Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

नारियल

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

फ़रवरी 2023 अंगूठाकार|नारियल (कोकोस न्यूसीफेरा) thumb|नारियल का पेड़ का तना thumb|नारियल पुष्पक्रम (सूखे) नारियल एक बहुवर्षी एवं एकबीजपत्री पौधा है। इसका तना लंबा तथा शाखा रहित होता है। मुख्य तने के ऊपरी सिरे पर लंबी पत्तियों का मुकुट होता है। ये वृक्ष समुद्र के किनारे या नमकीन जगह पर पाये जाते हैं। इसके फल हिन्दु | हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयुक्त होता है। बांग्ला में इसे नारिकेल कहते हैं। नारियल के वृक्ष भारत में प्रमुख रूप से केरल,पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में खूब उगते हैं। महाराष्ट्र में मुंबई तथा तटीय क्षेत्रों व गोआ में भी इसकी उपज होती है। नारियल एक बेहद उपयोगी फल है। देर से पचने वाला, मूत्राशय शोधक, ग्राही, पुष्टिकारक, बलवर्धक, रक्तविकार नाशक, दाहशामक तथा वात-पित्त नाशक है। नारियल के पत्तो का उपयोग हम छाते के लिए कर सकते है ꫰ निरुक्त संस्कृत में इसको नालिकेरः कहते हैं। "नल्यते केन वायुना ईर्यते इति नालिकेर:"। वर्णभ्रंश के कारण, सामान्य भाषण में यह नारिकेल बन गया। इससे बंगला शब्द नारिकेल तथा हिन्दी शब्द नारियल निकले हैं | औषधीय गुण thumb|right|215px|नारियल नारियल की तासीर ठंडी होती है। नारियल का पानी हल्का, प्यास बुझाने वाला, अग्निप्रदीपक, वीर्यवर्धक तथा मूत्र संस्थान के लिए बहुत उपयोगी होता है। सूखे नारियल से तेल निकाला जाता है। इस तेल की मालिश त्वचा तथा बालों के लिए बहुत अच्छी होती है। नारियल तेल की मालिश से मस्तिष्क भी ठंडा रहता है। गर्मी में लगने वाले दस्तों में एक कप नारियल पानी में पिसा जीरा मिलाकर पिलाने से दस्तों में तुरंत आराम मिलता है। नारियल पानी को त्वचा पर लगाने के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि यह त्वचा को मोइस्चर और स्वस्थ रखने में मदद कर है। बुखार के कारण बार-बार लगने वाली प्यास के इलाज के लिए नारियल की जटा को जलाकर गर्म पानी में डालकर रख दें। जब यह पानी ठंडा हो जाए तो छानकर इसे रोगी को पीने दें। इससे प्यास मिटती है। आँतों में कृमि की समस्या से निपटने के लिए हरा नारियल पीसकर उसकी एक-एक चम्मच मात्रा का सुबह-शाम नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। नारियल के पानी की दो-दो बूँद सुबह-शाम कुछ दिनों तक नाक में टपकाने से आधा सीसी के दर्द में बहुत आराम मिलता है। सभी प्रकार की चोट-मोच की पीड़ा तथा सूजन दूर करने के लिए नारियल का बुरादा बनाकर उसमें हल्दी मिलाकर प्रभावित स्थान पर पट्टी बाँधें और सेंकें। विभिन्न त्वचा रोगों जैसे खाज-खुजली में नारियल के तेल में नीबू का रस और कपूर मिलाकर प्रभावित स्थान पर लगाने से लाभ मिलता है। हृदय के विकारो के जोखिम कम करने के लिए सूखा नारियल का सेवन करना चाहिए। सूखा नारियल में अधिक फाइबर होता है। जो हृदय को स्वस्थ बनाये रखने में मदद करता है। सूखे नारियल का सेवन करने से पाचन सम्बंधित सभी समस्याओं से बचने में मदद करता है। पित्तजन्य विकारों के निदान में नारियल विशेष रूप से लाभकारी है। इसके लिए कच्चे नारियल की गिरी, रस तथा सफेद चंदन का बुरादा मिला लें। इस मिश्रण की 10 ग्राम मात्रा को रात को पानी में भिगो दें। सुबह छानकर इसे खाली पेट पिएँ। स्वस्थ सुंदर संतान प्राप्ति के लिए गर्भवती महिला को 3-4 टुकड़े नारियल प्रतिदिन चबा-चबाकर खाने चाहिए। इसके साथ एक चम्मच मक्खन, मिसरी तथा थोड़ी सी पिसी कालीमिर्च मिलाकर चाटें। बाद में थोड़ी सी सौंफ चबाएँ। इसके आधे घंटे बाद तक कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए। पुराने सूजाक और मूत्रकृच्छ में भी इससे आश्चर्यजनक लाभ होता है। नारियल क्रोहन्स डिजीज के इलाज के लिए एक रामबाण औषधि है। इस बीमारी में रोगी की आँतों में जलन, डायरिया, मल में रक्त आना, वजन कम होना आदि लक्षण होते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार क्रोहन्स डिजीज के उपचार में प्रयोग किए जाने वाले कॉर्टिकोस्टेराइड्स के समकक्ष नारियल में फाइटोस्टेराल्स नामक समूह तत्व होता है जो क्रोहन्स डिजीज में मुकाबला करता है। नारियल हमें मोटापे से भी बचाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार एक स्वस्थ वयस्क के भोजन में प्रतिदिन 15 मिग्रा जिंक होना जरूरी है जिससे मोटापे से बचा जा सके। ताजा नारियल में जिंक भरपूर मात्रा में होता है। हैजे में यदि उल्टियाँ बंद न हो पा रही हों तो रोगी को तुरंत नारियल पानी पिलाना चाहिए। इससे उल्टियाँ बंद हो जाती हैं thumb|नारियल __LEAD_SECTION__ नारियल (Cocos nucifera) ताड़ परिवार (एरेकेसिया) का एक सदस्य है और कोकोस वंश की एकमात्र जीवित प्रजाति है। "नारियल" शब्द (या पुरातन "कोकोनाट") पूरे नारियल ताड़ के पेड़ या बड़े कठोर फल को दर्शाता है।Coconut Concise Oxford Dictionary Pearsall, J. 1999 10th Oxford Clarendon Press https://archive.org/details/conciseoxforddic0010unse/page/275/mode/1up?q=cocoanut मूल रूप से दक्षिण पूर्व एशिया, न्यू गिनी और दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत के मूल निवासी, वे तटीय उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सर्वव्यापी हैं। नारियल का पेड़ भोजन, ईंधन, सौंदर्य प्रसाधन, लोक चिकित्सा और निर्माण सामग्री प्रदान करता है। परिपक्व फल का आंतरिक गुदा(गरी) उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय में कई लोगों के आहार का एक नियमित हिस्सा है। नारियल एंडोस्पर्म में बड़ी मात्रा में तरल, "नारियल पानी" होता है। परिपक्व नारियल को गुदा(गरी) से तेल और नारियल के दूध, कठोर खोल से लकड़ी का कोयला और रेशेदार भूसी से कॉयर के लिए संसाधित किया जा सकता है। सूखे नारियल के गुदा(गरी) को कोपरा कहा जाता है, और इससे प्राप्त तेल और दूध का उपयोग आमतौर पर खाना पकाने और साबुन और सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है। मीठे नारियल के रस को पेय के रूप में ग्रहण जा सकता है या ताड़ की शराब या नारियल के सिरके में किण्वित किया जा सकता है। भारत समेत दुनियां के कई देशों में गर्भवती महिला इसका सेवन करती है, क्योंकि ये कई पोषक तत्व से भरे होते है, साथ ही मान्यता है कि इससे बच्चे का रंग श्वेत होता है। सख्त खोल, रेशेदार भूसी और लंबे पन्ने के पत्तों का उपयोग साज-सज्जा और सजावट के लिए उत्पादों को बनाने के लिए किया जाता है। कई ऑस्ट्रोनेशियाई लोग के लिए नारियल का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है, जो उनकी पौराणिक कथाओं, गीतों और मौखिक परंपराओं में दिखाई देता है। भारत में भी छठ पूजा में नारियल का प्रयोग प्रसाद के रूप में होता है, कई जगह इसके लड्डू प्रसाद के रूप में भोग लगाया जाता है। दक्षिण एशियाई संस्कृतियों में खास कर भारत जैसे देशों में भी इसका धार्मिक महत्व है, जहाँ इसका उपयोग हिंदू अनुष्ठानों में किया जाता है, जिसमें विवाह और पूजा शामिल हैं। हवन में इसे प्रतिष्ठित किया जाता है अथवा कलश में इसे मध्य कलश में(ऊपर) लाल कपड़ों में लपेट कर पूजन हेतु प्रयोग में लाया जाता है। न्यूजीलैंड और भारत से कोको जैसे जीवाश्म बरामद किए गए हैं। आनुवंशिक अध्ययन नारियल के मूल केंद्र की पहचान मध्य हिंद-प्रशांत के रूप में करते हैं, जहाँ इसकी सबसे बड़ी आनुवंशिक विविधता है। यह द्वीप दक्षिण पूर्व एशिया में ऑस्ट्रोनेशियाई लोगों द्वारा कृषि लायक बनाया गया था और नवपाषाण काल के दौरान उनके समुद्री प्रवास के माध्यम से प्रशांत द्वीप समूह के रूप में और पश्चिम में मेडागास्कर के रूप में फैल गया था। इन प्रजातियों ने भोजन और पानी का एक आसानी से ढोने अथवा एक जगह से दूसरे जगह ले जाने लायक स्रोत प्रदान करके, साथ ही बाहरी नौकाओं के लिए निर्माण सामग्री प्रदान करके अपनी लंबी समुद्री यात्राओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नारियल बहुत बाद में दक्षिण एशियाई, अरब और 16वीं शताब्दी से यूरोपीय नाविकों द्वारा भारतीय और अटलांटिक महासागरों के तटों पर फैलाए गए थे। इन परिचयों के आधार पर, प्रजातियों को प्रशांत और हिंद-अटलांटिक प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। हिन्द-अटलांटिक प्रकार को औपनिवेशिक युग के दौरान कोलम्बियाई विनिमय में अमेरिका में पेश किया गया था। पेड़ 30 मीटर (100 फीट) तक लंबे हो सकते हैं और प्रति वर्ष 75 फल दे सकते हैं, हालांकि 30 से कम अधिक विशिष्ट हैं।परन्तु कई जगह इसके बौने प्रजाति भी होते है जो लगभग 2 से 3 मीटर ही ऊंचे होते है। वे ठंड के प्रति असहिष्णु होते हैं अर्थात ठंड में ये वृद्धि अथवा उपज नहीं कर सकते और प्रचुर वर्षा और पूर्ण सूर्य के प्रकाश को पसंद करते हैं। कई कीट और बीमारियाँ इस फसल, उपज और व्यावसायिक उत्पादन को प्रभावित करती हैं। 2024 में, नारियल का विश्व उत्पादन 65.5 लाख टन था, जिसमें इंडोनेशिया, भारत और फिलीपींस द्वारा उत्पादित कुल का 73% था। इन्हें भी देखें डाभ बाहरी कड़ियाँ श्रेणी:फल