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वटेश्वर-सिद्धान्त
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वटेश्वरसिद्धान्त, आचार्य वटेश्वर द्वारा सन 904 में रचित गणितीय और खगोलीय ग्रंथ है। इस ग्रंथ में पन्द्रह अध्याय हैं जो खगोलशास्त्र और व्यावहारिक गणित के बारे में हैं।
वटेश्वर सिद्धांन्त प्राचीन भारतीय ज्योतिषशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना आचार्य वटेश्वर ने ८२६ शक संवत (९०४ ईस्वी) में की थी। आचार्य वटेश्वर ने २४ वर्ष की अल्पायु में इस विशाल ग्रंथ की रचना की थी । यह ग्रंथ 'सिद्धान्त' श्रेणी का है, जिसमें काल गणना से लेकर ग्रहों की वास्तविक स्थिति तक का वैज्ञानिक विवेचन है। आचार्य वटेश्वर ज्योतिष को वेदों का मुख्य अंग (नेत्र) मानते हैं और इसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का साधन बताते हैं। यह ग्रंथ विशेष रूप से आर्यभट के सिद्धांतों का समर्थन करता है और ब्रह्मगुप्त द्वारा आर्यभट पर किए गए आक्षेपों का तार्किक खण्डन करता है।
आचार्य वटेश्वर
आनन्दपुर नामक नगर में महदत्त भट्ट नाम के एक विद्वान ब्राह्मण थे। वटेश्वराचार्य उनके पुत्र थे। वटेश्वराचार्य ने ८०२ शकाब्द में जन्म लिया। आनन्दपुर प्रायः पंजाब प्रदेश के अन्तर्गत है, यह बात पंजाब में रहने वालों के कहने से और अन्य प्रान्त के लोगों के कहने से भी मालूम होती है। अपने नाम के सिद्धान्त ( वटेश्वरसिद्धान्त) के प्रत्येक अधिकार के समाप्ति-स्थान में इति श्रीमदानन्दपुरीय महदत्तमुत वटेश्वर विरचिते स्वनामसंज्ञिते स्फुटसिद्धान्ते इत्यादि ग्रन्थकार के लेख से भी मालूम होता है कि वटेश्वराचार्य आनन्दपुर के रहने वाले थे, लेकिन पजाब प्रान्त में जो आनन्दपुर है यहां के से थे या किसी दूसरे आनन्दपुर (किसी दूसरे प्रान्त में रहा होगा) के वे इसके लिए कोई प्रबल प्रमाण न मिलने के कारण निर्णय नहीं कर सकते हैं। जन्म समय से चौबीस वर्ष की अवस्था में इन्होंने 'बटेश्वर सिद्धान्त' की रचना की, यह बात ग्रन्थकार के लेख ही से मालूम होती है। ग्रन्थरचना समय के लिए उनका श्लोक यह है-
शकेन्द्रकालाद भुजशून्यकुञ्जरे (८०२) रभूदतीर्तर्मम जन्म हायनैः ।
प्रकारि सिद्धान्तमितेः स्वजन्मनो मया जिना (२४) चुं सदामनुग्रहात् ॥"
विद्वन्मण्डली में उसका बहुत आदर था। भास्कराचार्य रचित सिद्धान्तशिरोमणि की टिप्पणी में 'जन्मनोऽष्टौ सदाः समाः यमु' बटेश्वरसिद्धान्त में कथित इस वचन के लेख देखने से तथा ब्रह्मा की आयु में वटेश्वरसिद्धान्त में ग्रहादि भगरणों के पाठ देखकर मालूम होता है कि 'तो युज्यते कुर्वते तो पुनश्यत्स्वेषु तेम्यो महदुद्भ्यो नमोस्तु' यह सिद्धान्तशिरोमणि में आया हुआ भास्करकृत प्राक्षेप वटेश्वराचार्य ही के ऊपर है। तरङ्गिणी में इस सिद्धान्तग्रन्थ के विषय में महामहोपाध्याय पण्डित सुधाकर द्विवेदी जी के लेख से भी उसके बहुत पूर्व समय से प्रचार में किसी तरह का सन्देह नहीं रहता है। वटेश्वराचार्य, आर्यभट के बहुत भक्त थे, और ब्रह्मगुप्त मत के बहुत ही विरोधी थे।बटेश्वर सिद्धान्त (हिन्दी भाष्य सहित)
संरचना
वटेश्वरसिद्धान्त में तीन अधिकार हैं और प्रत्येक अधिकार में अनेक अध्याय हैं। तीन अधिकारों के नाम हैं-
(१) मध्यमाधिकार
(२) स्पष्टाधिकार
(३) त्रिप्रश्नाधिकार
विभिन्न अधिकारों के अध्यायों का विवरण निम्नलिखित है-
मध्यमाधिकार
इस अधिकार में कुल १० अध्याय दिए गए हैं:
प्रथमोऽध्यायः (इसमें मंगलाचरण, युगादि मान और भगणों का वर्णन है)
द्वितीयोऽध्यायः - मानविवेकः
तृतीयोऽध्यायः - द्युगण (ग्रहगण) विधिः
चतुर्थोऽध्यायः - सर्वतोभद्रनामक
पञ्चमोऽध्यायः (इसमें प्रत्ययशुद्धि और अधिमास आदि का वर्णन है)
षष्ठोऽध्यायः - करणविधि
सप्तमोऽध्यायः - प्रमाणविधि
अष्टमोऽध्यायः - देशान्तरविधिः
नवमोऽध्यायः - प्रश्नविधि
दशमोऽध्यायः - ब्रूगानि (इसमें ब्रह्मगुप्त आदि के मतों का खंडन है)
स्पष्टाधिकार
इस अधिकार में ७ अध्याय हैं:
प्रथमोऽध्यायः (स्फुटीकरण के प्रयोजन और ज्या-साधन पर आधारित)
द्वितीयोऽध्यायः - स्वोच्चनीचग्रहस्फुटीकरणविधिः
तृतीयोऽध्यायः - प्रतिमण्डलस्पष्टीकरणविधिः
चतुर्थोऽध्यायः - स्फुटीकरणम्
पञ्चमोऽध्यायः - पातस्पष्टस्फुटीकरणविधि
षष्ठोऽध्यायः - नक्षत्रानयनविधिः
सप्तमोऽध्यायः - प्रश्नविधि
त्रिप्रश्नाधिकार
इस अधिकार में कुल १५ अध्याय दिए गए हैं:
प्रथमोऽध्यायः - त्रिप्रश्नारम्भप्रयोजनम्
द्वितीयोऽध्यायः - लम्बाक्षज्ञानपनविधिः
तृतीयोऽध्यायः - क्रान्तिज्ञानपनविधिः
चतुर्थोऽध्यायः - शृङ्गज्ञानपनविधि
पञ्चमोऽध्यायः - कुज्यानपनविधि
षष्ठोऽध्यायः - अग्रानयनविधि
सप्तमोऽध्यायः - स्वचराधेयाप्राणसाधनविधि
अष्टमोऽध्यायः - लग्नादिविधि
नवमोऽध्यायः - शूलभादिविधि
दशमोऽध्यायः - अवेष्टच्छायाविधि
एकादशोऽध्यायः - सममण्डलप्रवेशविधि
द्वादशोऽध्यायः - कोणाश्रुविधि
त्रयोदशोऽध्यायः - छायातोऽर्कानयनविधि
चतुर्दशोऽध्यायः - छायापरिलेखाविधि
पञ्चदशोऽध्यायः - प्रश्नाध्यायविधि
मध्यमाधिकार
यह खंड ग्रहों की मध्यम गति और काल गणना पर केंद्रित है। इसमें कुल १० अध्याय हैं :
युग और काल मान : इसमें सृष्टि की आयु, युग (कृत, त्रेता, द्वापर, कलि) के मान और विभिन्न प्रकार के 'मान' (सौर, चान्द्र, सावन, नाक्षत्र आदि) का सूक्ष्म वर्णन है।
अहर्गण साधन: अहर्गण (सृष्टि के आरंभ से बीते हुए दिनों की संख्या) निकालने की विधियों का विस्तार से वर्णन है।
ग्रह भगण : एक महायुग में सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रहों द्वारा लगाए जाने वाले चक्करों (भगणों) की संख्या दी गई है।
ब्रूगानि (मत खंडन): १०वें अध्याय में आचार्य वटेश्वर ने ब्रह्मगुप्त के सिद्धांतों की कमियों को उजागर करते हुए अपने मत की श्रेष्ठता सिद्ध की है।
स्पष्टाधिकार
इस खंड का मुख्य उद्देश्य ग्रहों की वास्तविक (स्पष्ट) स्थिति ज्ञात करना है। इसमें ७ अध्याय शामिल हैं:
स्फुटीकरण विधि: ग्रहों की मध्यम स्थिति में संस्कार (Corrections) लगाकर उन्हें 'स्पष्ट' करने की प्रक्रिया बताई गई है।
ज्या-साधन : त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण अंग 'ज्या' (Sine) के साधन के लिए २४ ज्याओं के स्थान पर ५६ ज्याओं का सूक्ष्म प्रयोग किया गया है, जो वटेश्वर की गणितीय कुशलता को दर्शाता है।
ग्रहों की कक्षा और प्रतिमण्डल : ग्रहों के भ्रमण मार्ग, उनके उच्च-नीच स्थान और प्रतिमण्डल (Epicycles) के गणितीय मॉडल का विवेचन है।
त्रिप्रश्नाधिकार
यह खंड दिक् (दिशा), देश (स्थान) और काल (समय) से संबंधित समस्याओं के समाधान पर आधारित है। इसमें १५ अध्याय हैं:
छाया और समय: सूर्य की छाया के माध्यम से समय का ज्ञान, अक्षांश और लम्बांश का निर्धारण इस खंड का मुख्य भाग है।
लग्न साधन : विभिन्न स्थानों पर लग्न की गणना करने की जटिल विधियाँ दी गई हैं।
शंकु और यंत्र : खगोलीय वेध के लिए शंकु और अन्य यंत्रों के उपयोग के गणितीय आधार का वर्णन है।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
वटेश्वर
बाहरी कड़ियाँ
वटेश्वरसिद्धान्त (अंग्रेजी अनुवाद - कृपाशंकर शुक्ल)
वटेश्वरसिद्धान्तः (संस्कृत विकिस्रोत)
वटेश्वरसिद्धान्त (रामस्वरूप शर्मा द्वारा सम्पादित एवं हिन्दी अर्थ सहित) (संस्कृत विकिस्रोत)
वटेश्वरसिद्धान्त (प्रथम संस्करण ; हिन्दी भाष्य - रामस्वरूप शर्मा)
वटेश्वरसिद्धान्त (प्रथम संस्करण ; हिन्दी भाष्य - रामस्वरूप शर्मा)
वटेश्वरसिद्धान्त (प्रथम संस्करण ; हिन्दी भाष्य - रामस्वरूप शर्मा)
श्रेणी:भारतीय गणित
श्रेणी:गणित का इतिहास