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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

पंडित चमूपति

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पण्डित चमूपति (१५ फरवरी १८९३ - १५ जून १९३७) आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान्, प्रचारक, कवि थे। आप हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, अरबी व फारसी आदि अनेक भाषाओं के विद्वान थे और अच्छे कवि एवं लेखक भी थे। आप ने कई भाषाओं में अनेक प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की है। आप ने गुरुकुल में अध्यापन भी किया और आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के उपदेशक व प्रचारक भी रहे। आचार्य पं॰ चमूपति महर्षि दयानन्द के मिशन को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख महापुरुषों में से एक महापुरुष थे। वह अतीव प्रतिभासम्पन्न मनीषी, त्यागी, तपस्वी, विद्वान् तथा वैदिक धर्म व संस्कृति के लिये समर्पित असाधारण मनुष्य थे। ईसाई मत, इस्लाम तथा आर्य सिद्धान्तों का उन्हें गम्भीर ज्ञान था। जीवनी पण्डित चमूपति का जन्म १५ फरवरी १८९३ को बहावलपुर के खैरपुर रामेवाला में हुवा था। बहावलपुर अब पाकिस्तान में है। उन का मूल नाम चम्पत राय था। इन के पिता का नाम बसन्दाराम मेहता था और माता का नाम उत्तमी देवी था। आप ने मैट्रिक तक की शिक्षा जन्म ग्राम खैरपुर में उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओं में प्राप्त की। आप ने बहावलपुर के इजर्टन कालेज से उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी में बी॰ए॰ किया। बी॰ए॰ तक आप देवनागरी अक्षरों से अनभिज्ञ थे। आर्यसमाज से प्रभावित होकर आप ने संस्कृत में एम॰ए॰ करने का संकल्प लिया और परीक्षा में सफलता प्राप्त कर प्रशंसनीय उदाहरण प्रस्तुत किया। विद्यार्थी जीवन में आप सिख मत की ओर आकर्षित हुवे थे। आप ने सिख मत की पुस्तक "जपुजी" का उर्दू में काव्यानुवाद किया। इस पुस्तक से निकटवर्ती क्षेत्रों में आप को प्रसिद्धि प्राप्त हुवी। जन्म से दार्शनिक प्रवृत्ति के कारण पौराणिक विचारधारा से आप की संस्तुष्टि नहीं हुवी, जिस का परिणाम यह हुवा कि आप नास्तिक बन गये। इस के पश्चात् आप ने स्वामी विवेकानन्द के साहित्य का अध्ययन किया और कुछ समय पश्चात स्वामी दयानन्द के साहित्य का पारायण किया। इस साहित्यिक ऊहापोह से आप पुनः आस्तिक बन गए। अब आप प्राणपण से आर्यसमाज के कार्यों में रुचि लेने लगे। सन् १९१९ में आप ने स्वामी दयानन्द के पद्यमय उर्दू जीवन चरित्र ‘‘दयानन्द आनन्द सागर” का लेखन व प्रकाशन किया। इस ग्रन्थ में आप ने स्वामी दयानन्द जी के लिये "सरवरे मखलूकात" अर्थात् 'मानव शिरोमणि' विशेषण का प्रयोग किया है।“वैदिक धर्म एवं संस्कृति के लिये समर्पित विद्वान पं. चमूपति जी” गुरुकुल से उन का सम्बन्ध बहुत पुराना था। वे मुल्तान के गुरुकुल के मुख्य अधिष्ठाता बने थे और उस गुरुकुल का संचालन करने में उन्हें बड़ी सफलता मिली थी। आचार्य रामदेव उन के गुणों पर मुग्ध होकर उन्हें लाहौर ले आये थे और ‘दयानन‍द सेवासदन’ का आजीवन सदस्य बनने के लिये तैयार किया था। अनेक वर्षों तक पण्डित जी ने लाहौर में रहकर ‘आर्य’ का सम्पादन किया। वक्ता और लेखक के रूप में आर्यसमाज में उन की ख्याति हुवी। दयानन‍द सेवासदन के समाजोत्थान के कार्यों को करते हुए आप ने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी पत्र ‘‘वैदिक मैगजीन” एवं हिन्दी पत्र ‘‘आर्य” के सम्पादन का कार्य भी किया। आप की विद्वता एवं निष्ठा के प्रभाव से इन पत्रों ने अपूर्व सफलता प्राप्त की और अविभाजित पंजाब सहित देशभर में दोनों पत्र लोकप्रिय हुवे। सन् १९२६ से आरम्भ कर आठ वर्षों तक आप ने गुरुकुल कांगड़ी में उपाध्याय, अधिष्ठाता एवं आचार्य आदि पदों को सुशोभित किया।http://www.thearyasamaj.org/acharyapanditchamupati_en Acharya Pandit Chamupati 2 अप्रैल 2020 https://web.archive.org/web/20190924114832/http://www.thearyasamaj.org/acharyapanditchamupati_en 24 सितंबर 2019 dead आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की ओर से सन् १९२५ में आप वैदिक धर्म एवं संस्कृति के प्रचारार्थ अफ्रीका गये। इस यात्रा के समय पौराणिक विद्वान पं॰ माधवाचार्य ने आप को शास्त्रार्थ के लिये आमन्त्रित किया जिस में वह पंडित चमूपति को अपमानित कर सकें और अपने शिष्यों पर अपना प्रभाव जमा सकें। अनेक लोगों की उपस्थिति में शास्त्रार्थ आरम्भ हुवा। शास्त्रार्थ में प्रसंगवश पंडित चमूपति जी ने शालीनतापूर्वक कहा कि पं॰ माधवाचार्य की पत्नी को पुत्री मानने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं, अपितु प्रसन्नता है। निराली शैली में कहे गए इन शब्दों का लोगों पर इच्छा प्रभाव पड़ा। शास्त्रार्थ उन के इन्हीं शब्दों पर समाप्त हो गया। पं॰ माधवाचार्य की पं॰ चमूपति जी का अपमान करने की योजना विफल हो गयी। एक बार पं॰ चमूपति वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून आये थे। एक दिन जब उन्होंने तपोवन के निकट सरोवर में एक हिन्दू को मछलियां पकड़ते हुए देखा तो उन के मुख से निकला "देखो यह इस्लामी हिन्दू धर्म है"। अपने एक व्याख्यान में एक बार पंडित जी ने मुसलमानों की हज की रीति एवं व्यवहार का उल्लेख कर भावपूर्ण शब्दों में कहा, "हज करते समय कोई मोमिन सिर की जूं तक नहीं मार सकता, सिला हुवा वस्त्र भी नहीं पहन सकता। यह है वैदिक इस्लाम"। इस्लाम के इस अहिंसक रूप के पंडित चमूपति जी समर्थक थे। सत्यार्थप्रकाश की भूमिका में स्वामी दयानन्द ने लिखा है कि सत्य को मानना एवं मनवाना तथा असत्य को छोड़ना और छुड़वाना उन्हें अभीष्ट है। इसी को वह मनुष्य जीवन का लक्ष्य स्वीकार करते थे। पं0 चमूपति जी ने ऋषि दयानन्द जी के विचारों को सर्वात्मा अपनाया व उनका अपने उपदेशों व रचनाओं के द्वारा प्रचार किया। दिनांक १५ जून सन् १९३७ को ४४ वर्ष की आयु में लाहौर में आपका निधन हुवा। आर्यसमाज के वयोवृद्ध विद्वान प्रा॰ राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने आप की जीवनी लिखी है। जिज्ञासु जी ने पं॰ चमूपति जी के लेखों व लघु पुस्तकों का दो खण्डों में एक संग्रह सम्पादित किया था जो वर्षों पूर्व हिण्डोन सिटी से आर्य साहित्य के यशस्वी प्रकाशक श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने ‘‘विचार वाटिका” के नाम से प्रकाशित किया था। अब यह ग्रन्थ अनुपलब्ध है। प्रा. जिज्ञासु जी ने पं. चमूपति जी की उर्दू पुस्तक ‘‘दयानन्द आनन्द सागर” का हिन्दी अनुवाद कर उसे भी प्रकाशित कराया है। इस पुस्तक के कारण ही चमूपति जी को मुस्लिम रियासत बहावलपुर से अपने निवास गृह से निर्वासित किया गया था। कितना बड़ा त्याग उन्होंने किया था इस का शायद हम अनुमान नहीं कर सकते। पं0 चमूपति जी की अनेक उर्दू पुस्तकों के अनुवाद भी सुलभ हैं। कृतियाँ पं0 चमूपति संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, अरबी आदि भाषाओं के उच्चकोटि के विद्वान, लेखक, कवि एवं वक्ता थे। उन्होने अपने जीवन में देश, धर्म एवं संस्कृति के लिये जो कार्य किये और इन पर हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू में जो उच्च कोटि की रचनायें दी हैं। हिन्दी : सोम सरोवर, जीवन ज्योति, योगेश्वर कृष्ण, वृक्षों में आत्मा, हमारे स्वामी, रंगीला रसूल उर्दू: दयानन्द आनन्द सागर, मरसिया ए गोखले, जवाहिरे जावेद, चौदहवीं का चांद, मजहब का मकसद आदि अंग्रेजी : महात्मा गांधी ऐण्ड आर्यसमाज, यजुर्वेद (अनुवाद), गिलिम्पसेस आफ दयानन्द सोम-सरोवर बहुत उच्च कोटि की रचना है। उन्होंने इस पुस्तक में सामवेद के मन्त्रों की भावपूर्ण व्याख्या की है। गद्य में होने पर भी इस पुस्तक को पढ़कर पद्य का सा आनन्द आता है। एक बार श्री वीरेन्द्र जी, सम्पादक, आर्यमर्यादा, जालन्धर ने सम्पादकीय में लिखा था कि इस पुस्तक पर उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया जा सकता था परन्तु पुरस्कार देने में पक्षपात के कारण वह इस पुस्तक पर पुरस्कार प्राप्त नहीं कर सके। दयानन्द की प्रशंसा और गुणगान पं. चमूपति जी की ऋषि दयानन्द के बारे में कहते हैं- आज केवल भारत ही नहीं, सारे धार्मिक सामाजिक, राजनैतिक संसार पर दयानन्द का सिक्का है। मतों के प्रचारकों ने अपने मन्तव्य बदल लिए हैं, धर्म पुस्तकों के अर्थों का संशोधन किया है, महापुरुषों की जीवनियों में परिवर्तन किया है। स्वामी जी का जीवन इन जीवनियों में बोलता है। ऋषि मरा नहीं करते, अपने भावों के रूप में जीते हैं। दलितोद्धार का प्राण कौन है? पतित पावन दयानन्द। समाज सुधार की जान कौन है? आदर्श सुधारक दयानन्द। शिक्षा के प्रचार की प्रेरणा कहां से आती है? गुरुवर दयानन्द के आचरण से। वेद का जय जयकार कौन पुकारता है? ब्रह्मार्षि दयानन्द। माता आदि देवियों के सत्कार का मार्ग कौन सिखाता है? देवी पूजक दयानन्द। गोरक्षा के विषय में प्राणिमात्र पर करूणा दिखाने का बीड़ा कौन उठाता है? करुणानिधि दयानन्द। आओ ! हम अपने आप को ऋषि दयानन्द के रंग में रंगें। हमारा विचार ऋषि का विचार हो, हमारा आचार ऋषि का आचार हो, हमारा प्रचार ऋषि का प्रचार हो। हमारी प्रत्येक चेष्टा ऋषि की चेष्टा हो। नाड़ी नाड़ी से ध्वनि उठे – महर्षि दयानन्द की जय। पापों और पाखण्डों से ऋषि राज छुड़ाया था तूने। भयभीत निराश्रित जाति को, निर्भीक बनाया था तूने॥ बलिदान तेरा था अद्वितीय हो गई दिशाएं गुंजित थी। जन जन को देगा प्रकाश वह दीप जलाया था तूने॥ उनके विचार कितने सधे हुए हैं, देखिए- जो माने नहीं मनाये से, उसको कर जोर मनाना क्याजो जान बूझकर बधिर हुआ, उसको हित अहित सुनाना क्या उस बिन छवि छैल छबीले की छवि देख आँख झपकाना क्याबिन कहे अनाहत नाद हुआ, कर आहत जीभ थकाना क्या जब घर से बाहर निकल पड़े तब बस्ती क्या वीराना क्यामन ही अपना न रहा तब तो जन अपना क्या बेगाना क्या कहती हो बुरा कहे दुनिया इस कुलटा को पतियाना क्याजब प्रेम गली में पाँव धरा फिर अपयश से घबराना क्या मत चेत हृदय हो मस्ताना, चेता तो फिर मस्ताना क्यारह अपनी धुन में मस्त, न सुन है कहता तुझे ज़माना क्या... दयानन्द-आनन्द-सागर के पद्य देखिए- वोह आया ज़मीं पर ऋषि वेद वाला। दयानन्द स्वामी ! तिरा बोल बाला॥ किया जिसने शिवरात्रि में उजाला। दयानन्द स्वामी ! तिरा बोल बाला॥ ज़माने की आँखों में घर करने वाला। दयानन्द स्वामी ! तिरा बोल बाला॥ किया जिसने संन्यास का रुतबा आला। दयानन्द स्वामी ! तिरा बोल बाला॥ हुआ पस्त चरणों में तेरे हिमाला। दयानन्द स्वामी ! तिरा बोल बाला॥ किताबों का सच्च झूठ जिसने कंगाला। दयानन्द स्वामी ! तिरा बोल बाला॥ गुरु का वचन जिसने जी जाँ से पाला। दयानन्द स्वामी ! तिरा बोल बाला॥ ऋषि ऋण का जिसने फ़ना मूल डाला। दयानन्द स्वामी ! तिरा बोल बाला॥ सन्दर्भ इन्हें भी देखें रंगीला रसूल बाहरी कड़ियाँ चौदहवीं का चाँद (पंडित चमूपति एम॰ए०) आर्यसमाज के गगन मण्डल में चमकते नक्षत्र पं. चमूपतिमई 2026 InternetArchiveBot श्रेणी:आर्य समाज