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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

देवीशंकर अवस्थी

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देवीशंकर अवस्थी (जन्म 1930, निधन 1966) परिचय देवीशंकर अवस्थी का जन्म 5 अप्रैल 1930 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गाँव सथनी बाला खेड़ा में, एक संयुक्त परिवार में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव तथा ननिहाल में हुई। ये 17 वर्ष की उम्र के थे तभी इनके पिता का देहावसान हो गया। बड़े होने के कारण इन्हें गम्भीर पारिवारिक स्थितियों के बीच दायित्वों का निर्वहन करते हुए अध्ययन को जारी रखना पड़ा। उच्च शिक्षा के लिए कानपुर गये। वहाँ डी.ए.वी. काॅलेज से 1953 में हिन्दी में एम॰ए॰(प्रथम श्रेणी) की डिग्री हासिल की और उसी वर्ष 23 अगस्त को वहीं हिन्दी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त हो गये।देवीशंकर अवस्थी (विनिबंध), देवीशंकर अवस्थी; साहित्य अकादेमी, संस्करण (प्रथम)-2004, पृ.112. कानपुर से ही उन्होंने 'कविता 1954' का अजित कुमार के साथ संपादन किया। 'कलजुग' पत्रिका निकाली तथा युगचेतना, ज्ञानोदय, नयी कहानियाँ आदि पत्रिकाओं में आलोचनात्मक लेखन आरम्भ हो गया। 1961 से जनवरी 1966 तक वे दिल्ली विश्वविद्यालय के सांध्यकालीन सत्र में प्राध्यापक रहे। 11 जनवरी 1966 को ही स्कूटर से अपने मित्र मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के साथ दरियागंज से अपने घर माॅडल टाउन लौटते हुए वे दुर्घटनाग्रस्त हो गये और गहन इलाज के बावजूद आइ.सी.यू. में दो दिन बेहोश रहने के बाद 13 जनवरी की सुबह उनका कारुणिक निधन हो गया। एक मेधावी नक्षत्र का मध्याह्न में ही अवसान हो गया।वही, पृ.115. जीवन के इतने कम वर्ष मिलने के बावजूद उन्होंने जितना और जैसा लिखा वह किसी को भी आश्चर्य से भरने वाला है। सृजन-वैविध्य देवीशंकर अवस्थी के चिन्तन और विवेचन का कैनवस अत्यन्त विस्तृत है। सैद्धान्तिक से लेकर व्यावहारिक आलोचना तक उत्तरोत्तर गूढ़ और चुनौतीपूर्ण सवालों से उन्होंने मुठभेड़ की है। कालिदास, निराला, प्रसाद, महादेवी वर्मा, प्रतापनारायण मिश्र और प्रेमचन्द से लेकर ग्रीक पौराणिक गाथाएँ तक उनकी लेखनी के प्रिय विषय रहे हैं। इनके साथ उनकी सरस आलोचनात्मक वृत्ति वृन्दावन, मथुरा, मैसूर, ताजमहल, रानीखेत, मसूरी आदि के सौन्दर्य में भी रमी है। पर उनके आलोचक का सबसे उल्लेखनीय गुण यह है कि वह नव्यता और समसामयिकता की चेतना से अनुप्राणित है। इसके चलते उनकी दृष्टि एक नयी ऊर्जा और सार्थकता से लैस है। यही चीज उन्हें हमेशा प्रासंगिक बनाये रखेगी।आलोचना का विवेक (देवीशंकर अवस्थी के अवदान पर एकाग्र), सं. राजेन्द्र कुमार; लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद; प्रथम संस्करण-2004, पृ.386. डाॅ. अवस्थी ने मुख्यतः अपने साहित्यालोचन द्वारा साहित्य की अनेक विधाओं को न्यूनाधिक मात्राओं में, पर मूल्यवान् ढंग से समृद्ध किया है—आलोचना, रंग-समीक्षा, कविता, नाटक, प्रहसन, कहानी, रिपोर्ताज, पत्र, डायरी आदि कुछ भी उनसे अछूती नहीं रही है। प्रकाशित कृतियाँ अवस्थी जी के जीवनकाल में उनकी एक ही मौलिक पुस्तक प्रकाशित हो पायी। शेष कृतियाँ उनके निधनोपरान्त उनकी पत्नी कमलेश अवस्थी जी के प्रयत्न से प्रकाशित हो पायीं। उनकी मौलिक तथा संपादित कृतियों की सूची इस प्रकार है :- (मौलिक) 1.आलोचना और आलोचना-1960 (अब वाणी प्रकाशन से) 2.रचना और आलोचना-1979 (अब वाणी प्रकाशन से) 3.आलोचना का द्वन्द्व-1999 (वाणी प्रकाशन से) 4.अठारहवीं शताब्दी के ब्रजभाषा काव्य में प्रेमाभक्ति (शोध-प्रबन्ध, हजारीप्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में 1960 में सम्पन्न) -1968 (अक्षर प्रकाशन) 5.विवेक के कुछ और रंग (विविध विषयक लेखों-टिप्पणियों का संग्रह) - 2002 (स्वराज प्रकाशन, नयी दिल्ली) 6.भक्ति का संदर्भ-2005 (वाणी प्रकाशन से) (संपादित) 1.कविताएँ : 1954 2.कहानी विविधा (राजकमल प्रकाशन से 43वाँ संस्करण 2016 में) 3.विवेक के रंग-1965 (अब वाणी प्रकाशन से) 4.नयी कहानी : सन्दर्भ और प्रकृति-1966 (अब राजकमल प्रकाशन से) 5.साहित्य विधाओं की प्रकृति (विश्व साहित्य के प्रमुख चिन्तकों-लेखकों के निबन्धों का संकलन-अनुवाद)-1981 (अब राधाकृष्ण प्रकाशन से) इनके अतिरिक्त पत्नी कमलेश अवस्थी को लिखे उनके पत्रों का संकलन 'हमको लिख्यो है कहा' नाम से प्रकाशित हुआ है तथा 'बहुवचन' अंक-20 में उनकी डायरी के अंश छपे हैं। विचार-वैशिष्ट्य देवीशंकर अवस्थी द्वारा 'विवेक के रंग' तथा 'नयी कहानी : सन्दर्भ और प्रकृति' के सम्पादन तथा भूमिका का ऐतिहासिक महत्त्व है, साथ ही चिर प्रासंगिक भी। अवस्थी जी पर भी रूपवादी प्रवृत्ति का आरोप लगाया गया है,वही, पृ.113. तथा हिन्दी कहानी : अस्मिता की तलाश, मधुरेश; आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा), पृ.323. परन्तु इस सन्दर्भ में ध्यातव्य है कि उन्होंने विचार या दृष्टि की उपेक्षा बिल्कुल नहीं की है बल्कि उसकी सफल कलात्मक अन्विति को रचना-साफल्य के लिए अनिवार्य माना है। उन्होंने तो रामस्वरूप चतुर्वेदी द्वारा कहानी के लिए भी कविता की तरह प्रतीक, बिम्ब आदि की सर्जनात्मक अनिवार्यता की माँग को ही खारिज कर दिया है। उनका स्पष्ट उद्देश्य कहानी-समीक्षा की स्वतंत्र पद्धति विकसित करने का था जो पूरा नहीं हो पाया परन्तु उनके कथन से उनका मन्तव्य स्पष्ट प्रतिबिम्बित हो जाता है -- "कथाकृति की पूरी समझ या व्याख्या के लिए उस जीवन की गहराई की माप आवश्यक है जहाँ से लेखक की कला-दृष्टि (और इसीलिए नैतिक दृष्टि भी) उदित होती है। इसीलिए भाषा वाली कसौटी की अपेक्षा अनुभव की दुर्निवारता या प्रामाणिकता की टोह के लिए प्रतीकों या बिम्बों का नहीं चरित्र-निर्माण क्षमता, कथानक-संघटन-शक्ति आदि का विश्लेषण ही कथा-समीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। कहना न होगा कि इसके लिए जिस समीक्षा-भाषा की आवश्यकता होगी वह कविता की भाषा से अलग ही होगी।"नयी कहानी : सन्दर्भ और प्रकृति, सं.देवीशंकर अवस्थी; राजकमल प्रकाशन, संस्करण-2008, पृ.21. सन्दर्भ श्रेणी:हिन्दी साहित्यकार श्रेणी:हिन्दी गद्यकार श्रेणी:हिंदी आलोचना श्रेणी:हिंदी आलोचक