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नश्वान बिन्त अल-जमाल
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नश्वान बिन्त अल-जमाल (अरबी: نشوان بنت الجمال), जिन्हें उनके प्रारंभिक जीवन में 'सौदा' (سودة) के नाम से भी जाना जाता था, मिस्र की एक प्रमुख इस्लामी विदुषी, शिक्षिका और लेखिका थीं। उनका निधन 19 रज्जब, 800 हिजरी (14वीं शताब्दी के अंत) में मंगलवार की रात को हुआ था। समय के साथ उनका 'सौदा' नाम प्रचलन से बाहर हो गया और वे मुख्य रूप से 'नश्वान' के नाम से ही ऐतिहासिक अभिलेखों में दर्ज की गईं।
उनका पूरा नाम नश्वान बिन्त अल-जमाल अब्दुल्ला बिन अल-अला अली बिन मुहम्मद बिन अली बिन अब्दुल्ला बिन अबी अल-फतह अल-किनानी, अल-अस्कलानी, अल-काहिरी, अल-हंबली था। उनके नाम में जुड़े ये उपनाम उनके वंश और पृष्ठभूमि को दर्शाते हैं; 'अल-किनानिया' का अर्थ है कि वे किनाना कबीले से थीं, 'अल-अस्कलानी' उनके पूर्वजों के अश्कलोन क्षेत्र से होने का सूचक है, और 'अल-हंबलिया' यह दर्शाता है कि वे इस्लामी न्यायशास्त्र की हंबली विचारधारा (मज़हब) की अनुयायी थीं। ऐतिहासिक रूप से उन्हें मिस्र की मामलुक सल्तनत के काल की सबसे शिक्षित महिलाओं में से एक माना जाता है। वह इस्लामी इतिहास, धर्मशास्त्र (अकीदा), और सुलेख (कैलीग्राफी) की विशेषज्ञ थीं।
== प्रारंभिक जीवन और शिक्षा ==
नश्वान का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ ज्ञान और इस्लामी न्यायशास्त्र को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता था। उनके पिता और परिवार के अन्य सदस्य भी धार्मिक विद्वान थे। मध्यकालीन इस्लामी समाज में महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करने के सीमित अवसर होने के बावजूद, नश्वान ने अपने समय के कई प्रमुख विद्वानों के मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त की।
ज्ञान की खोज (जिसे इस्लामी परंपरा में 'रिहला' कहा जाता है) के लिए उन्होंने एक से अधिक बार हेजाज़ (मक्का और मदीना) की शैक्षणिक यात्राएं कीं। इन यात्राओं के दौरान उन्होंने विभिन्न विद्वानों से हदीस और इस्लामी कानून की बारीकियां सीखीं और बाद में वहां शिक्षण कार्य भी किया।
== शिक्षण करियर और मदरसा ==
हेजाज़ में अपनी शैक्षणिक यात्राएं पूरी करने के बाद, नश्वान मिस्र लौट आईं। वहां उन्होंने अपना स्वयं का एक मदरसा (इस्लामी शिक्षण संस्थान) स्थापित किया। 14वीं शताब्दी के काहिरा में किसी महिला द्वारा स्वतंत्र रूप से मदरसे का संचालन करना एक उल्लेखनीय उपलब्धि थी।
प्रसिद्ध इस्लामी इतिहासकार अल-सखावी के विवरणों के अनुसार, शिक्षण के दौरान छात्रों के प्रति उनके स्नेही, सहानुभूतिपूर्ण और धैर्यवान व्यवहार के कारण वे पूरे मिस्र में अत्यधिक पहचानी जाने लगी थीं। उनके छात्रों में उनके प्रति गहरी निष्ठा और सम्मान था।
समकालीन महिला विद्वानों के बीच उनकी उपस्थिति का विशेष सम्मान किया जाता था। इस्लामी इतिहास में यह दर्ज है कि जब वह ज्ञान की सभाओं (मजलिसों) या शैक्षणिक गोष्ठियों में भाग लेने के लिए उपस्थित होती थीं, तो सभा में मौजूद पुरुष विद्वान उनके सम्मान में खड़े हो जाते थे। यह उस युग में उनके गहरे अकादमिक प्रभाव को दर्शाता है। इतिहासकार अल-सखावी ने उनके व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए लिखा है:
"धार्मिक आस्था, उत्कृष्ट प्रबंधन क्षमता, तार्किक सोच, उच्च संकल्प, उदारता और सिद्धांतों के प्रति उनकी दृढ़ता के कारण तत्कालीन धार्मिक और सामाजिक नेताओं के बीच उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी। हंबली न्यायविद (काज़ी) अल-इज़्ज़ अल-किनानी का यह नियम था कि वह किसी भी महिला के प्रवेश पर सम्मान में खड़े नहीं होते थे, लेकिन नश्वान बिन्त अल-जमाल एकमात्र ऐसी महिला थीं जिनके सम्मान में वे अपनी जगह से उठ खड़े होते थे।"
== प्रमुख छात्र और प्रभाव ==
मिस्र और हेजाज़ में उनके शिक्षण के दौरान कई ऐसे छात्रों ने उनसे शिक्षा प्राप्त की जो आगे चलकर मामलुक काल के प्रमुख विद्वान बने। उनके प्रमुख छात्रों में मुहम्मद बिन बरकात बिन हसन बिन अजलान अल-हसानी जमाल अल-दीन, तत्कालीन न्यायाधीश (काज़ी) कमाल अल-दीन अल-जाफ़री अल-नबुलसी शामिल थे।
उनके सबसे प्रसिद्ध छात्रों में 15वीं शताब्दी के बहुश्रुत इस्लामी विद्वान और इतिहासकार जलाल अल-दीन अल-सुयुति का नाम भी शामिल है। अल-सुयुति ने अपनी विभिन्न पुस्तकों में अपनी महिला शिक्षिकाओं का उल्लेख किया है, जिनमें नश्वान का नाम प्रमुखता से आता है। 19 रज्जब 800 हिजरी को उनके निधन के बाद उन्हें हौश अल-हनाबिला (हंबली कब्रिस्तान) में दफनाया गया।
== सन्दर्भ ==