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411 समाचार
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संगठन सिद्धान्त

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संगठन सिद्धान्त (Organizational theory) के अन्तर्गत औपचारिक सामाजिक संगठनों का समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाता है। व्यापारिक संगठन तथा ब्यूरोक्रैटिक संस्थाएँ आदि औपचारिक सामाजिक संगठन हैं। संगठन के सिद्धान्त संगठन के सिद्धान्त निम्न हैं:- (1) उद्देश्य का सिद्धान्त - उद्देश्य के बिना संगठन का निर्माण नहीं किया जा सकता है, अतः संगठन के प्रत्येक भाग का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। संगठन में कार्यरत सभी व्यक्तियों को संगठन के उद्देश्य स्पष्ट होने चाहिए। उद्देश्य निश्चित न होने पर मानव एवं मानव सामग्री का कुशल एवं प्रभावी उपयोग नहीं किया जा सकता है। (2) समन्वय का सिद्धान्त - समन्वय (coordination) संगठन के समस्त सिद्धान्तों को अभिव्यक्त करता है। संगठन का उद्देश्य ही उपक्रम के विभिन्न विभागों पर किये जाने वाले कार्य में समन्वय स्थापित करता है। (3) विशिष्टीकरण का सिद्धान्त - व्यक्ति की इच्छा एवं कार्य क्षमता के अनुसार ही कार्य सौंपा जाना चाहिए जिसको करने में वह सक्षम है। तो वह उस कार्य में दक्षता प्राप्त करता है। इस सिद्धान्त के पालन से विभागों एवं कर्मचारियों की कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है। (4) अधिकार का सिद्धान्त - सर्वोच्च सत्ता से अधिकारों के हस्तान्तरण के लिए पद-श्रेणीक्रम (hierarchy) का निश्चित निर्धारण होना चाहिए। प्रत्येक कार्य के संबंध में अधिकारों का उचित निर्धारण किया जाना चाहिए। (5) उत्तरदायित्व का सिद्धान्त - अधिकार एवं दायित्व साथ-साथ होने चाहिए। अधीनस्थ कर्मचारियों के द्वारा किये गये कार्यों के लिए उच्च अधिकारियों का पूर्ण दायित्व होता है। (6) व्याख्या का सिद्धान्त - प्रत्येक संगठन में हर एक की स्थिति लिखित में स्पष्टतः निर्धारित की जानी चाहिए। प्रत्येक कर्मचारी के कर्तव्य, दायित्व, अधिकार व संबंधों की स्पष्ट व्याख्या की जानी चाहिए। (7) आदेश की एकता (unity of command) का सिद्धान्त - संगठन में कार्यरत व्यक्ति एक समय में एक ही अधिकारी की सेवा कर सकता है अतः एक समय में एक ही अधिकारी से आदेश प्राप्त कर सकता है। एक से अधिक अधिकारियों से आदेश प्राप्त होने पर उसकी कार्य रूचि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। (8) अनुरूपता का सिद्धान्त - यदि व्यक्ति के दायित्व अधिकारों की तुलना में अधिक है तो वह उन्हें पूरा नहीं कर सकता है तथा व्यक्ति के अधिकार दायित्वों की तुलना में अधिक है तो वह उनका दुरूपयोग करने की कोशिश करेगा। अतः दोनों ही स्थितियाँ संगठन के लिए अच्छी नहीं है। (9) नियंत्रण के विस्तार का क्षेत्र - नियंत्रण के क्षेत्र से आशय एक अधिकारी द्वारा विभिन्न अधीनस्थों की क्रियाओं पर नियंत्रण बनाये रखने से है। कोई भी अधिकारी प्रत्यक्ष रूप से पांच या छः कर्मचारियों की क्रियाओं पर नियंत्रण कर सकता है। (10) संतुलन का सिद्धान्त - यह सिद्धान्त संगठन की विभिन्न इकाईयों, नियंत्रण के विस्तार एवं आदेशों की श्रृंखला, रेखा व कर्मचारी प्रारूप आदि में उचित संतुलन बनाये रखने पर बल देता है। (11) निरन्तरता का सिद्धान्त - संगठन संरचना में पर्याप्त लोच होनी चाहिए जिससे कि संगठन संरचना में आवश्यकता पड़ने पर इसका पुनर्गठन किया जा सके। संगठन एक प्रक्रिया है जो कि निरन्तर चलती रहती है। इसलिए संगठन आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। (12) अधिकार प्रत्यायोजन का सिद्धान्त - अधिकारों का प्रत्यायोजन संगठन के निम्न स्तर तक किया जाना चाहिए। यदि उस स्तर पर कार्य करने वाला व्यक्ति निर्णय के परिणामों से प्रभावित होता है। उच्च प्रबन्धकों को महत्वपूर्ण निर्णय लेने एवं भारी नियोजन के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। (13) सरलता का सिद्धान्त - संगठन संरचना सरल से सरल होनी चाहिए जिससे सेवारत सभी व्यक्ति आसानी से समझ सकें तथा निष्पादन में अधिक लागत न आये व कठिनाइयों को कम किया जा सके। (14) लोचशीलता का सिद्धान्त - संगठन के लोचशील होने से, बिना भारी फेरबदल के ही संस्था में नवीन तकनीकों को लागू करके कार्य कुशलता में वृद्धि की जा सकती है। अतः संगठन संरचना लोचशील होनी चाहिए। यदि संगठन संरचना में भावी आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन की व्यवस्था नहीं होगी तो संगठन अप्रभावशील हो जायेगा। (15) न्यूनतम सत्ता स्तरों का सिद्धान्त - ठोस एवं शीघ्र निर्णयन के लिए संगठन संरचना में सत्ता स्तरों को न्यूनतम किया जाना चाहिए। सत्ता स्तरों की निर्देश श्रृंखला लम्बी हो जाती है तो निम्न स्तर पर कार्यरत व्यक्ति की निर्देश प्राप्त होने में विलम्ब होने के साथ-साथ संदेशों की शुद्धता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। (16) अनुरूपता का सिद्धान्त - समान कार्य करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों एवं दायित्वों में भी एकरूपता होनी चाहिए जिसके कारण अधिकारों के टकराव समाप्त हो जायेंगे तथा निष्पादन में कुशलता आ जायेगी। (17) पदाधिकारियों से सम्पर्क का सिद्धान्त - एक उपक्रम में संगठन के विभिन्न स्तरों पर प्रबन्धकों में ऊपर से नीचे की ओर वरिष्ठता तथा अधीनता के क्रम में परस्पर सम्पर्क होना चाहिए। (18) निश्चितता का सिद्धान्त - संगठन के इस सिद्धान्त के अनुसार संस्था में कार्यरत व्यक्ति की प्रत्येक क्रिया न्यूनतम प्रयासों द्वारा अधिकतम कार्यकुशलता से निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान प्रदान करने वाली होनी चाहिए। इन्हें भी देखें संगठन श्रम विभाजन श्रेणी:संगठन