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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

दुष्यंत कुमार

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दुष्यंत कुमार परदेशी 27 सितम्बर 1931 उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के राजपुर नवादा गाँव में 30 दिसंबर 1975 भोपाल काव्य-रचना भारतीय हिंदी समकालीन कविता कविता, ग़ज़ल राजनीति, समाज और प्रेम साये में धूप दुष्यंत कुमार त्यागी (27 सितंबर 1933 – 30 दिसंबर 1975) एक हिन्दी कवि, कथाकार और ग़ज़लकार थे। किन्तु दुष्यन्त साहित्य के मर्मज्ञ विजय बहादुर सिंह के अनुसार कवि की वास्तविक जन्मतिथि 27 सितंबर 1931 है। दुष्यंत कुमार का जन्‍म उत्तर प्रदेश में बिजनौर जनपद की तहसील नजीबाबाद के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। जिस समय दुष्यंत कुमार ने साहित्य की दुनिया में अपने कदम रखे उस समय भोपाल के दो प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली तथा क़ैफ़ भोपाली का ग़ज़लों की दुनिया पर राज था। हिन्दी में भी उस समय अज्ञेय तथा गजानन माधव मुक्तिबोध की कठिन कविताओं का बोलबाला था। उस समय आम आदमी के लिए नागार्जुन तथा धूमिल जैसे कुछ कवि ही बच गए थे। इस समय सिर्फ़ 44 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की। उनके पिता का नाम भगवत सहाय और माता का नाम रामकिशोरी देवी था। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला (गीतकार इन्‍द्रदेव भारती के पिता पं चिरंजीलाल के सानिन्‍ध्‍य में) तथा माध्यमिक शिक्षा नहटौर(हाईस्कूल) और चंदौसी(इंटरमीडिएट) से हुई। दसवीं कक्षा से कविता लिखना प्रारम्भ कर दिया। इंटरमीडिएट करने के दौरान ही राजेश्वरी कौशिक से विवाह हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में बी॰ए॰ और एम॰ए॰ किया। डॉ॰ धीरेन्द्र वर्मा और डॉ॰ रामकुमार वर्मा का सान्निध्य प्राप्त हुआ। कथाकार कमलेश्वर और मार्कण्डेय तथा कविमित्रों धर्मवीर भारती, विजयदेवनारायण साही आदि के संपर्क से साहित्यिक अभिरुचि को नया आयाम मिला। मुरादाबाद से बी॰एड॰ करने के बाद 1958 में आकाशवाणी दिल्ली में आये। मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के अंतर्गत भाषा विभाग में रहे। आपातकाल के समय उनका कविमन क्षुब्ध और आक्रोशित हो उठा जिसकी अभिव्यक्ति कुछ कालजयी ग़ज़लों के रूप में हुई, जो उनके ग़ज़ल संग्रह 'साये में धूप' का हिस्सा बनीं। सरकारी सेवा में रहते हुए सरकार विरोधी काव्य रचना के कारण उन्हें सरकार का कोपभाजन भी बनना पड़ा। 30 दिसंबर 1975 की रात्रि में हृदयाघात से उनकी असमय मृत्यु हो गई। उन्हें मात्र 44 वर्ष की अल्पायु मिली। 1975 में उनका प्रसिद्ध ग़ज़ल संग्रह'साये में धूप' प्रकाशित हुआ। इसकी ग़ज़लों को इतनी लोकप्रियता हासिल हुई कि उसके कई शेर कहावतों और मुहावरों के तौर पर लोगों द्वारा व्यवहृत होते हैं। 52 ग़ज़लों की इस लघुपुस्तिका को युवामन की गीता कहा जाय, तो अत्युक्ति नहीं होगी। इसमें संगृहीत कुछ प्रमुख शेर हैं- यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए। मत कहो आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। खास सड़कें बंद हैं कबसे मरम्मत के लिए, ये हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है। मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के कदम, तू न समझेगा सियासत तू अभी इंसान है। कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए, मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है। होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए, इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिए। गूँगे निकल पड़े हैं जुबाँ की तलाश में, सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए। एक जंगल है तेरी आँखों में, मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ। तू किसी रेल-सी गुजरती है, मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ। निदा फ़ाज़ली उनके बारे में लिखते हैं <blockquote>"दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है। "</editquote> पारिवारिक जीवन माता का नाम रामकिशोरी देवी था। पिता का नाम चौधरी भगवत सहाय था। 30 नवंबर 1949 को दुष्यंत कुमार का विवाह राजेश्वरी कौशिक से हुआ। कृतियाँ एक कंठ विषपायी 1963(काव्य नाटक) और मसीहा मर गया (नाटक) सूर्य का स्वागत, आवाज़ों के घेरे, जलते हुए वन का बसंत (काव्य संग्रह) छोटे-छोटे सवाल, आँगन में एक वृक्ष, दुहरी जिंदगी (उपन्यास) मन के कोण (लघुकथाएँ) साये में धूप (ग़ज़ल संग्रह) कविताकाव्य नाटिकानाट्यगजलछोटी कहानियाँउपन्यासपत्रिकाकहाँ तो तय थाएक कण्ठ विषपायीऔर मसीहा मर गयासाये में धूपमन के कोणछोटे-छोटे सवालविहान कैसे मंजरआँगन में एक वृक्षखंडहर बचे हुए हैंदुहरी जिंदगीजो शहतीर हैज़िंदगानी का कोई मकसदमुक्तकआज सड़कों पर लिखे हैंमत कहो, आकाश मेंधूप के पाँवगुच्छे भर अमलताससूर्य का स्वागतआवाजों के घेरेजलते हुए वन का वसन्तआज सड़कों परआग जलती रहेएक आशीर्वादआग जलनी चाहिएमापदण्ड बदलोकहीं पे धूप की चादरबाढ़ की संभावनाएँइस नदी की धार मेंआवाज़ होनी चाहिएकौन कहता है आसमान में हो गई है पीर पर्वत-सी तू किसी रेल सी गुज़रती है प्रमुख कविताएँ 'कहाँ तो तय था', 'कैसे मंजर', 'खंडहर बचे हुए हैं', 'जो शहतीर है', 'ज़िंदगानी का कोई', 'मकसद', 'मुक्तक', 'आज सड़कों पर लिखे हैं', 'मत कहो, आकाश में', 'धूप के पाँव', 'गुच्छे भर', 'अमलतास', 'सूर्य का स्वागत', 'आवाजों के घेरे', 'जलते हुए वन का वसन्त', 'आज सड़कों पर', 'आग जलती रहे', 'एक आशीर्वाद', 'आग जलनी चाहिए', 'मापदण्ड बदलो', 'कहीं पे धूप की चादर', 'बाढ़ की संभावनाएँ', 'इस नदी की धार में', 'हो गई है पीर पर्वत-सी'। बाहरी कड़ियाँ दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें - रेख़्ता पर दुष्यंत कुमार को उनके ७५वें जन्मदिन पर याद करते हुए निदा फ़ाज़ली - बीबीसी हिन्दी पर दुष्यंत कुमार की कविताएँ तथा ग़जलें - कविता कोश पर दुष्यंत कुमार की कविताएँ तथा ग़जलें - अनुभूति पर दुष्यंत कुमार की कविताये तथा गजले - https://web.archive.org/web/20200713081320/https://luiehindi.com/kaise-aksah-me-surakh-nahi-ho-sakta/ 13 जुलाई 2020 सत्ता के अन्याय के खिलाफ बागी तेवरों की दबंग आवाज़ दुष्यंत कुमार श्रेणी:हिन्दी ग़ज़लकार श्रेणी:भारतीय साहित्यकार श्रेणी:बिजनौर ज़िले के लोग