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411 समाचार
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हाइफा का युद्ध

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right|200px|हाइफ़ा में भारतीय सैनिक हाइफा का युद्ध प्रथम विश्वयुद्ध के समय 23 सितंबर 1918 को हाइफा में लड़ा गया था। आजकल हाइफा इजराइल में है लेकिन तब यह तुर्की के विशाल उस्मानी साम्राज्य का का भाग था। इस युद्ध को ब्रिटिश के साथ लड़ रहे भारतीय सैनिकों ने जीता था। इजरायल के हाइफा में भारतीय सैनिकों ने 106 साल पहले लड़ा था युद्ध, तुर्की की सेना को चटाई थी धूल उस समय उस्मानी साम्राज्य ने मित्र देशों के भीषण हमले के खिलाफ अपने क्षेत्रों की रक्षा करने की मांग की। उन्हें उनके जर्मन सहयोगियों ने मदद की, जो यूरोप में मित्र देशों के खिलाफ लड़ रहे थे। जर्मनों की सहायता से तुर्क सैनिकों का एक अभियान दल स्वेज़ नहर पर कब्ज़ा करने के लिए मिस्र की ओर बढ़ रहा था। स्वेज नहर अत्यधिक रणनीतिक महत्व की थी क्योंकि इसका उपयोग ब्रिटिशों द्वारा उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशियाई उपनिवेशों से यूरोप में लड़ रहे अपने सैनिकों तक महत्वपूर्ण आपूर्ति पहुंचाने के लिए किया जाता था। जर्मनों ने सोचा कि यदि वे स्वेज नहर पर अधिकार कर सकते हैं और आपूर्ति शृंखला को काट सकते हैं, तो इससे ब्रिटिश युद्ध की संभावनाओं को बहुत बड़ा झटका लगेगा। इसलिए, जर्मन और उस्मानी सेनाओं ने 1915 में फिलिस्तीन और सिनाई अभियान शुरू किया और उन्होंने सिनाई प्रायद्वीप पर आक्रमण किया, जो उस समय ब्रिटिश नियंत्रण में था। उस अभियान के दौरान दोनों पक्षों ने कई लड़ाइयाँ लड़ीं और अंग्रेज़ अपने अधिकांश क्षेत्रों को बचाये रखने में सफल रहे। 1917 में, ब्रिटिश सेना का डेजर्ट कॉलम राफा की लड़ाई में सिनाई प्रायद्वीप पर सफलतापूर्वक कब्जा करने में सक्षम था। मित्र सेनाओं ने प्रगति की और अफुल्ला और नाज़रेथ पर कब्ज़ा करने के बाद जुडियन हिल्स में तुर्क सेनाओं को घेर लिया। हालाँकि, ब्रिटिश नेतृत्व वाले मिस्र अभियान बलों द्वारा किसी भी आगे की योजनाबद्ध प्रगति के लिए हाइफ़ा पर कब्ज़ा और मुक्ति बहुत महत्वपूर्ण थी। इसका उपयोग ब्रिटिश और मिस्र की सेनाओं के लिए लैंडिंग आपूर्ति के लिए किया जाना था ताकि वे लड़ना जारी रख सकें।हाइफ़ा का युद्ध, 1918 इस युद्ध में राजपूताने की सेना का नेतृत्व जोधपुर रियासत के सेनापति मेजर दलपत सिंह ने किया। उनका जन्म वर्तमान पाली जिले के देवली गाँव मे रावणा राजपूत परिवार में हुआ था। अंग्रेजो ने जोधपुर रियासत की सेना को हाइफा पर कब्जा करने के आदेश दिए गए। आदेश मिलते ही जोधपुर रियासत के सेनापति दलपत सिंह ने अपनी सेना को दुश्मन पर टूट पड़ने के लिए निर्देश दिया। जिसके बाद यह राजस्थानी रणबांकुरो की सेना दुश्मन को खत्म करने और हाइफा पर कब्जा करने के लिए आगे की ओर बढ़ी। लेकिन तभी अंग्रेजो को यह मालूम चला की दुश्मन के पास बंदूके और मशीन गन है जबकि जोधपुर रियासत की सेना घोड़ो पर तलवार और भालो से लड़ने वाली थी। इसी वजह से अंग्रेजो ने जोधपुर रियासत की सेना वापस लौटने के आदेश दिया। लेकिन जोधपुर रियासत के सेनापति दलपत सिंह ने कहा की हमारे यहाँ वापस लौटने का कोई रिवाज नहीं है। हम रणबाँकुरे जो रण भूमि में उतरने के बाद या तो जीत हासिल करते है या फिर वीरगति को प्राप्त हो जाते है। दूसरी ओर यह सेना को दुश्मन पर विजय प्राप्त करने के लिए बंदूके, तोपों और मशीन गन के सामने अपने छाती अड़ाकर अपनी परम्परागत युद्ध शैली से बड़ी बहादुरी के लड़ रही थी। इस लड़ाई में जोधपुर की सेना के करीब नो सौ सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध का परिणाम ने एक अमर इतिहास लिख डाला। जो आज तक पुरे विश्व में कही नहीं देखने को मिला था। क्युकी यह युद्ध दुनिया के मात्र ऐसा युद्ध था जो की तलवारो और बंदूकों के बीच हुआ। लेकिन अंतत : विजयश्री राठौड़ो मिली और उन्होंने हाइफा पर कब्जा कर लिया और चार सौ साल पुराने ओटोमैन साम्राज्य का अंत हो गया। रणबाँका राठौड़ो की इस बहादुरी के प्रभावित होकर भारत में ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ़ ने फ़्लैग-स्टाफ़ हाउस के नाम से अपने लिए एक रिहायसी भवन का निर्माण करवाया। भवन एक चौराहे से लगा हुआ बना है, इस चौराहे के मध्य में गोल चक्कर के बीचों बीच एक स्तंभ के किनारे तीन दिशाओं में मुंह किये हुए तीन सैनिकों की मूर्तियाँ लगी हुई हैं। जो की रणबाँका राठौड़ो की बहादुरी को यादगार बनाने के लिए बनाई गई। हाइफा युद्ध में भारत की तरफ से तीन राज्यों की सेना गई जिसमे हैदराबाद,मैसूर और मारवाड़ रियासत, इस युद्ध को लड़ने का निर्णय मारवाड़ी सेना ने लिए जिसका नेतृत्व राठौड़ दलपत सिंह ने किया जिन्हे हाइफा हीरो के नाम से जाने जाते है। इस युद्ध के 100 वर्ष पूर्ण होने पर 2018 में जर्मन सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया। इन्हें भी देखें हाइफ़ा दलपत सिंह शेखावत ईरान पर इज़राइल का हमला, जून 2025 ईरान-इजराइल छद्म संघर्ष सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ इतिहास के रणबांकुरो की वह कहानी जो आज भी हरेक राजस्थानी को गौरवान्वित करती है मारवाड़ के लाल का अदम्य शौर्य, तुर्की सेना को घुटने टेकने पर कर दिया था मजबूर, जानिए आप भीजून 2020 InternetArchiveBot श्रेणी:एशिया के युद्ध