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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

हिन्दू मेला

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हिन्दु मेला एक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था थी जिसकी स्थापना १८६७ में गणेन्द्रनाथ ठाकुर ने द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर, राजनारायण बसु और नवगोपाल मित्र के साथ मिलकर की थी। इसे 'चैत्र मेला' भी कहते थे क्योंकि इसकी स्थापना चैत्र संक्रान्ति (बंगाली वर्ष का अन्तिम दिन) के दिन हुई थी। इसे 'जातीय मेला' और 'स्वदेशी मेला' भी कहते थे। गणेन्द्रनाथ ठाकुर इसके संस्थापक सचिव थे। हिन्दु मेला ने बंगाल के पढे लिखे वर्ग में देश के लिये सोचने, उसके प्रति देशवासियों को तैयार करने की कोशिश की। वस्तुतः वर्ष १८६७ ई के १२ अप्रैल को नवगोपाल मित्र ने 'चैत्रमेला' नाम से एक राष्ट्रीय मेले के आयोजन की सूचना प्रकाशित की। बाद में इसी का नाम 'हिन्दुमेला' हो गया। सत्येन्द्रनथ ठाकुर इस मेले के साथ बहुत गहराई से जुड़े हुए थे। वे पहले वर्ष इसमें उपस्थित नहीं थे क्योंकि उस समय वे पश्चिमी भारत में थे। दूसरे वर्ष वे मेले में उपस्थित थे। उन्होंने "मिले सबे भारत सन्तान, एकतान गाहो गान" (भारत की सन्तान एक होकर एक स्वर में गाओ) की रचना की जिसे भारत का पहला राष्ट्रगान माना गया। इस मेले के संरक्षकों में उल्लेखनीय हैं राजा कमलकृष्ण रामनाथ ठाकुर, काशीश्वर मित्र, दुर्गाचरण लाहा, प्यारीचरण सरकार, गिरीश चन्द्र घोष, कृष्णदास पाल, राजनारायण बसु, द्बिजेन्द्रनाथ ठाकुर, पण्डित जयनारायण तर्कपञ्चानन, पण्डित भारतचन्द्र शिरोमणि और पण्डित तारानाथ तर्कवाचस्पति। इस मेले में विभिन्न क्षेत्रों के लोग शामिल होते थे। यह किसी धार्मिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं बनी थी। यह देशभक्ति का विकास और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने का कार्य करती थी। इसका उद्देश्य भारत की सभ्यता की कीर्ति को पुनर्जीवित करना, देशवासियों को जागृत करना, राष्ट्रभाषा का विकास करना, उनके विचारों को उन्नत बनाना था ताकि अंग्रेजों द्वारा किये जा रहे सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण का प्रतिकार किया जा सके। यह मेला प्रतिवर्ष चैत्र संक्रान्ति को आयोजित किया जाता था। इसमें देशभक्ति के गीत, कविताएँ और व्याख्यान होते थे। इसमें भारत के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक दशा की विस्तृत समीक्षा की जाती थी। स्वदेशी कला, स्वदेशी हस्तशिल्प, स्वदेशी व्यायाम और पहलवानी की प्रदर्शनी लगती थी। इसमें अखिल भारतीयता का भी ध्यान रखा जाता था तथा बनारस, जयपुर, लखनऊ, पटना और कश्मीर आदि की कलात्मक वस्तुएं, हस्तशिल्प आदि का प्रदर्शन न्ही किया जाता था। 'लज्जय भारत-यश गाइबो की कोरे , लुटितेछे परे एइ रत्नेर आकरे।।…() नामक गाना इसमें कई बार गाया गया। इसके रचयिता गणेन्द्रनाथ ठाकुर थे। इस कविता से उनको बहुत ख्याति मिली। यह गान हिन्दू मेले में प्रायः गाया जाता था। १८९० के दशक में इस संस्था का प्रभाव कम हो गया किन्तु इसने स्वदेशी आन्दोलन के लिए जमीन तैयार कर दी थी। == सन्दर्भ == == इन्हें भी देखें == स्वदेशी आन्दोलन नवगोपाल मित्र == बाहरी कड़ियाँ == Hindu Mela