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लेखन नाम
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तख़ल्लुसलेखन नाम, क़लम नाम अथवा तख़ल्लुस (en pen name no, fr nom de plume no, फ़ारसी/उर्दू: تخلص) एक मिथ्यानाम है, जिसे कोई लेखक अपनाता है और अपनी कृतियों के शीर्षक पृष्ठ अथवा लेखक पंक्ति पर अपने वास्तविक नाम के स्थान पर मुद्रित करता है।
लेखन नाम का प्रयोग लेखक के नाम को अधिक विशिष्ट बनाने, लेखक के लिंग का गोपन करने, लेखक को उसकी अन्य कृतियों से दूर करने, लेखक को उसके लेखन के लिए प्रतिकार से रक्षा करने, अनेक व्यक्तियों को एक ही अभिज्ञेय लेखक में विलीन करने, अथवा कृति के विपणन अथवा सौन्दर्यपरक प्रस्तुतीकरण से सम्बद्ध कई कारणों में से किसी के लिए किया जा सकता है।https://www.powells.com/post/original-essays/a-brief-history-of-pen-names Original Essays: A Brief History of Pen Names Beck Haylen June 20, 2017 powells.com Powell's City of Books May 29, 2021
लेखक की वास्तविक पहचान केवल प्रकाशक को ज्ञात हो सकती है अथवा सर्वविदित हो सकती है। कुछ स्थितियों में, जैसे एलेना फ़ेरान्ते और टोर्स्टन क्रोल की स्थितियों में, लेखन नाम लेखक की दीर्घकालिक अनामता को संरक्षित रख सकता है।
साहित्य
हांगकांग
वूशिया उपन्यासकार लुई चा अपने जन्म-नाम चा ल्यूङ-युङ (查良鏞) के दिये गये नाम के चीनी अक्षर (鏞) के घटकों को पृथक् करके गुम यूङ (金庸) लेखन नाम का प्रयोग करते हैं।
भारत
भारतीय भाषाओं में लेखक अपने नामों के अन्त में लेखन नाम रख सकते हैं, जैसे रामधारी सिंह दिनकर। कुछ लेखकों ने, जैसे फ़िराक़ गोरखपुरी, केवल लेखन नाम से ही लिखा।
प्राचीन भारतीय साहित्य में लेखकों ने नामों के प्रयोग को अहंकारी माना। यतः नामों से बचा जाता था, भारत की अनेक पूर्ववर्ती साहित्यिक कृतियों के कर्तृत्व का अन्वेषण करना कठिन है। पश्चात् लेखकों ने अपने उपास्य देवता अथवा गुरु के नाम को अपने लेखन नाम के रूप में प्रयोग करने की प्रथा अपनाई। इस स्थिति में, सामान्यतः लेखन नाम गद्य अथवा पद्य के अन्त में सम्मिलित किया जाता था।
भारतीय शास्त्रीय संगीत के रचनाकारों ने कर्तृत्व सिद्ध करने हेतु रचनाओं में लेखन नामों का प्रयोग किया, जिनमें सादारंग, गुनारंग (फ़य्याज़ अहमद ख़ान), आदा रंग (मुहम्मद शाह के राज-संगीतज्ञ), सबरंग (बड़े ग़ुलाम अली ख़ान), तथा रामरंग (रमाश्रेय झा) सम्मिलित हैं। अन्य रचनाएँ अप्रामाणिक रूप से रचनाकारों को उनके लेखन नामों के साथ आरोपित की जाती हैं।
जापान
हाइकु लिखने वाले जापानी कवि प्रायः हाइगो (俳号) का प्रयोग करते हैं। हाइकु कवि मात्सुओ बाशो ने दो अन्य हाइगो का प्रयोग किया था, इससे पूर्व कि वे अपने शिष्य द्वारा दिये गये कदली पौधे (बाशो) के प्रति अनुरक्त होते और ३६ वर्ष की आयु में उसे अपने लेखन नाम के रूप में प्रयोग करना आरम्भ करते।
लेखन नाम के समान, जापानी कलाकारों का प्रायः गो अथवा कला-नाम होता है, जो उनके वृत्ति-काल में अनेक बार परिवर्तित हो सकता है। कुछ स्थितियों में, कलाकारों ने अपने वृत्ति-काल के विभिन्न चरणों में भिन्न-भिन्न गो अपनाये, सामान्यतः अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों को चिह्नित करने हेतु। इसका एक अत्यन्त चरम उदाहरण होकुसाई है, जिन्होंने केवल १७९८ से १८०६ की अवधि में छह से कम नहीं प्रयोग किये। मांगा कलाकार ओगुरे इतो ओह! ग्रेट लेखन नाम का प्रयोग करते हैं, यतः उनका वास्तविक नाम ओगुरे इतो लगभग वही है जो जापानी ओह ग्रेट के रूप में उच्चारित करते हैं।
फ़ारसी-ओ-उर्दू काव्य
फ़ारसी तथा उर्दू में काव्य-पंक्तियाँ (शेर) रचने वाले कवि का लगभग सदैव एक लेखन नाम होता है, जो परम्परागत रूप से नाम के अन्त में रखा जाता है (प्रायः उसके ऊपर रखे आलेखीय चिह्न ـؔ द्वारा चिह्नित), जब कवि को उसके पूर्ण नाम से सन्दर्भित किया जाता है। उदाहरणार्थ, हाफ़िज़ शम्स अल-दीन का लेखन नाम है, और इस प्रकार उन्हें सन्दर्भित करने का सामान्य प्रकार शम्स अल-दीन हाफ़िज़ अथवा केवल हाफ़िज़ होगा। मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान (उनका राजकीय नाम तथा उपाधि) को मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब, अथवा केवल मिर्ज़ा ग़ालिब कहकर सन्दर्भित किया जाता है।
सन्दर्भ
श्रेणी:साहित्य
श्रेणी:छद्मविज्ञान