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अभिसमयालंकार
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मैत्रेयनाथ ने 'प्रज्ञापारमिता' शास्त्र के आधार पर अभिसमयालंकार शास्त्र लिखा जो प्रज्ञापारमिता अथवा निर्वाण प्राप्त करने के मार्ग का उपदेश देता है। महायान में इस शास्त्र का अत्यधिक महत्त्व होना स्वाभाविक था क्योंकि उस संप्रदाय के अनुसार प्रज्ञापारमिता की साधना इसमें बताई गई है। इस ग्रन्थ का पूरा नाम है- अभिसमयालङ्कारनामप्रज्ञापारमितोपदेशशास्त्र ।
प्रज्ञापारमिता शब्द का प्रयोग निर्वाण और निर्वाण का मार्ग इन दोनों अर्थों में होता है। तदनुसार 'अभिसमय' के भी ये दो अर्थ हैं। किंतु साध्य की अपेक्षा साधना, जो साध्य तक ले जाती है, साधकों के लिए विशेष महत्त्व की वस्तु होती है; अतएव 'निर्वाण की साधना का मार्ग' अर्थ में ही विशेष रूप से 'अभिसमय' शब्द प्रचलित हो गया है। 'अभिसमय' के नाम से प्रसिद्ध ग्रंथों में साधनमार्ग का ही विशेष रूप से वर्णन मिलता है।
बौद्ध स्थविरवाद के सिद्धांतों का वर्णन 'अभिधर्म' के नाम से प्रसिद्ध है किंतु महायान के शून्यवादी माध्यमिक विकास के साथ ही प्रज्ञापारमिता को महत्त्व मिला और अधिभर्म के स्थान में 'अभिसमय' शब्द का व्यवहार, विशेषतः मैत्रेयनाथ के बाद होने लगा।
संदर्भ ग्रंथ
अभिसमयालंकार के विविध संपादन तथा अनुवाद;
ओवर मिलर: ऐक्टा ओरिएंटालिया, खंड 11;
कलकत्ता ओरिएंटल सिरीज़, सं. 27
बाहरी कड़ियाँ
श्रेणी:बौद्ध ग्रंथ