Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

मोरोपंत तांबे

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

मोरोपंत तांबे (1803 -1858) तांबे पहले के भट्ट थे। इनका मूल निवास महाराष्ट्र के रत्नागिरी के गुढे गाव था। कुछ समय बाद यह रत्नागिरी के कोलधे, सातारा के धावडशी और पुणे तथा, पारोला स्थायी हुए। कृष्णराव तांबे का जन्म 1719 में हुआ था। इनके पिता का नाम था विष्णूराव तांबे। कृष्णाजी विख्यात धर्मसाधक ब्रम्हेंद्र स्वामी के भक्त थे। कृष्णाजी विद्या, बुध्दी एवं चरित्र के विविध गुणों के कारण वे स्वामी के प्रीय शिष्य थे। प्रथम बाजीराव पेशवा की व्यक्तीगत इच्छा से प्रेरित होकर कृष्णाजी ने शस्र विद्या सिख ली थी। 1738 में मोहम्मद बंगश खान से बुंदेलखंड को बचाने के लिए बाजीराव और मराठी सेना के साथ कृष्णाजी भी गये। बुंदेलखंड के राज्य हमीरपुर और बांदा के सुभेदारी उन्हे प्राप्त हुई थी। उसके बाद पुना से उनको बुलावा आया। 1759-60 में वह मराठी सेना में वह एक उच्चपदस्थ अधिकारी थे। 1761 में पानीपत के तीसरे युध्द में उन्हे शिविर के उत्तरी दरवाजे के सेनापती बनाया गया था। पानीपत युध्द जो मराठा वीर सैनिक बचकर वापस आये उनमे से ही एक कृष्णाजी भी थे। कृष्णाजी के पुत्र बलवंतराव का जन्म 1738 में हुआ। वे भी उमरखेड में थे। बलवंतराव ने पिता के सानिध्य में युध्द विद्या सिख ली थी। वे अंतीम पेशवा बाजीराव द्वितीय के छोटे भाई चिमाजी अप्पा के विशेष अनुगत थे। 1815 में वह चिमाजी अप्पा के साथ वाराणसी के काशी में चले गये थे। चिमाजी अप्पा पेशवा के घर के बाजू में ही अस्सी घाट के समीप उन्होंने अपना घर बनवाया था। बलवंतराव तांबे को दो पुत्र थे। एक मोरोपंत तांबे दुसरा सदाशिव तांबे। 1811 में उमराहट में मोरोपंत का जन्म हुआ था। बलवंतराव के मरनोपरांत मोरोपंत ही चिमाजी अप्पा के यहां कामकाज देखते थे। कृष्णा नदी के दोआब में स्थित कडा शहर का सप्रे परिवार अत्यंत विख्यात था। इसी परीवार की कन्या के साथ 1826 में दाक्षिणात्य रीती से मोरोपंत तांबे का विवाह हुआ। मराठी ब्राह्मण परंपरा के अनुसार कन्या का नाम विवाह पश्चात बदल कर भागिरथीबाई रखा गया। 1832 में काशी स्थित पेशवा चिमाजी अप्पा की मृत्यु हुई थी। तो वहीं कुछ समय पश्चात मोरोपंत और भागिरथीबाई के अस्सी घाट के घर में 19 नवम्बर 1835 को एक कन्या का जन्म हुआ। जिसका नाम रखा गया मनिकर्णिका। प्यार से उसे मनू कहते थे। 1839 में मनू की चार वर्ष की आयु में उसकी माता भागिरथीबाई का स्वर्गवास हुआ। कुछ समय तक मनू को बलवंतराव की विधवा तथा मोरोपंत की मां ने संभाला। उसी समय बिठूर में स्थित बाजीराव पेशवा द्वितीय ने मोरोपंत को अपने पास बुलाया। मोरोपंत अपनी पुत्री के साथ तथा अपने आत्मीय केशव भास्कर तांबे के साथ काशी से कानपूर के बिठूर चले गये। मनू का बचपन बिठूर में ही बीता था। 1839 में काशी की मनूबाई बिठूर का भाग्य बन गयी। बिठूर घाट के निकट ही मोरोपंत और केशव भास्कर ने अपना घर बनाया। वृध्द बाजीराव मातृहीन मनू से स्नेह किया करते थे। वे उसे छबिली करके बुलाते थे। बाजीराव के दत्तक पुत्र नानासाहेब धोंडोपंत मनू से 18 वर्ष बडे थे। नानासाहेब, पांडूरंग रावसाहेब और बालासाहेब के साथ वे घोडसवारी, तलवारबाजी तथा अन्य खेल खेलती थी। 1841 के अंत में तात्या दिक्षित झांसी नरेश के विवाह के लिए कन्या की तलाश में झांसी से कानपूर आये। वैशाख पूर्णिमा सवंत 1899 अर्थात सन् 1842 में सात वर्ष की मनिकर्णिका का विवाह झांसी के 29-30 वर्षीय राजा श्रीमंत महाराज गंगाधर राव नेवालकर से हुआ। और वह झांसी की रानी महारानी लक्ष्मीबाई बनी। इस समय मोरोपंत अत्यंत अकेले थे। इसलिए झांसी के राजा रानी के कारण गुरसराँय के निवासी शिवराम खानवलकर की पुत्री चिमनाबाई से मोरोपंत का दुसरा विवाह हुआ। और वे झांसी में रहने लगे। यमुनाबाई से मोरोपंत को गोपिकाबाई खेर नामक कन्या  और चिंतामणी नामक पुत्र हुआ था। 1857-58 के स्वतंत्रता संग्राम में मोरोपंत तांबे ने अपनी पुत्री रानी लक्ष्मीबाई के साथ अहम भूमिका निभाई थी। अप्रैल 1858 को दतिया के राजा ने धोके से उन्हे बंदी बनाकर अंग्रेजों को सौंप दिया था। 19 अप्रैल 1858 को हॅमिल्टन और ह्यु रोज ने झांसी राजमहल के सामने झोकनबाग में दोपहर दो बजे मोरोपंत को फांसी दे दी थी।