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भगोरिया
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भगोरिया त्यौहार एक आदिवासी हाट (बाजार) है जो मध्य प्रदेश ,गुजरात और महाराष्ट्र में सीमाओं से लगे क्षेत्रों में मनाया जाता है।http://indianexpress.com/article/india/india-others/bhagoria-festival-to-get-r-day-platform-tribal-outfits-frown/ Bhagoria festival to get R-Day platform, tribal outfits frown Indian Express 23 January 2015 8 August 2015 भगोरिया मेल-मिलाप, आनन्द और उल्लास का उत्सव है। आदिवासी संस्कृति में भगोरिया से पहले उनकी संस्कृति अनुसार डांडा स्थापित (खड़ा)किया जाता है जो कि होलिका दहन के साथ डांडा गिर/पड़ (जल) जाता है।यानी इस डांडे के खड़े होने और पड़ या गिर जाने के बीच आदिवासी संस्कृति में कोई भी शादी का रिश्ता नहीं जोड़ा जाता या यूं कहे मंगनी नहीं कि जाती है। अगर पहले से ही बात बनी हुई हो तो युवक युवतियों को यह भगोरिया मेल-मिलाप एवं आमना सामने अभिव्यक्त करने का मौका देता है।यह मिथक है कि इसमें युवा अपनी पसंद के साथी को गुलाल लगाकर या पान खिलाकर अपने प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं। भगोरिया में मनपसंद के साथी के साथ भागकर विवाह करने की मान्यता अफवाह है।
center|450px|thumb|भगोरिया उत्सव
भगोरिया मेला मध्य प्रदेश के झाबुआ, आलीराजपुर, खरगौन, बड़वानी और धार के भील, भिलाला और बारेला जनजाति के लोगों द्वारा होली से सात दिन पहले मनाया जाने वाला सात दिवसीय प्रसिद्ध जनजातीय उत्सव है। वस्तुतः यह फसल कटाई का उत्सव है। भगोरिया में रंग-गुलाल लगाने, नृत्य-संगीत और खरीदारी करने की उदात्त भावनाएँ मुखरता से प्रदर्शित होती हैं।
फागुन महीने में जब चारों ओर प्रकृति में नया उल्लास होता हैं तब पश्चिम निमाड़ से झाबुआ तक के जनजातीय क्षेत्रों के साप्ताहिक हाट बाजार भगोरिया के रंग में रंगे होते हैं। मेले में हर तरफ फागुन और इन्द्रधनुषी प्रेम के रंग नज़र आते हैं। इन मेलों में मुख्य रूप से होली के लिए खरीददारी करने के लिए लोग आते हैं। गैर जनजातीय समुदाय के लिए भी भगौरिया के साप्ताहिक हाट बाजार विशिष्ट होते हैं। इसका सभी व्यापारियों को भी इंतजार रहता है। इसमें दुकानदार साल भर की कमाई, भगोरिया के साप्ताहिक बाजार से कर लेते हैं। भगोरिया हाट में जरूरत की वस्तुएं, मिठाइयाँ और पारंपरिक आभूषण बिकते हैं।
भगोरिया मेले में बड़े-बड़े ढोल और मांदल की थाप पर पारंपरिक आदिवासी नृत्य किया जाता है, जिसमें विभिन्न दल ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में भाग लेते हैं। वाद्य यंत्रों के साथ शामिल होने वाले विभिन्न दल एक ही रंग के वस्त्रों में अपनी अलग पहचान के साथ छटा बिखेरते हैं। महिलाओं के साथ पुरूष भी चांदी के आभूषणों से सज्जित होकर पारम्परिक वाद्य यंत्रों की ताल पर थिरकते हैं। चांदी के आभूषण भील जनजाति में समृद्धि के प्रतीक हैं।
center|thumb|450px|मध्य प्रदेश का भगोरिया नृत्य
इतिहास
दो भील राजाओं कासूमार औऱ बालून ने अपनी राजधानी भागोर में विशाल मेले औऱ हाट का आयोजन करना शुरू किया। धीरे-धीरे आस-पास के भील राजाओं ने भी इन्हीं का अनुसरण करना शुरू किया जिससे हाट और मेलों को भगोरिया कहना शुरू हुआ।https://www.naidunia.com/madhya-pradesh/dhar-dhar-news-5386854 कु क्षी में भगोरिया आज, दिखेंगे लोक संस्कृति के रंग - dhar news 2020-03-03 Nai Dunia hi 2023-10-21
वालपुर का प्रसिद्ध भगोरिया
आलीराजपुर जिले के वालपुर का भगोरिया मेला अपनी ऐतिहासिक प्राचीनता, आदिवासी संस्कृति के जीवंत रंगों और अनूठी पारंपरिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। किंवदंति है कि इस मेले की शुरुआत राजा भोज के समय में भील राजाओं द्वारा की गई थी। आलीराजपुर जिले के वालपुर में तीन प्रांतों की जनजातीय संस्कृति के रंग दिखाई देते हैं। यह स्थान तीन प्रांतों (मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, और गुजरात के निकट) की सांस्कृतिक संस्कृति का संगम स्थल होने के कारण भी विशेष जाना जाता है। वालपुर का मेला आदिवासी संस्कृति और आधुनिकता का एक अद्भुत मिश्रण है, जहाँ पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों के साथ, ढोल-मांदल की थाप पर आदिवासी युवा थिरकते हैं।
इन्हें भी देखें
वसन्तोत्सव
वसन्त
वसन्त पंचमी
होली
बाहरी कड़ियाँ
मदमाते मौसम में आदिवासियों का प्रणय-उत्सव 'भगोरिया'
'भगोरिया' मेले में घुले प्रेम के रंग
सन्दर्भ
श्रेणी:होली
श्रेणी:भारत के आदिवासी पर्व