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अनुच्छेद 31 (भारत का संविधान)
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भारत का संविधान भाग 3 संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 32 (भारत का संविधान) अनुच्छेद 30 (भारत का संविधान) भारतीय संविधान सभा भारत हिंदी :श्रेणी:संविधान 1949 प्रकाशित
भारत के संविधान का अनुच्छेद 31 स्वतंत्र भारत के आरंभिक वर्षों में संपत्ति के अधिकार से संबंधित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और चर्चित प्रावधान था। यह अनुच्छेद नागरिकों को उनकी संपत्ति से वंचित किए जाने के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता था और यह सुनिश्चित करता था कि किसी व्यक्ति की संपत्ति का अधिग्रहण केवल विधि के प्राधिकार के अंतर्गत ही किया जा सके। इस प्रकार यह प्रावधान व्यक्ति के आर्थिक अधिकारों और राज्य की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता था।Compulsory acquisition of property https://www.constitutionofindia.net/articles/article-31-compulsory-acquisition-of-property/ भारत का संविधान en-US
पृष्ठभूमि
संविधान-निर्माण के समय संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार के रूप में सम्मिलित किया गया था, क्योंकि उस समय यह माना गया कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और आर्थिक सुरक्षा के लिए संपत्ति का संरक्षण आवश्यक है। किंतु स्वतंत्रता के पश्चात भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन और संसाधनों के समान वितरण की नीतियों को लागू करने में इस अधिकार ने अनेक बार बाधाएँ उत्पन्न कीं।सचिव, भारत सरकार डॉ. जी. नारायण राजू भारत का संविधान https://surveyofindia.gov.in/documents/coi-hindi.pdf 9 नवम्बर 2015 भारत सरकार विधि और न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) राजभाषा खण्ड 18
इन परिस्थितियों में राज्य और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच टकराव बढ़ा, जिसके समाधान के लिए समय-समय पर संविधान में संशोधन किए गए। अंततः 44वें संविधान संशोधन (1978) के माध्यम से संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर एक वैधानिक अधिकार के रूप में स्थापित किया गया, और अनुच्छेद 31 को निरस्त कर दिया गया।सिंह उदयभान Indian Constitution and Polity Bhartiya Samvidhan Evam Rajvyavastha भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था For Union and State Service Commission Exams 2023 Book In Hindi https://www.google.co.th/books/edition/Indian_Constitution_and_Polity_Bhartiya/s2_LEAAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9B%E0%A5%87%E0%A4%A6+31+(%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4+%E0%A4%95%E0%A4%BE+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8)&pg=PA74&printsec=frontcover प्रभात प्रकाशन 2023Bharata Ka SamĐvidhana https://www.google.co.th/books/edition/Bharata_Ka_Sam%C4%90vidhana/-L2bAAAAMAAJ विधि एवं न्याय मंत्रालय, भारत सरकार 2005
अनुच्छेद 31 को संविधान के अन्य प्रावधानों, विशेषतः अनुच्छेद 19(1)(f) (संपत्ति रखने का अधिकार, जो अब निरस्त हो चुका है) और बाद में जोड़े गए अनुच्छेद 300A (वैधानिक संपत्ति अधिकार) के साथ जोड़कर समझा जाता है। इन प्रावधानों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि संपत्ति का अधिकार समय के साथ मौलिक अधिकार से एक साधारण वैधानिक अधिकार में परिवर्तित हो गया।
मूल पाठ (निरस्त होने से पूर्व)
संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 6 द्वारा (20-6-1979 से) निरस्त।
(1) किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल विधि के प्राधिकार द्वारा ही वंचित किया जाएगा।
(2) राज्य किसी संपत्ति का अधिग्रहण या अधिनियमित नहीं करेगा, जब तक कि वह सार्वजनिक प्रयोजन के लिए न हो और उसके बदले उचित प्रतिकर प्रदान न किया जाए।भारत का संविधान भारत का संविधान (संपा॰) प्रसाद राजेन्द्र 1957 52 पृष्ठ:भारत का संविधान (१९५७).djvu/६७सचिव, भारत सरकार डॉ० रीटा वशिष्ट भारत का संविधान https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s380537a945c7aaa788ccfcdf1b99b5d8f/uploads/2023/05/2023050186.pdf 26 नवम्बर 2021 भारत सरकार विधि और न्याय मंत्रालय (विधायी विभाग) 18
(I) No person shall be deprived of his property save by of law.
(2) No property shall be compulsorily acquired or requisitioned save for a public purpose and save by authority of a law which provides for compensation for the property so acquired or requisitioned and either fixes the amount of the compensation or specifies the principles on which, and the manner in which, the compensation is to be determined and given; and no such law shall be called in question in any court on the ground that the compensation provided by that law is not adequate.भारत का संविधान भारत का संविधान (संपा॰) प्रसाद राजेन्द्र 1957 52 पृष्ठ:भारत का संविधान (१९५७).djvu/६६
संदर्भ
टिप्पणी
अनुच्छेद 31 भारतीय संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है। प्रारंभ में यह व्यक्तिगत संपत्ति के संरक्षण का आधार था, किंतु सामाजिक और आर्थिक न्याय की आवश्यकताओं के चलते इसे परिवर्तित करना पड़ा। इसका निरसन इस बात को दर्शाता है कि संविधान एक स्थिर दस्तावेज़ नहीं, बल्कि समय और परिस्थितियों के अनुसार विकसित होने वाली एक जीवंत व्यवस्था है।भारत का संविधान (25 मार्च, 2014 को यथाविद्यमान) https://www.google.co.th/books/edition/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE/acGM0AYUDwAC भारत सरकार, विधि और न्याय मंत्रालय, विद्या विभाग 2014
इस प्रकार, अनुच्छेद 31 केवल एक विधिक प्रावधान नहीं, बल्कि उस संक्रमणकालीन दौर का दर्पण है, जिसमें भारत ने व्यक्तिगत अधिकारों और सामूहिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।
बाहरी कड़ियाँ
भारत का संविधान
श्रेणी:भारतीय संविधान के अनुच्छेद