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पद्मसिंह शर्मा
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मई 2022
पं. पद्मसिंह शर्मा (1876 ई0 - 1932 ई0) आर्य विचारक, दार्शनिक, समीक्षक, सम्पादक, परोपकारी, हिन्दी साहित्यकार, प्रसिद्ध लेखक और समालोचक थे। https://epustakalay.com/writer/6854-padamsingh-sharma/ पद्मसिंह शर्मा ई पुस्तकालय हिन्दी का सर्वोच्च पुरस्कार मंगलाप्रसाद पारितोषिक उन्हें ही सबसे पहले दिया गया। आपने हिन्दी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग के प्रधान पद को भी सुशोभित किया। वे द्विवेदी युग के गद्य लेखकों तथा समालोचकों में विशेष स्थान रखते थे।https://www.livehindustan.com/uttar-pradesh/bijnor/story-release-of-special-issue-on-pandit-padmasingh-sharma-a-pioneer-of-comparative-criticism-in-hindi-literature-201738781624362.html अविस्मरणीय है पं पद्मसिंह शर्मा का साहित्य में योगदान हिन्दुस्तान, बिजनौर 6 फ़रवरी 2025 वे संस्कृत भाषा के तो विशेष विद्वान थे ही, इसके साथ ही उन्हें उर्दू, फ़ारसी, बंगला और मराठी भाषाओं का भी अच्छा ज्ञान था।
उनकी लेखन शैली अनुपम थी। रेखाचित्र व संस्मरण इन दो विधाओं का प्रवर्तन हिन्दी में उन्होंने ही किया था। महाकवि अकबर और कविरत्न सत्यनारायण के जो संस्मरण उन्होंने लिखे हैं वे नये लेखकों को प्रेरणा व प्रकाश देने के लिए पर्याप्त हैं। उनकी लिखी हुई बिहारी-सतसई की टीका उनके ब्रजभाषा प्रेम का अनूठा उदाहरण है।
पं0 पद्मसिंह शर्मा जी का जन्म सन् 1876 ई0 दिन रविवार फाल्गुन सुदि 12 संवत् 1933 वि0 को बिजनौर के चांदपुर स्याऊ रेलवे स्टे्शन से चार कोस उत्तर की ओर नायक नामक छोटे से गाँव में हुआ।https://www.livehindustan.com/uttarakhand/haridwar/story-celebrating-149th-birth-anniversary-of-pandit-padamsingh-sharma-influential-writer-and-critic-201740489573265.html पंडित पद्मसिंह का लेखन बेहतरीन लाइव हिंदुस्तान 25 फ़रवरी 2025 इनके पिता श्री उमरावसिंह जी गाँव के मुखिया, प्रतिष्ठित, परोपकारी एवं प्रभावशाली पुरूष थे। पैतृक पेशा जमींदारी और खेती था। पिताजी के समय में खैंची-राव का काम भी होता था। आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। इनके पिता आर्यसमाजी विचारधारा के थे। स्वामी दयानन्द सरस्वती के प्रति उनकी अत्यन्त श्रद्धा थी। इसी कारण उनकी रूचि विशेष रूप से संस्कृत की ओर हुई। उन्हीं की कृपा से इन्होंने अनेक स्थानों पर रहकर स्वतंत्र रूप से संस्कृत का अध्ययन किया।
जब ये 10-11 वर्ष के थे तो इन्होंने अपने पिताश्री से ही अक्षराभ्यास किया। फिर मकान पर कई पण्डित अध्यापकों ये संस्कृत में सारस्वत, कौमुदी और रघुवंश आदि का अध्ययन किया।
सन् 1909 ई0 में इनका आगमन ज्वालापुर महाविद्यालय में हुआ। यहाँ इन्होंने ‘भारतोदय’ (महाविद्यालय का मासिक मुख्य पत्र) का सम्पादन एवं साथ ही अध्यापन कार्य किया। सन् 1911 ई0 में इन्होंने महाविद्यालय की प्रबन्ध-समिति के मन्त्री पद पर भी कार्य किया। इस प्रकार महाविद्यालय की अविरत सेवा करते रहे। इनके सम्पादकत्व में ‘भारतोदय’ पत्रिका ने खूब ख्याति प्राप्त की। सन् 1917 में इनके पिताजी का देहान्त हो गया। इस कारण इन्हें महाविद्यालय छोड़कर घर आना पड़ा। इस प्रकार महाविद्यालय के साथ इनका 9 वर्ष तक सम्बन्ध रहा। इनके अथक प्रयासों से महाविद्यालय निरन्तर उन्नति के पथ की और अग्रसर होता रहा।
महाविद्यालय छोड़ने के बाद शिवप्रसाद गुप्त के अनुरोध पर ये सन् 1918 में ‘ज्ञानमण्डल’ में गये।
'बिहारी सतसई की भूमिका', 'बिहारी सतसई संजीवन भाष्य'https://www.hindwi.org/ebooks/detail/bihari-satsai-sanjivanibhashya-padm-singh-sharma-ebooks बिहारी-सतसई संजीवनमाष्य अननोन आर्गेनाइजेशन , 'पद्मपुराण' और 'हिन्दी उर्दू हिन्दुस्तानी'https://www.rekhta.org/ebooks/detail/hindi-urdu-aur-hindustani-padm-singh-sharma-ebooks/?lang=hi हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी मिश्रा सुमन 1951 हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद उनके द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। 'संजीवन भाष्य' पर पद्मसिंह शर्मा को हिन्दी साहित्य सम्मेलन का 'मंगलाप्रसाद पारितोषिक' मिला था।
प्रशंसा करने और प्रोत्साहन देने में वे सिद्धहस्त थे। उन्होंने अपने इस देवगुण का प्रयोग व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कदापि नहीं किया, उसका प्रयोग उन्होंने लोकहित में किया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अच्छे लेखक बनाने का बहुत कुछ श्रेय उनके लेखन-गुरु पं. पद्मसिंह शर्मा को जाता है। पद्मसिंह जी ने सरस्वती की तरह अज्ञात रहकर हिन्दी को कई नये लेखक दिये। उन्होंने परिचयहीन रहकर निष्काम साधना को अधिक महत्व दिया।
कृतियाँ
निबंध
मुझे मेरे मित्रों से बचाओ
दयानन्द सरस्वती पर गए
हिन्दी के प्राचीन साहित्य का उद्धार ।
इन्हें भी देखें
गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर
बाहरी कड़ियाँ
पं. पद्मसिंह शर्मा और ‘भारतोदय’मई 2026 InternetArchiveBot
पद्मसिंह शर्मा
आर्यसमाज के सम्पर्क से पं. पद्मसिंह शर्मा संस्कृत के विद्वान, आचार्य एवं अनेक पत्रों के सम्पादक बने
सन्दर्भ
श्रेणी:हिन्दी साहित्यकार