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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

ओखाहरन्

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ओखहरन - भगवान शिव ओर पार्वती की पुत्री (ओखा) की कहानी सबसे पहेले सुखदेवजी ने परीक्षीत राजा को ओखाहरण की कथा सुनाई थी। उसमे उन्होंने ओखा के जीवन के बारे मे और उसकी शादी किससे, कैसे और कहाँ हुई थी, यह सब बताया था। सुखदेव जी ने ओखाहरन की कथा की शुरुआत मे ही कहा है की...... (कथा की शुरुआत) ओखाहर्ण की कथा जो भी चैत्र मास मे पड़ता है उसे पूरे साल मे कभी भी कोई रोग नही होता.उसे कभी भी बुखार नही होता और उसे कभी भी स्वप्न मे भी भुत के आसर नही होते। उसके बाद परीक्षीत राजा ने सुखदेव जी को ओखा का महत्व (महिमा) बताने को कहा..और पूछा की कैसे ओखा और अनीरुध का विवाह हुआ था? तब सुखदेव जी ने कथा शुरू करते हुए कहा की.........(उन्होंने शुरुआत कृष्ण भगवान से की) कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ। उन्होंने वृन्दावन मे अपनी लीलाएँ रचाईं। सबसे पहले उन्होंने पूतना को मारा। उसके बाद मामा कंस उसके बाद वो द्वारिका मे गए और उन्होंने शादी की। उनकी सोलह हजार रानिया थी उनमे से आठ उनकी पटरानियाँ थी। उसमे सबसे बड़ी रुकमनी जी उनका पुत्र प्रद्युमन और प्रद्युमन का एक पुत्र था उसका नाम अनीरुध था। ये था अनीरुध का परीवार। (अब ओखा के बरे मे बताते हूए उन्होंने कहा) ब्रह्मा जी सृष्टी करता उनके बेटे मारीच। मारीच के बेटे कश्यप उनके दो बेटे हरीन्यकश्यप और हीरानाक्ष। हरीन्यकश्यप का बेटा वीषणूं भक्त प्रह्लाद उसका बेटा वीरोचन और उसका बेटा बली। बली का बेटा बानासुर और उसकी बेटी ओखा बानासुर का तप और शिव का दिया हुआ वरदान बानासुर बड़ा शीव भक्त था। एक दीन उनके गुरु शुक्र जी से वो मीला तब उसने तप के महिमा के बरे मे पूछा . गुरूजी ने कहा: सुनो जग्राय त्रिलोक म शम्भू भोला आप्शे वरदान .मधुवन मे जाके तप करो आराधो शीव भगवान उसके बाद बानासुर मधुवन मे तप करने के लीये जाता है और वहा जाकर नीर्मल जल से स्नान करके बाय्ने हाथ मे जपमाला ले कर उसने तप करना शुरू किया कितने सालो तक उसने तप कीया की उसके शरीर का रक्त भी सुख गया। उसके तप से पुरा त्रीभुवन डोल ने लगा. तब शंकर जी बोले : सुनो उमीया माय रे एक असुर महातप करे और धरे मेरा ध्यान रे.उसको कैसे समजाये वो तो बैठा करने महा जाप रे.आप कहो तो उसे वरदान दु और कहो तो उसे अपना पुत्र बनावु.तब उमीयाजी बोले : मेरी बात सुनो शुल्पानी रे दूध पिलाके साँप को पालेंगे तो आगे जाके हमको ही तकलीफ होगी.याद होगा आपने एक बार रावन को भी वरदान दिया था। उसने सीताजी को परेशां किया था। तो अब मे कया सलाह दू आपको जो ठीक लगे वो कीजये. शिवजी बोले : आप सुनो उमीया माय रे, जो मेरी सेवा करके जल चढाये उसकी काया करू निर्मल रे. जो सेवा करके सुगंध चढाये उसकी बुद्धी करू धन धन रे. जो मुजे चढाये बिली पत्र उसे दू सोने कया छात्र रे. जो मेरी सेवा करके बजाये जाल्ताल उसे कर्दु न्याल रे. नारी पानी ऐ बुद्धी आपकी, देने की लिए न करे देरी . मे तो भोला नाथ हू, अब कपटी नाथ कैसे हो जाऊ . ऐसा बोल कर चले भोलेनाथ और रखा बानासुर के शीर पे हाथ। ओर बोले जग बानसुर राय जतुजे वर्दन दे शीव्राय। बानसुर बोला : मे तो जग रह हू भग्वान्, देदो शोनित्पुर का राज रे। मे मान्गुु बार बार, मुजे देदो हाथ ह्जार रे। ऐसा उप्कार किजिए दस हजार हाथी जित्ना बल दीजीए। अस्तु केह कर शीव जि ने वर्दान दीया ओर बानासुर को पुत्र कर के स्तापीत कीया। बानासुर पूरी पृथ्वी का अधिपति बना वरदान पा कर बानासुर शोणितपुर मे वापिस गया। तब उसे देख कर सब पशु पंखी डरने लगे और जैसे कोई जाड चला आ रहा हो ऐसा लग रहा था। जब वो अपने नगर के नजदीक आया तो सिर्फ उसके प्रधान ने ही उसको पहचाना। उसके बाद उसकी शादी हुए और उसके बाद उसने एक के बाद एक सभी देश को जीतना शुरू कर दीया, उसने पाताल लोक को भी नही छोड़ा अब उसको स्वर्ग जीतने की इच्छा हुयी और वो स्वर्ग जीतने गया और उसके डर से सभी देवता वहा से चले गए। उसने सूर्य तक को भी जीत लीया। जब वो सूर्य को जीत कर वापिस जा रहा था तब उसे नारद जी मेले और वो नारद्जी को प्रणाम करके बोला ओ नारदजी अब एक भी योदधां नही है अब मे के करू ? नारद जी बोले : तो सुन बानासुर राय जिसने तुझको हजारो हाथ दीये उसी शीव से जाके संग्राम कर . बानासुर शिवजी के साथ युद्ध करने के लिये गया कैलाश पर्वत पर जाके उसने उसको हीलाना शुरू कीया यह देख कर पार्वती जी डर गयी और शिवजी के पास जा कर बोली अरे अरे शीवराय जिसको आपने शोनीतपुर का राज्य दीया हजारो हाथ दीए अब वो यहा क्या मांगने वापिस आया है? बनासुर बोला : आपने मुजे हजारो हाथ दीए यह अत्या है पर अब लड़ने के लिए मुजे कोई समर्थ योदधां भी दीजीये और मेरे साथ युद्ध कीजीये। शिवजी बोले : यह तेरी जीद छोड़ दे वरना बहुत पछ्तायेंगा। शिवजी ने बानासुर को श्राप दिया शिवजी बोले तुमने यह ठीक नही किया, इसीलिये मे तुम्हें यह श्राप देता हूँ की ऐसा कोई आयेगा तुम्हारे जो हाथ काट देगा औ‍र तुम्हारे अनेक टुकडे करके तुम्हें मार देगा | डर के मारे बानासुर बोला : मैं यह कैसे जानूंगा कि वह व्यक्ति कौन है, जो ऍसा करेगा? शिवजी बोले : तो ले बानासुर मे तुझे एक ध्वजा दे रहा हूँ, जब यह ध्वजा टूट जाए तब तेरे हाथ कट जायेंगे और तेरे नगर मे खून की बारिश होगी| तब तू यह जान जाएगा कि तेरी मौत आ गई है। यह वरदान ले कर बानासुर वापिस अपने शोणितपुर मे आ गया | भगवान श्री गणेश और ओखा की उत्पत्ति एक दीन महादेव जी को तप करने जाने का मन हुआ। यह सुनकर पार्वती जी बहोत रोने लगी और बोली अरे शिवजी मेरा यह जन्म कैसे कटेगा और मुजे एक भी संतान भी नही है। तब महादेव ने वरदान देते हुए कहा आप एक पुत्र और एक पुत्री उपजाए। वरदान देकर महादेव जी वन मे तप करने के लीये चले गए। उमीय जी नाहने के लीये बैठे और उन्होंने सोचा की शीव के घर बड़े देखकर कोई भी आता जाता रहेता है, तो क्यों न मे बालक को दरवाजे पर रखु तो वो बैठे बैठे देखे। उन्होंने अपने दकिशनं अंग से मेल ले कर अघड़ रूप बनाया। हाथ पाव और टूँका कद बनाया, चार भुजा और बड़ा पेट, जो देख ने मे लगे विशाल, उसकी शोभा का तो क्या कहेना? उनके कंठ मे घूघर माला.उनके पहले कर मे जल्कमंड़ल, दूसरे कर मे मोदक आहार, तीसरे कर मे फर्सी शोभे और चोथे कर मे जपमाला। गणेश को उपजा कर पार्वती जी बोले उसके पास अगर कोई हो तो वो बैठे बैठे बाते करे। यह सोच कर उन्होंने वाम अंग से मेल लेके एक लड़की बनाई उसकी शोभा का तो वरणनं ही नही कर सकते। अब दोनों भाई बहन खेलने लगे। शिवजी ने गणपति का शीरोच्छेदन किया देवी जब नाहने के लीये बैठे तब नारद जी वहा आए . उन्होंने दो बालक वहा बैठे हुए देखे तो वोह वहा से चले गए और जहा शिवजी थे वहा पर गए, मधुवन मे आकर नारद जी बोले : ओरे शिवजी ओरे शिवजी नाफ्फट भुन्ड़ी आपकी टेव। वन्वाग्ड़े मे फीरते हो शीर पर डाली धूल आंक, धतूरो वीजया खाओ। आप रे वन मे और आप के घर मे चला घर्सुत्र। आप के बीना उमिया जी ने उपजाए दो बालक। महादेव जी वहा से कैलाश के लीये निकले। वहा पहोंच कर उनको गणपती जी मेले और तलवार रखकर बोले ओरे जटाधारी जोगी। भस्म लगाकर बहोत अद्भुत दीखता है, कोई भी परवानगी बीना अन्दर नही जा सकता। यह सुन कर शिवजी क्रोधीत हुए और गणपती को लात मार कर घर के अनदर गए। गणपती ऐसें गीरे जैसे ब्रह्माण्ड टूट पड़ा। त्रिलोक डोलने लगा अरे ये क्या हुआ ?अब शीव्जी कोपएमान हो गये, ओर गुस्से मे आकर उन्होने श्री गणेशजी का शीश छेदन किया। शीव्जी ने माग्शर माह के क्रिश्न पक्श के चोथे दिन गणेश जी का शीर छेदा उसी दीन से गणेश चोथ के व्रत का प्रारम्भ हुआ। वो शीश जा के चंद्र माँ के रथ मे जा गीरा। इसी लीये चतुर्थी के दीन चंद्र पूजन होता है। अब शिवजी घर मे आए, जहा उमिया जी स्नान कर रही थी। उसे देखकर डरकर ओखा घर मे चली गई। नमक (वलन) की कोठडी मे जाके छुप गयी। और मन ही मन मे सोचने लगी की भैया को मारा अब मुजे भी मार डालेंगे। जब महादेव जी घर मे गए तो एकदम से नेत्रा खोल के उमीया जी बोलेे : महादेव जी क्यों आए हो वापिस, आंक, धतूरे खाना आपकी आदत है ये तो पता है पर क्या कोई नह्ता हो वह जगह पर क्यो दौडै आते हो ? आपको कुछ समज नही आता है ? मैंने दो बालक बाहर दरवाजे पे रखे है फीर भी आप कैसे मंदीर मे आ गए ? शिवजी बोले : चुप हो जा ओ पापंन मैंने सबकुछ देखा और समजा, इतने दीन तक मै तुम्हे सती जनता था। पर तुमने तो सब कुछ लूट लिया। मेरे बगैर तुम्हारी संतान कैसे हुयी ? वाह! आपने तो क्या हिमाचल का नाम रखा वाह! ऐसा सुनकर उमीया जी बहोत गुस्से मे आकर बोली कल ही तो आप कहे गए की प्रगट कर्जो बाल। तब शंकर जी शर्म से नीचे देखकर बोले तुम्हारी पुत्री कही चली गयी और तुम्हारे पुत्र को मैंने मार डाला। गणपती की मृत्यु से पार्वती का विलाप वादी बीना जूरे वेल्डी, बछड़े बीना जूरे गाय। भाई के बिना जूरे बहेनदी, पुत्र बीना जूरे मात। पैसा अनाज और पुत्रधन, पुत्र ज आगेवान। जीस घर पुत्र नही, उस घर के सुने जले मशान। पुत्र बीना घर पिन्जर, वन मे खड़े आग जलाऊ। शीव क्यों मारा गणपती को, मे अब मेरा पुत्र कहा से पाऊ ? बोलो हो बाल गणपती, बोलो हो बाल, शीव ने क्यो मारा हो गणपती। उमिया जी रुदन करते हुए बोले शीव पुत्र बीना जिसकी मात वो त्रने कैसे हल्की हो? तब शीव को होश आया, मैंने तो दीया था वरदान। ये तो वो नारद का काम हो गणपती, उसने जूठ बोला.उसने सब जूठी बात कही और मे तप से उठ के आया। मैंने मारा आपको ये कैसा निकला आज दींन ? श्रेणी:पुराण