Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

विश्व शान्ति और अहिंसा

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

विश्व शांति सभी देशों और/या लोगों के बीच और उनके भीतर स्वतंत्रता, शांति और खुशी का एक आदर्श है। विश्व शांति पूरी पृथ्वी में अहिंसा स्थापित करने का एक विचार है, जिसके तहत देश या तो स्वेच्छा से या शासन की एक प्रणाली के जरिये इच्छा से सहयोग करते हैं, ताकि युद्ध को रोका जा सके. हालांकि कभी-कभी इस शब्द का प्रयोग विश्व शांति के लिए सभी व्यक्तियों के बीच सभी तरह की दुश्मनी के खात्मे के सन्दर्भ में किया जाता है। संभावना जबकि विश्व शांति सैद्धांतिक रूप से संभव है, कुछ का मानना है कि मानव प्रकृति स्वाभाविक तौर पर इसे रोकती है।[1] यह विश्वास इस विचार से उपजा है कि मनुष्य प्राकृतिक रूप से हिंसक है या कुछ परिस्थितियों में तर्कसंगत कारक हिंसक कार्य करने के लिए प्रेरित करेंगे.[2] तथापि दूसरों का मानना है कि युद्ध मानव प्रकृति का एक सहज हिस्सा नहीं हैं और यह मिथक वास्तव में लोगों को विश्व शांति के लिए प्रेरित होने से रोकता है। विश्व शांति के सिद्धांत विश्व शांति कैसे प्राप्त की जा सकती है, इसके लिए कई सिद्धांतों का प्रस्ताव किया गया है। इनमें से कई नीचे सूचीबद्ध हैं। विश्व शांति हासिल की जा सकती है, जब संसाधनों को लेकर संघर्ष नहीं हो. उदाहरण के लिए, तेल एक ऐसा ही संसाधन है और तेल की आपूर्ति को लेकर संघर्ष जाना पहचाना है। इसलिए, पुन: प्रयोज्य ईंधन स्रोत का उपयोग करने वाली प्रौद्योगिकी विकसित करना विश्व शांति हासिल करने का एक तरीका हो सकता है। लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत विवादास्पद डेमोक्रेटिक शांति सिद्धांत के समर्थकों का दावा है कि इस बात के मजबूत अनुभवजन्य साक्ष्य मौजूद हैं कि लोकतांत्रिक देश कभी नहीं या मुश्किल से ही एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध छेड़ते हैं।[6] (केवल अपवाद हैं कोड युद्ध, टर्बोट युद्ध और ऑपरेशन फोर्क). जैक लेवी (1988) बार-बार- जोर दे कर यह सिद्धांत बताते हैं कि "चाहे कुछ भी हो, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में हमें एक व्यवहारिक कानून की आवश्यकता है". औद्योगिक क्रांति के बाद से लोकतांत्रिक बनने वाले देशों में वृद्धि हो रही है। एक विश्व शांति इस प्रकार संभव है, अगर यह रुझान जारी रहे और अगर लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत सही हो. हालांकि इस सिद्धांत के कई संभव अपवाद है। पूंजीवादी शांति सिद्धांत अपनी "कैपिटलिज्म पीस थ्योरी" पुस्तक में आयन रैंड मानती है कि इतिहास के बड़े युद्ध उस समय के अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों द्वारा मुक्त (अर्थव्यवस्थाओं) के खिलाफ लड़े गये और उस पूंजीवाद ने मानव जाति को इतिहास में सबसे लंबे समय तक शांति प्रदान की और जिस अवधि में पूरी सभ्य दुनिया की भागीदारी में 1815 में नेपोलियन युद्ध के अंत से 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के छिड़ने तक युद्ध नहीं हुए. यह याद रखा जाना चाहिए कि उन्नीसवीं सदी की राजनीतिक प्रणालियां शुद्ध पूंजीवादी नहीं थीं, बल्कि मिश्रित अर्थव्यवस्थाओं वाली थीं। हालांकि पूंजीवाद के तत्व का प्रभुत्व था, पर यह पूंजीवाद की एक सदी के उतने ही करीब था, जितना मानव जाति के आने तक था। लेकिन पूरी उन्नीसवीं सदी के दौरान राज्यवाद के तत्व फलते-फूलते रहे और 1914 में पूरी दुनिया में इसके विस्फोट के समय तक शामिल सरकारों पर राज्यवाद की नीतियों का बोलबाला रहा.[7] हालांकि, इस सिद्धांत ने यूरोप के बाहर के देशों, साथ ही साथ एकीकरण के लिए जर्मनी और इटली में हुए युद्धों, फ्रांको-पर्सियन युद्ध और यूरोप के अन्य संघर्षों के खिलाफ पश्चिमी देशों द्वारा छेड़े गये क्रूर औपनिवेशिक युद्धों की अनदेखी की. यह युद्ध के अभाव को शांति के पैमाने के रूप में पेश करता है, जब वास्तविक रूप में वर्ग संघर्ष मौजूद रहा अहिंसा अहिंसा का सामान्य अर्थ है 'हिंसा न करना'। इसका व्यापक अर्थ है - किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन मे किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वार भी नुकसान न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी कि हिंसा न करना, यह अहिंसा है| हिन्दू धर्म में अहिंसा का बहुत महत्त्व है। अहिंसा परमो धर्म: (अहिंसा परम (सबसे बड़ा) धर्म कहा गया है। आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिये जो आन्दोलन चलाया वह काफी सीमा तक अहिंसात्मक था। मानव जाति के नियम मैं स्वप्नंष्टा नहीं हूं। मैं स्वयं को एक व्यावहारिक आदर्शवादी मानता हूं। अहिंसा का धर्म केवल ऋषियों और संतों के लिए नहीं है। यह सामान्य लोगों के लिए भी है। अहिंसा उसी प्रकार से मानवों का नियम है जिस प्रकार से हिंसा पशुओं का नियम है। पशु की आत्मा सुप्तावस्था में होती है और वह केवल शारीरिक शक्ति के नियम को ही जानता है। मानव की गरिमा एक उच्चतर नियम आत्मा के बल का नियम के पालन की अपेक्षा करती है।.. जिन ऋषियों ने हिंसा के बीच अहिंसा की खोज की, वे न्यूटन से अधिक प्रतिभाशाली थे। वे स्वयं वेलिंग्टन से भी बडे योद्धा थे। शस्त्रों के प्रयोग का ज्ञान होने पर भी उन्होंने उसकी व्यर्थता को पहचाना और श्रांत संसार को बताया कि उसकी मुक्ति हिंसा में नहीं अपितु अहिंसा में है। हरि ओम शास्त्री साधारण अर्थ में अहिंसा का तात्पर्य हिंसा न करने से लगाया जाता है, परंतु अहिंसा तो एक नकारात्मक शब्द हुआ। उसे विलोम शब्द भी कह सकते हैं। अहिंसा का वास्तविक अर्थ है निडर होना। मानव का निडर (अभय) होना उसका सबसे बड़ा गुण है। ऋग्वेद की एक सूक्ति में आता है: हे प्रभु! आप हमें अभय प्रदान करें। निडर व्यक्ति ही स्वतंत्र हो सकता है। जिसके पैरों में जंजीर बंधी हुई है, वह स्वतंत्र कैसे हो सकता है और जो स्वतंत्र नहीं है, वह निडर नहीं हो सकता। परतंत्र और भयभीत व्यक्ति अहिंसा का पालन नहीं कर सकता। अहिंसा वीर पुरुष की शोभा है। अहिंसा कायर पुरुष से दूर-दूर भागती है। विश्व के मजहबों में मत-मतांतर होने पर भी अहिंसा पर सभी एकमत हैं। इसलिए अहिंसा को बहुत ही विचार एवं विवेक से समझ लेने की आवश्यकता है। अहिंसा का सर्वप्रथम उद्घोष भगवान बुद्ध ने अपने उपदेशों में किया था। भगवान बुद्ध के उपदेशों का असर यह हुआ कि उस समय यज्ञों के दौरान जो पशु हिंसा होती थी, वह समाप्त हो गई। परंतु कालांतर में अहिंसा का ठीक प्रकार से अर्थ न समझ सकने के कारण परिणाम यह हुआ कि भारत पर अनेक आक्रमण हुए और यह गुलाम हो गया। भगवान बुद्ध के बाद दूसरे थे महावीर स्वामी, जिनका अहिंसा के मत पर बहुत प्रभाव रहा। जैन धर्म की परंपरा में तो शरीर पर कपड़े पहनना भी हिंसा माना जाता है, परंतु महावीर स्वामी के पश्चात भी अहिंसा का प्रभाव अपने सही रूप में लागू नहीं हो सका। जैन धर्म में यम के ये पांचों सूत्र आक्रांत हो गए हैं - अहिंसा, सत्य, अस्ते, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। इस कथन का अर्थ इस घटना से समझा जा सकता है। एक बार भगवान बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को उपदेश देते हुए कहा कि भिक्षा पात्र में जो कुछ प्राप्त हो जाए, वही ग्रहण कर लेना चाहिए। दैवयोग से एक दिन एक भिक्षु के पात्र में चील ने एक मांस का टुकड़ा डाल दिया। इस पर भिक्षु ने भगवान बुद्ध से पूछा, तो भगवान बुद्ध ने सामान्य भाव से कह दिया कि इसे ग्रहण कर लीजिए। परंतु इस का परिणाम भविष्य में यह हुआ कि लोग भगवान बुद्ध के उस वाक्य को पकड़कर मांसाहार करने लगे। आज चीन, मंगोलिया, श्रीलंका, जावा तथा भारत के कुछ भागों में जहां बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार है, लोग मांसाहार करते हैं। अहिंसा के विषय में भी ठीक यही स्थिति है। पश्चिमी जगत में करुणा और प्रेम का संदेश देने वाले यीशु अहिंसा के अग्रदूत माने जाते हैं, परंतु अहिंसा के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाले भगवान यीशु का परिणाम अत्यंत दुखद रहा। अंत में उन्हें सूली पर लटकाया गया और उनके विरोधियों ने उन्हें कायर करार दिया। इससे स्पष्ट परिलक्षित होता है कि भगवान यीशु के अनुयायियों ने अहिंसा के मूल अर्थ को ठीक प्रकार से नहीं समझा। भारतीय चिंतन में हमें अहिंसा का समीचीन अर्थ जानना होगा। महाभारत युद्ध के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध हेतु प्रेरित करने के लिए उपदेश देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की दृष्टि में अहिंसा का अर्थ है जिस पुरुष के अन्त:करण में 'मैं कर्ता हूं' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थ और कर्म में लिप्त नहीं होती है, वह पुरुष सब लोगों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न ही पाप से बंधता है। मानसकार कहते हैं कि आततायियों को दंड देने के लिए जिनके हाथ में धनुष और बाण हैं, ऐसे प्रभु श्री राम की वंदना करता हूं। भगवान यज्ञ की रक्षा करने के लिए ताड़का को मारना भी उचित समझते हैं। भक्तों की रक्षा के लिए मेघनाद के यज्ञ के विध्वंस का आदेश देते हैं। योग की संस्कृति को स्थापित करने के लिए लाखों राक्षसों के संहार को भी उचित मानते हैं। यह है अहिंसा का यथार्थ स्वरूप। इसलिए मानसकार ने लिखा है- परम धरम श्रुति विदित अहिंसा। पर निंदा सम अध न गरीसा।। वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना गया है और यह परनिंदा के समान भारी पाप नहीं है। श्रेणी:विश्व