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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

शेषनाग

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दिसम्बर 2021 हिंदू शेषनाग Ananta Shesha.jpg शेषनाग हजार सिर वाले नाग नागों के राजा शेषनाग विष्णु भक्त नागों का राजा विषैले फन क्षीर सागर नागराज और भगवान विष्णु की शैया व भक्त वासुकी , तक्षक , कालिया , शन्ख , महापद्म , पद्म , कर्कोटक , धनञ्जय आदि नाग नागलक्ष्मीhttp://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%83._601 गर्ग संहिता पृ. 601 hi.krishnakosh.org 2 अगस्त 2023 1 अगस्त 2023 https://web.archive.org/web/20230801155756/https://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%83._601 dead नाग पञ्चमी प्रजापति कश्यप देवी कद्रू कद्रूनन्दन , संकर्षण , लक्ष्मण, बलभद्र, आदिशेष सुनयना (जनक की पत्नी) , महाबलवान और सुलोचना (इन्द्रजीत की पत्नी) अंगूठाकार|ब्रह्मा शेषनाग को वर देते हुए शेषनाग या अदिशेष,ऋषि कश्यप और कद्रू के सबसे बड़े पुत्र हैं। वह नागराज भी थे। परंतु ये राजपाट छोड़कर विष्णु की सेवा में लग गए क्योंकि उनकी माता कद्रू ने अरुण और गरुड़ की माता तथा अपनी बहिन और उनकी विमाता विनता के साथ छल किया था। वह विष्णु भगवान के परम भक्त हैं और उनको शैया के रूप में आराम देते हैं। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, शेषनाग का दूसरा नाम अनंत भी हैं। इनके अनंत मस्तक हैं, इनका शरीर अनंत विशाल हैं और इनका कही अंत नहीं हैं इसीलिए इन्हें 'अनंत' भी कहा गया हैं। वह भगवान विष्णु के साथ क्षीरसागर में ही रहते हैं। भगवान श्रीहरि और माता लक्ष्मी क्षीर सागर में शेषनाग के आसन पर ही निवास करते हैं। मान्यताओं के अनुसार शेष ने अपने पाश्चात वासुकी और वासुकी ने अपने पश्चात् तक्षक को नागों का राजा बनाया वह सारे ग्रहों को अपनी कुंडली पर धरे हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि जब शेषनाग सीधे चलते हैं कब ब्रह्मांड में समय रहता है और जब शेषनाग कुंडली के आकार में आ जाते हैं तो प्रलय आती हैं। वह भगवान विष्णु के भक्त होने के साथ-साथ उनके अवतारों में भी उनका सहयोग करते हैं। जैसे कि त्रेता युग के राम अवतार में शेषनाग ने लक्ष्मण भगवान का रूप धरा था। वैसे ही द्वापर युग के कृष्ण अवतार में शेषनाग जी ने बलराम जी का अवतार लिया था। जब वसुदेव जी भगवान कृष्ण भगवान को टोकरी में डालकर नंद जी के यहां ले जा रहे थे तब शेषनाग जी उनकी छतरी की तरह उनको बारिश से बचा रहे थे। इनके अन्य छोटे भाई वासुकी , तक्षक , कालिया नाग , पद्म , महापद्म , धनञ्जय , शन्ख आदि नाग थे। शेषनाग का जन्म महाभारत के अनुसार दक्ष प्रजापति की कद्रू और विनता नाम की दो कन्याएं थीं दोनों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ। महर्षि कश्यप अपनी दोनों पत्नियों से समान प्रेम करते थे। एक बार महर्षि कश्यप ने अपनी दोनों पत्नियों से वरदान मांगने को कहा तो कद्रू ने एक सहस्त्र समान नागों को पुत्र रूप में पाने की मांग की लेकिन विनता ने केवल दो ही पुत्रों की मांग की जो कद्रू के हजार नागों से भी बलशाली हो। महर्षि कश्यप के वरदान के फल स्वरूप विनता ने दो और कद्रू ने हजार अन्डे दिए। दोनों ने अपने अण्डों को उबालने के लिए गर्म बर्तनों में रख दिया। ५०० वर्ष के बाद कद्रू के पहले अंडे से शेषनाग का जन्म हुआ। शेषनाग को श्राप एक बार कद्रू और विनता कहीं जा रही थीं तो उन्हें समुद्र मन्थन के समय निकला हुआ उच्चै:श्रवा नाम का सात मुखों वाला घोड़ा दिखा। विनता ने कहा कि "देखो दीदी इस घोड़े का रंग ऊपर से नीचे तक सब स्थानों पर से सफ़ेद है। कद्रू ने कहा कि "नहीं विनता इस घोड़े की पूंछ काले रंग की है। कद्रू ने विनता को अपनी दासी बनाने के लिए अपने पुत्र नागों से कहा। कई नागों ने उसकी आज्ञा मान ली लेकिन ज्येष्ठ पुत्र शेषनाग तथा मंझले पुत्र वासुकी और कुछ अन्य नागों ने इस बात का विरोध किया तो कद्रू ने शेषनाग और वासुकी समेत उन सभी नागों को श्राप दिया कि तुम पाण्डववन्शी राजा जनमेजय के नागयज्ञ में जलकर भस्म हो जाओगे। श्राप से मुक्ति श्राप पाने के बाद शेषनाग और वासुकी अपने छलिए भाइयों और अपनी माता को छोड़कर अनन्त ने गन्धमादन पर्वत पर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वर माँगा कि उनका मन सदा धर्म की ओर छुका रहे तथा भगवान नारायण के वे सेवक और सहायक बने। ब्रह्मा जी ने उन्हें इन वरों के अतिरिक्त ये वर भी दिया कि वे पृथ्वी को अपने फणों पर उठाए रखेंगे जिससे उसका सन्तुलन नहीं बिगड़ेगा । शेषनाग को इस श्राप से मुक्ति मिलते ही उन्होंने पृथ्वी को अपने फणों पर उठा लिया और तब से आज तक उन्होंने पृथ्वी को अपने फणों पर उठाया हुआ है और शेषनाग के जल लोक में जाते ही उनके छोटे भाई वासुकी का राजतिलक करके उन्हें राज्य सौंप दिया गया और वासुकी के कैलाश पर्वत पर जाते ही वासुकी के छोटे भाई तक्षक का राजतिलक हुआ। भगवान शंकर की सहायता से वासुकी ने भी श्राप से मुक्ति पाई थीे। शेषनाग की पत्नी शेषनाग की पत्नी नागलक्ष्मी हैं। इनका विवरण मुख्यतः गर्ग संहिता में मिलता है। गर्ग संहिता के बलभद्र खंड के अध्याय 3 में उल्लेख है कि वह अपने पति की सेवा के लिए शेष के अवतार बलराम की पत्नी रेवती के शरीर में समाहित हो गईं। name="auto">http://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%83._601 गर्ग संहिता पृ. 601 hi.krishnakosh.org 2 अगस्त 2023 1 अगस्त 2023 https://web.archive.org/web/20230801155756/https://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%83._601 dead गर्ग संहिता; बलभद्र खंड: अध्याय 3 प्रद्विपक मुनि ने कहा- उसके बाद शरद ऋतु के करोड़ों चन्द्रमाओं के समान कांति वाली नागलक्ष्मी स्वयं एक महान रथ पर सवार होकर वहाँ आईं। करोड़ों मित्र उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उन्होंने आकर स्वामी महान अनन्त भगवान संकर्षण से कहा- भगवन्! मैं भी तुम्हारे साथ पृथ्वी पर चलूँगा। तुम्हारे वियोग का दुःख मुझे इतना व्याकुल कर देगा कि मैं अपने प्राण नहीं बचा पाऊँगा। नाग लक्ष्मी का गला भर आया। भगवान अनंत, जो संपूर्ण जगत के कारणों के भी कारण हैं, जिनका स्वभाव भक्तों के दुखों को दूर करना है और जिनका श्री विग्रह ऐरावत के समान विशाल सर्प के समान है। अपनी प्रियतमा की यह हालत देखकर उन्होंने कहा- हे रामभोरू! तुम शोक मत करो, पृथ्वी पर जाओ और रेवती के शरीर में समा जाओ। तब तुम मेरी सेवा में उपस्थित होओगे। यह सुनकर नाग लक्ष्मी बोलीं- 'रेवती कौन है? वह किसकी पुत्री है और कहाँ रहती है - आप मुझे विस्तारपूर्वक बताइये। यह सुनकर भगवान अनन्त मुस्कुराये और अपने प्रिया से बोले। यह दुनिया की शुरुआत के बारे में है. मैंने कद्रू के गर्भ से कश्यप के पुत्र के रूप में जन्म लिया। http://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%83._601 गर्ग संहिता पृ. 601 hi.krishnakosh.org 2 अगस्त 2023 1 अगस्त 2023 https://web.archive.org/web/20230801155756/https://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%83._601 dead शेषनाग के अवतार अंगूठाकार|लक्ष्मी माता और विष्णु भगवान शेषनाग पर आराम करते हुए की मूरति वैसे तो शेषनाग के बल पराक्रम और अवतारों का उल्लेख विभिन्न पुराणों में है। शेषनाग के चार अवतार माने जाते हैं -: लक्ष्मण - राजा दशरथ के तीसरे पुत्र और भगवान विष्णु के राम अवतार के छोटे भाई के रूप में शेषनाग ने सुमित्रा के गर्भ से जन्म लिया था। उन्होंने अपने बड़े भाई श्रीराम के साथ इन्होंने कई असुरों का वध किया था। इन्होंने ही असुरराज रावण के पुत्र इन्द्रजीत तथा अतिकाय का वध किया था तथा वे सभी कलाओं में निपूर्ण थे चाहे वो मल्लयुद्ध हो या धनुर्विद्या। बलराम - वसुदेव के ज्येष्ठ पुत्र बलराम शेषनाग का ही रूप माने जाते हैं। उन्होने भगवान विष्णु के कृष्ण अवतार के बड़े भाई के रूप में रोहिणी के गर्भ से जन्म लिया था। इनके बल और पराक्रम का उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है। ये गदा युद्ध में विशेष प्रवीण थे तथा भीमसेन और दुर्योधन इनके ही शिष्य माने जाते हैं। अपने छोटे भाई श्रीकृष्ण के साथ मिलकर इन्होंने अनेकानेक पापियों का सर्वनाश किया था। बलराम के रूप में ही शेषनाग ने धेनुक , प्रलंब आदि शक्तिशाली असुरों का वध किया था। पतञ्जलि - महर्षि पतञ्जलि भी शेषनाग के ही अवतार माने जाते हैं। ये पूर्व कलयुग मे अवतरित हुए थे तथा इस युग में भी भगवान विष्णु के साथ अवतरित होंगे। रामानुजाचार्य - विष्णुपुराण और पद्म पुराण के अनुसार शेषनाग कलयुग में दो अवतार लेकर जन्म लेंगे। पहला महर्षि पतञ्जलि का अवतार और दूसरा रामानुजाचार्य का अवतार। सन्दर्भ