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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

ब्राह्मी अंक

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अंगूठाकार|अशोककालीन ब्राह्मी अंकों का विकास। अंगूठाकार|अशोक के लघु शिलालेख क्र॰ १ (सासाराम) में “२५६” संख्या। अंगूठाकार|पश्चिमी क्षत्रप दामसेन का मुद्राभरण (२३२ ईस्वी / विक्रम संवत् २८९)। यहाँ मुद्रण-तिथि १५३ (१००–५०–३ ब्राह्मी लिपि-अंकों में) शक-युग की है, अतः २३२ ईस्वी (विक्रम संवत् २८९) में स्पष्टतः राजा के मस्तक के पीछे अंकित है। ब्राह्मी अंक (अङ्क) भारतीय उपमहाद्वीप में प्रमाणित एक संख्या पद्धति है, जिसका प्रारम्भ तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व (विक्रम संवत् ६२७) में हुआ। यह आधुनिक हिन्दू–अरबी संख्या-पद्धति का प्रत्यक्ष रूपात्मक पूर्वज है। तथापि, ब्राह्मी अंक-पद्धति की संकल्पना इन उत्तरवर्ती पद्धतियों से भिन्न थी, क्योंकि यह स्थान-मूलक नहीं थी, अपितु दशमान पद्धति थी जिसमें शून्य का समावेश नहीं था। बाद में इस पद्धति में दशकों (१०, २०, ३०, ४०) के लिये पृथक् चिह्न जोड़े गये। इसी प्रकार १०० तथा १००० के लिए भी चिह्न बने, जिन्हें इकाइयों के साथ संयोगित कर २००, ३००, २०००, ३००० आदि सूचित किया जाता था। कम्प्यूटर में इन संयोगों को ब्राह्मी संख्या संयोजक (Brahmi Number Joiner) U+1107F द्वारा लिखा जाता है। उत्पत्ति बाएँ|अंगूठाकार|350x350पिक्सेल|ब्राह्मी अंक-चिह्न, द्वितीय शताब्दी ईस्वी (विक्रम संवत् १५७–२५७)। प्रथम तीन अंकों का स्रोत स्पष्ट प्रतीत होता है : वे १, २, ३ रेखाओं के समूह हैं। अशोककाल (३री शताब्दी ईसा पूर्व / विक्रम संवत् −६२७) में ये ऊर्ध्वरेखीय I, II, III रूप में थे, जैसे रोमन अंक, किन्तु शीघ्र ही ये क्षैतिज रूप में परिवर्तित हुए, जैसे हान-चीन के अंक। प्राचीनतम अभिलेखों में ४ का रूप + जैसा था, जो पड़ोसी खरोष्ठी के X की स्मृति कराता है, सम्भवतः यह ४ रेखाओं अथवा ४ दिशाओं का प्रतीक था। अन्य इकाई-अंक प्राचीनतम अभिलेखों में भी मनमाने चिह्न प्रतीत होते हैं। कभी-कभी यह अनुमान किया जाता है कि ये भी रेखाओं के समूह से उत्पन्न हुए होंगे, जो त्वरित लेखन में संयुक्त होकर ऐसे रूप में आये हों, जैसा मिस्र के हायरेटिक तथा डेमोटिक अंकों के विकास में देखा गया है। किन्तु इसका प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसी प्रकार दशकों के चिह्न भी एक-दूसरे अथवा इकाइयों से स्पष्ट सम्बन्धित नहीं हैं, यद्यपि १०, २०, ८०, ९० सम्भवतः वृत्त पर आधारित रहे हों। उनकी मिस्री हायरेटिक तथा डेमोटिक अंकों से कभी-कभी चमत्कृत करने वाली रूपात्मक समानता, यद्यपि संकेतक है, किन्तु ऐतिहासिक सम्बन्ध का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। अनेक संस्कृतियों ने स्वतन्त्र रूप से रेखाओं के समूह द्वारा संख्याएँ अंकित की हैं। समान लेखन-उपकरण से ऐसे समूहों के त्वरित रूप भी व्यापक रूप से समान हो सकते हैं। यही ब्राह्मी अंकों की उत्पत्ति के प्रमुख अनुमानों में से एक है। एक अन्य सम्भावना यह है कि ये अंक अग्राक्षरीय (आक्रोफ़ोनिक) रहे हों, जैसे एटिक अंक, और खरोष्ठी वर्णमाला पर आधारित हों। उदाहरणतः ४ "चतुर्" का प्रारम्भिक रूप खरोष्ठी अक्षर 𐨖 "च" से मिलता-जुलता था; ५ "पञ्च/पंच" खरोष्ठी 𐨤 "प" से; इसी प्रकार ६ "षट्" और 𐨮, फिर ७ "सप्त" और 𐨯, तथा अन्ततः ९ "नव" और 𐨣। तथापि, समय-सम्बन्धी समस्याएँ तथा अभिलेखों का अभाव इस मत को दुर्बल करते हैं। सम्पूर्ण अंक-समूह का प्रमाण प्रथम–द्वितीय शताब्दी ईस्वी (१री–२री शताब्दी ईस्वी / विक्रम संवत् लगभग ५७–१५७) तक नहीं मिलता, जो अशोक के पश्चात् लगभग ४०० वर्ष बाद है। यह कथन कि अंक गिनती से उत्पन्न हुए या वर्णमाला से, अधिकतम विद्वत् अनुमान ही है। अंक प्राचीन अशून्य संख्या पद्धति पद्धति१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० २० ३० ४० ५० ६० ७० ८० ९० १०० १००० हिन्दू–अरबी अंक1234567891020304050607080901001000ब्राह्मी अंक𑁒𑁓𑁔𑁕𑁖𑁗𑁘𑁙𑁚𑁛𑁜𑁝𑁞𑁟𑁠𑁡𑁢𑁣𑁤𑁥 सम्बन्धित विषय ब्राह्मी लिपि सन्दर्भ जॉर्ज इफ़्राह, संख्याओं का सार्वभौम इतिहास: आदिकाल से संगणक के आविष्कार तक। अनुवादक: डेविड बेलोस, सोफ़ी वुड। प्रकाशक: जे॰ वाइली, २००० (विक्रम संवत् २०५७)। कार्ल मेनिन्गर (गणित), संख्या-शब्द तथा संख्या-चिह्न – संख्याओं का सांस्कृतिक इतिहास। ISBN ०-४८६-२७०९६-३। (0-486-27096-3, ) डेविड यूजीन स्मिथ तथा लुईस चार्ल्स कार्पिन्स्की, हिन्दू–अरबी अंक (१९११ ईस्वी / विक्रम संवत् १९६८)। श्रेणी:ब्राह्मी परिवार की लिपियाँ श्रेणी:संख्यांक