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काव्य प्रयोजन
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प्रयोजन का अर्थ है उद्देश्य। संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य की रचना के उद्देश्यों पर भी गंभीर विचार विमर्श हुआ है। भरत से लेकर विश्वनाथ तक ने काव्य का प्रयोजन पुरूषार्थ चतुष्ठ्य की प्राप्ति माना है। पुरुषार्थ चतुष्ठ्य से अभिप्राय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति से है। आचार्य मम्मट ने अपने पुर्ववर्ती समस्त विचारों का सार प्रस्तुत करते हुए काव्य रचना के छः प्रयोजन गिनाए हैं। -
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेत रक्षतये।
सद्यः परिनिर्वृते कांतः सम्मिततयोपदेशयूजे।। (काव्य प्रकाश)
अर्थात् काव्य यश की प्राप्ति संपत्ति लाभ सामाजिक व्यवहार की शिक्षारोगादि विपत्ति का नाश तुरंत ही उच्च कोटी के आनंद का अनुभव और प्यारी स्त्री के समान मनभावन उपदेश देने के लिये उपादेय है।
१) यशप्राप्ति :- यश एक प्रधान प्रेरक शक्ति है। यश की प्राप्ति मनुष्य मात्र की सहज आकांक्षा है। मनुष्य की यह मूल प्रवृत्ति है। प्राय: कवि गन यश प्राप्ति के उद्देश्य से ही काव्य रचना करते है। जिनका उद्देश्य प्रारंभ में यश की प्राप्ति चाहे न भी हो परन्तु काव्य रचना के पश्चात वे अपनी रचना की प्रशंसा अवश्य ही चाहते है।
भामह ने काव्य- प्रयोजन के विषय में लिखा है- "धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचैक्षण्यं कलासु च। करोति कीर्ति प्रीति च साधुकाव्य निबंधम्।"
इस प्रकार भामह ने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, कलाओं में निपुणता, प्रीति और यश की प्राप्ति-ये सात प्रयोजन निश्चित किये हैं, जिनमें से लगभग सभी भरत के प्रयोजनों से मेल खाते हैं।Hindi alochana ki paribhashik shabdavali Rajkamal Prakashan 978-81-267-2207-5 126
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
काव्य-हेतु
श्रेणी:संस्कृत काव्यशास्त्र