंतिम रस्म है। लड़का घोड़ी पर चढ़ता है और विवाह के स्थल पर जाने के लिये बढ़ता है। विवाह स्थल पर होने वाली रस्में: मिलनी: यहाँ सब एक-दूसरे से मिलते हैं। पुजारी जी अरदास पढ़ते हैं। वरमाला: यहाँ लड़का और लड़की एक-दुसरे को फूलों की वरमाला पहनाते हैं। कन्यादान और फेरे: कन्यादान मे लड़की के पिता लड़के को अंगूठी पहनाते हैं और फिर अपनी बेटी को उसे सौंपते हैं। इसके बाद फेरे की रस्म शुरू होती है। फेरे पवित्र अग्नि के सामने लिये जाते है। उसके बाद लड़का-लड़की के माँग में सिंदूर डालता है और उसे मंगलसूत्र पहनाता है। इसके बाद सभी रस्म पूरी हो जाती हैं और दूल्हा-दुल्हन सभी के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। तमिलियन विवाह या अय्यर शादी: अय्यर दक्षिण भारत के तमिलयन ब्राहमण हैं। अय्यर विवाह को तमिल में कल्याणम् या तिरूमनम् कहते हैं। यह शादी अन्य हिन्दू शादियों की तरह २-३ दिन के लिये चलती है। परम्परागत रूप से दुल्हन के परिवार वाले विवाह की योजना बनाते हैं। व्रुथम: परम्परागत रूप से शादी की सभी रस्में पूर्वजों और भगवान की पूजा के साथ शुरू की जाती हैं। यह आम तौर पर शादी के एक दिन पहले सुबह-सुबह किया जाता है। एक पवित्र पीला धागा दूल्हे और दुल्हन की कलाई पर बाँधा जाता है। इसके बाद पालिका रस्म होती है जहाँ नौ तरीके के अनाज से दुल्हे और दुल्हन के ऊपर छिड़काव किया जाता है। उन्हें समृद्धि का आशीर्वाद दिया जाता है। इस रस्म के अंत में आरती समारोह की जाती है। जानावसन या बारात: दूल्हा शादी के स्थल पर एक सुंदर सजाए हुए रथ या वाहन में आता है। दूल्हे के परिवार वाले और दोस्त बारात में नाचते गाते आते हैं। उसके बाद सब मंदिर जाते हैं जहाँ दूल्हे-"मापिल्लय" को निश्चयाथर्थम समारोह के लिए एक परम्परागत धोती और शर्ट दिया जाता है। बारात इसके बाद मंडपम में वापस आती है। निश्चयाथर्थम समारोह या सगाई: दुल्हन के परिवारवाले दूल्हे के लिये हल्दी, पान, सुपारी और कपड़ा लाते हैं। दुल्हन का भाई तब सम्मान के लिये दूल्हे को फूलों की माला पहनाता है। इसके बाद आरती की जाती है और नारियल फोड़ा जाता है। उठाये मंच पर दोनों परिवार वाले एक-दूसरे के सामने बैठते हैं जहाँ लग्न पत्रिका लिखी जाती है और पुजारी उसे जोर से पढ़ते हैं। इसके बाद थाल और तोहफे बदले जाते हैं। काशी यात्रा: दूल्हा पारम्पारिक कपड़े मे तैयार रहता है। वह एक छाता, एक पंखा, एक छड़ी और एक कपड़े में चावल-दाल बाँधकर कंधे पर डालकर धार्मिक अध्य्यन के लिये आगे बढ़ता है परंतु जैसे ही वह जाने लगता है, दुल्हन के पिता उसे विवाहित जीवन की महत्वता बताते हैं और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिये साथी के रूप में अपनी बेटी देने का वादा करते हैं और दूल्हा वापस मंडप मे आ जाता है। मलय मात्रल: एक बार जब दुल्हा मान जाता है तो दूल्हा-दुल्हन के बीच वरमाला का आदान-प्रदान होता है। इसके बाद दूल्हा और दुल्हन के मामा दोनों को अपने कन्धे पर उठाते हैं और दोनो तीन बार एक दूसरे को वरमाला पहनाने की कोशिश करते हैं। ओंजल: इसके बाद जोड़े को झूले पर बिठाया जाता है और झूले को धीरे से हिलाया जाता है। रिश्तेदार और दोस्त सब मंगल गीत गाते हैं और आशीर्वाद देते हैं। कनिका दानम- कन्यादान: दुल्हन अपने पिता के गोद मे बैठती है। उसका हाथ दूल्हे के हाथ में रखा जाता है। उसके हाथ पर नारियल, पान रखते हैं। दुल्हन के सिर पर कसा घास की बनी एक अंगूठी रखी जाती है जिसके ऊपर थाल में सोने का मंगलसूत्र रखा जाता है और छेद से पानी डाला जाता है। कंकणा धारनम: दुल्हन एक धार्मिक व्रत से खुद को बाध्य करने के लिये दूल्हे की कलाई पर हल्दी लगा एक धागा बाँधती है। इसके बाद दूल्हा दुल्हन को धागा बाँधता है। मांगल्यधारनम: पूर्व निर्धारित शुभ घंटे में मंगल सूत्र बाँधा जाता है। दूल्हा पश्चिम की और चेहरा करके बैठता है जबकी दुल्हन अपने पिता की गोद में बैठी रहती है। दूल्हा दुल्हन को सोने का मंगलसूत्र पहनाता है और इसी समय नादस्वरम जोर से बजाया जाता है। मंगलसूत्र के साथ-साथ हल्दी का पीला धागा भी बाँधा जाता है। सप्तपदि: दुल्हा दुल्हन अग्नी के सात फेरे लेते हैं। इसके बाद वह अपने बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं।