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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

शिवप्रसाद डबराल चारण

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शिवप्रसाद डबराल चरन 12 नवंबर 1912 गहली , पौड़ी गढ़वाल yes 1999 11 24 1912 11 12 इतिहासकार लेखक प्रोफेसर हिन्दी गढ़वाली भारत मीरुत कॉलेज (बीए)इलाहाबाद कॉलेज (एम॰ए॰) आगरा विश्वविद्यालय (पीएचडी ) शिवप्रसाद डबराल 'चारण' (12 नवंबर 1912 - 24 नवंबर 1999), उत्तराखंड के एक इतिहासकार, भूगोलवेत्ता, अकादमिक और लेखक थे। उन्हें 'उत्तराखंड का विश्वकोश' भी कहा जाता है। उन्होंने 1931 से लिखना प्रारम्भ किया। उन्होने 18 खंडों में उत्तराखंड का इतिहास, 2 काव्य संग्रह, 9 नाटकों और हिंदी और गढ़वाली भाषाओं में कई संपादित संस्करणों का लेखन किया हैं। उनका उत्तराखंड का इतिहास व्यापक रूप से विद्वानों द्वारा संदर्भ कार्य के रूप में उपयोग किया जाता है। उन्होंने उत्तराखंड के पुरातत्व और पारिस्थितिकी पर कई पुस्तकें लिखीं। इतना ही नहीं, चारण ने गढ़वाली भाषा की 22 दुर्लभ पुस्तकों को अपने स्वयं के प्रेस में पुनर्प्रकाशित करके विलुप्त होने से बचाया। उन्होंने मोला राम के दुर्लभ काव्य पांडुलिपि को भी फिर से खोजा। https://books.google.com/books?id=AfA_EAAAQBAJ&newbks=0&hl=en UKSSSC Patwari/Lekhpal Recruitment Exam 1100+ Solved Questions (8 Full-length Mock Tests + 6 Sectional Tests) Experts EduGorilla Prep 2022-08-03 EduGorilla Community Pvt. Ltd. 978-93-91464-78-3 en https://books.google.com/books?id=a4XXAAAAMAAJ&newbks=0&hl=en The Sacred Complex of Badrinath: A Study of Himalayan Pilgrimage Kumar Dinesh 1991 Kisohr [i.e. Kishor] Vidya Niketan en जीवनी स्रोत: https://books.google.com/books?id=HFIfEAAAQBAJ&newbks=0&hl=en Dastan-E-Himalaya -2 Pathak Shekhar 2021-02-22 Vani Prakashan 978-81-948736-5-5 hi https://www.kafaltree.com/shiv-prasad-dabral-charan-biography/ डॉ शिवप्रसाद डबराल : जिन्होंने अपनी जमीन बेचकर भी उत्तराखंड का इतिहास लिखा Lohani Girish 2019-06-26 Kafal Tree en-US 2022-09-17 https://wegarhwali.com/uttarakhand-ke-pramukh-sahitykaar/ उत्तराखंड के प्रमुख साहित्यकार Famous Writers of Uttarakhand in hindi WeGarhwali 2022-01-01 en-US 2022-09-17मार्च 2026 InternetArchiveBot प्रारंभिक जीवन और परिवार चारण का जन्म 12 नवंबर 1912 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के गहली गांव में हुआ। उनके पिता कृष्णदत्त डबराल के प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक थे। उनकी माता का नाम भानुमति था। 1935 में उन्होंने विश्वेश्वरी देवी से विवाह किया। शिक्षा और करियर चारण ने अपनी प्राथमिक शिक्षा मंडई और गडसीर के प्राथमिक विद्यालयों से प्राप्त की और आगे वर्नाक्युलर एंग्लो मिडिल स्कूल सिलोगी (गुमखाल) से माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने मेरठ से बीए ( बैचलर ऑफ आर्ट्स ) और इलाहाबाद से बीएड ( बैचलर ऑफ एजुकेशन ) की डिग्रियाँ प्राप्त की। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से एमए भूगोल किया। 1962 में, उन्होंने भूगोल में ही डॉक्टरेट ( पीएचडी ) पूरा किया। चारण ने 1948 से लेकर 1975 में अपनी सेवानिवृत्ति तक दुगड्डा में डीएबी कॉलेज के प्रधानाचार्य के रूप में कार्य किया। कार्य और अनुसंधान चारण की पीएचडी थीसिस 'अलकनंदा-बेसिन ए स्टडी ऑफ ट्रांसह्यूमन्स, नोमैडिज्म एंड सीजनल माइग्रेशन' को बाद में तीन पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया गया। उत्तराखंड के भोटियों और चरवाहों की जीवन शैली ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने उनके इतिहास में शोध शुरू किया। 1956 से, उन्होंने मलारी गाँव में भोटियों पर अपना शोध शुरू किया, जो बाद में उन्हें मलारी की प्राचीन समाधियों तक ले गया जिसके पुरातत्व का भी उन्होने शोध किया। समाधियों पर उनके निष्कर्षों को कर्मभूमि में लेख के रूप में प्रकाशित किया गया था, जिसने समय के साथ एएसआई को साइट पर उचित शोध करने के लिए प्रेरित किया। 1960 के बाद से चारण ने पांडुवाला, कोटद्वार, मोरध्वज, पारसनाथ किला और वीरभद्र के पुरातात्विक अवशेषों का अध्ययन किया और विभिन्न अभिलेखागारों में बिखरी सामग्री एकत्र की। इसके साथ ही उन्होंने उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों, मंदिरों और मूर्तिकला वास्तुकला का अध्ययन किया और शिलालेखों और सिक्कों की भी खोज की। उन्होंने अपना खुद का प्रेस भी खोला और वीरगाथा प्रकाशन के नाम से किताबें प्रकाशित कीं। कालांतर में उन्होंने अपने घर दुगड्डा (सरुदा) में " उत्तराखंड विद्या भवन " नामक पुस्तकालय और संग्रहालय खोलकर लगभग 3000 पुस्तकें, दुर्लभ पांडुलिपियां, सिक्के और पुरातात्विक महत्व के बर्तन एकत्रित किए। उन्होंने मुख्य रूप से वर्ष 1963-64 में उत्तराखंड के चरवाहों के प्रवासी मार्गों पर अपने शोध कार्य को तीन पुस्तकों अलकनंदा उपाटक, उत्तराखंड के भौतांतिक और उत्तराखंड के पशुचारक के रूप में प्रकाशित किया। तत्पश्चात, उन्होंने अपनी ऊर्जा उत्तराखंड के इतिहास को तैयार करने पर केंद्रित की और इस प्रकार, वर्ष 1965 में, उत्तराखंड का इतिहास भाग -1 (साक्ष्य संकलन) प्रकाशित हुआ। 1968 में, उत्तराखंड के इतिहास का दूसरा भाग प्रकाशित हुआ, जिसमें शुरुआत से लेकर पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक की अवधि शामिल थी। अगले वर्ष तीसरा भाग प्रकाशित हुआ, जिसने कलचुरियों के अंत तक के इतिहास को प्रस्तुत किया। भाग IV 1971 में प्रकाशित हुआ था, जो गढ़वाल के तेरहवीं शताब्दी से लेकर गोरखा आक्रमण तक के इतिहास को समेटने का एक प्रयास था। 1972 में गढ़वाल का इतिहास प्रकाशित हुआ, जिसमें पूर्व के चार भागों के प्रकाशन के बाद मिली नई सामग्री और साक्ष्यों का संकलन किया गया। भाग 5 1973 में प्रकाशित हुआ था, जिसमें उत्तराखंड और हिमाचल में गोरखा शासन का विस्तृत अध्ययन किया गया था। इसीप्रकार, भाग 7 (1976 और 1978) के दो खंड प्रकाशित हुए। दोनों खंड गढ़वाल में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन पर केंद्रित थे। भाग 9 1979 में गढ़वाल का पद्यमय इतिहास के रूप में प्रकाशित हुआ था। https://books.google.com/books?id=MUsFAQAAIAAJ&newbks=0&hl=en The Himalayan Journal 1994 Oxford University Press en कुछ वर्षों के लिए प्रकाशन बंद कर दिया गया, लेकिन चारण ने अपना शोध व लेखन कार्य जारी रखा। इस दौरान वीरगाथा प्रेस भी बंद हो गई थी। भाग 10 कुमाऊं का इतिहास (1000 से 1790 तक), 1978 में प्रकाशित हुआ, जो बाद के कलचुरियों और चौहान वंश का विस्तृत अध्ययन था। उसी वर्ष गढ़वाल का नवीन इतिहास भाग 11 के रूप में प्रकाशित हुआ, जिसमें कलचुरी से लेकर चौहान शासन तक की नई सामग्री प्रस्तुत की गई। भाग 12 पंवार वंश पर आधारित था। भाग 13 में, उत्तराखंड के इतिहास के लिए उत्तराचल के अभिलेखा एवम मुद्रा (उत्तराखंड के अभिलेख और मुद्रा) स्रोतों की जांच 1990 में की गई थी। उत्तरांचल-हिमाचल का प्राचीन इतिहास (उत्तरांचल-हिमाचल का प्राचीन इतिहास) 1992-95 में 3 खंडों में प्रकाशित हुआ था। 1998 में, प्रगतिहासिक उत्तराखंड (प्रागैतिहासिक उत्तराखंड) प्रकाशित हुआ था। 1999 में, काव्य रचनाएँ - शाक्तमत की गाथा और मातृदेवी प्रकाशित हुईं। चारण ने गढ़वाल के इतिहास, कविता, नाटक और लोक साहित्य से संबंधित बीस से अधिक दुर्लभ ग्रंथों का पुनर्प्रकाशन किया। प्रत्येक ग्रंथ में उन्होंने अर्थपूर्ण भाष्य जोड़े। इनमें मोला राम की कृतियाँ महत्वपूर्ण हैं। मौलाराम ग्रंथावली 1977 में डोगड्डा से प्रकाशित और छपी थी। कृतियाँ उत्तराखंड यात्रा दर्शन उत्तराखंड का इतिहास -12 खंडों में उत्तरांचल के अभिलेख एवम मुद्रा अलकनंदा-बेसिन ट्रांसह्यूमन्स, घुमंतू और मौसमी प्रवास का एक अध्ययन (3 पुस्तकें) गुहादित्य गोरा बादल महाराणा संग्राम सिंह पन्नाधाय सदेई सतीरामा राष्ट्र रक्षा काव्य गढ़वाली मेघदूत हुतात्मा परिचय अतीत स्मृति संषर्ष संगीत अलकनंदा उप्टक उत्तराखंड के भौटांतिक उत्तराखंड के पशुचारक संदर्भ श्रेणी:Pages with unreviewed translations श्रेणी:भारतीय इतिहासकार श्रेणी:हिन्दी भाषा के लेखक श्रेणी:१९९९ में निधन श्रेणी:1912 में जन्मे लोग