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सेठ गोविंद दास
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सेठ गोविंद दास काका साहिब y 1896 10 16 1974 06 18 1896 10 16 मुम्बई, महाराष्ट्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस India जबलपुर सुशील कुमार पटेरिया शरद यादव १९५१ १९७४ रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर भारत राजनेता, लेखक राजा जीवन दास पार्वतीबाई गोदावरी बाई २ बेटे जगमोहनदास व मनमोहनदास तथा २ बेटियां रत्नाकुमारी व पद्मा http://www.gokuldas.com/sg/ २६ जून २०१६ http://164.100.47.194/loksabha/writereaddata/biodata_1_12/730.htm प्रोफ़ाइल लोक सभा 9 अगस्त 2018 https://web.archive.org/web/20180808202905/http://164.100.47.194/loksabha/writereaddata/biodata_1_12/730.htm 8 अगस्त 2018 dead
सेठ गोविन्ददास (1896 – 1974) भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सांसद तथा हिन्दी के साहित्यकार थे। उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन १९६१ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। भारत की राजभाषा के रूप में हिन्दी के वे प्रबल समर्थक थे। वे हिन्दी के अनन्य साधक, भारतीय संस्कृति में अटल विश्वास रखने वाले, कला-मर्मज्ञ एवं विपुल मात्रा में साहित्य-रचना करने वाले, हिन्दी के उत्कृष्ट नाट्यकार ही नहीं थे, अपितु सार्वजनिक जीवन में अत्यंत् स्वच्छ, नीति-व्यवहार में सुलझे हुए, सेवाभावी राजनीतिज्ञ भी थे।
सन १९४८ में अबोहर में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन के 36वें अधिवेशन की उन्होने अध्यक्षता की थी जिसमें अन्य भाषाओं के साहित्यकार भी सम्मिलित हुए थे। इस सम्मेलन में देवनागरी में लिखी जाने वाली हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया था।
सेठ गोविंद दास का इस सम्मेलन की अध्यक्षता करना भारतीय भाषाई इतिहास में एक युगांतरकारी घटना मानी जाती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल पश्चात आयोजित इस अधिवेशन ने राष्ट्रभाषा के स्वरूप और दिशा को निर्धारित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस सम्मेलन की सबसे महती उपलब्धि देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को भारत की राजभाषा (Official Language) के रूप में प्रतिष्ठित करने का दृढ़ संकल्प था। सेठ गोविंद दास ने उद्घोष किया था कि बिना अपनी भाषा के स्वतंत्रता अधूरी है। इसी अधिवेशन के माध्यम से यह संदेश संविधान सभा तक पहुँचाया गया कि भारत की सांस्कृतिक एकता के लिए हिंदी अपरिहार्य है। परिणामतः, संविधान के अनुच्छेद 343 के अंतर्गत हिंदी को राजभाषा का गौरव प्राप्त हुआ। इस सम्मेलन ने स्पष्ट किया कि हिंदी मात्र संवाद का माध्यम नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता की संवाहिका है। सेठ जी ने पाश्चात्य भाषा के प्रभुत्व को समाप्त कर भारतीय भाषाओं के पुनरुत्थान पर बल दिया।
स्वतंत्र भारत का यह परम कर्तव्य है कि वह अपनी आत्मा की अभिव्यक्ति अपनी ही भाषा में करे। — सेठ गोविंद दास (अबोहर अधिवेशन का सारांश)
सेठ गोविंद दास ने जीवनपर्यंत संसद से लेकर साहित्य मंचों तक हिंदी के लिए जो संघर्ष किया, उसे 'हिंदी का महायुद्ध' भी कहा जाता है।
सन् १९४७ से १९७४ तक वे जबलपुर से सांसद रहे। वे महात्मा गांधी के निकट सहयोगी थे। उनको दमोह में आठ माह का कारावास झेलना पड़ा था जहाँ उन्होने चार नाटक लिखे- "प्रकाश" (सामाजिक), "कर्तव्य" (पौराणिक), "नवरस" (दार्शनिक) तथा "स्पर्धा" (एकांकी)।
परिचय
सेठ गोविन्द दास का जन्म संवत 1953 (सन् 1896) को विजयादशमी के दिन जबलपुर के प्रसिद्ध माहेश्वरी व्यापारिक परिवार में राजा गोकुलदास के यहाँ हुआ था। राज परिवार में पले-बढ़े सेठजी की शिक्षा-दीक्षा भी उच्च कोटि की हुई। अंग्रेजी भाषा, साहित्य और संस्कृति ही नहीं, स्केटिंग, नृत्य, घुड़सवारी का जादू भी इन पर चढ़ा।
तभी गांधीजी के असहयोग आंदोलन का तरुण गोविन्ददास पर गहरा प्रभाव पड़ा और वैभवशाली जीवन का परित्याग कर वे दीन-दुखियों के साथ सेवकों के दल में शामिल हो गए तथा दर-दर की ख़ाक छानी, जेल गए, जुर्माना भुगता और सरकार से बगावत के कारण पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकार भी गंवाया।सेठ गोविंद दास ने देश और हिन्दी के लिए समस्त वैभव का त्याग कर दिया
उपन्यास
सेठजी पर देवकीनंदन खत्री के तिलस्मी उपन्यासों 'चन्द्रकांता संतति' की तर्ज पर उन्होंने 'चंपावती', 'कृष्ण लता' और 'सोमलता' नामक उपन्यास लिखे, वह भी मात्र सोलह वर्ष की किशोरावस्था में।
साहित्य में दूसरा प्रभाव सेठजी पर शेक्सपीयर का पड़ा। शेक्सपीयर के 'रोमियो-जूलियट', 'एज़ यू लाइक इट', 'पेटेव्कीज प्रिंस ऑफ टायर' और 'विंटर्स टेल' नामक प्रसिद्ध नाटकों के आधार पर सेठजी ने 'सुरेन्द्र-सुंदरी', 'कृष्ण कामिनी', 'होनहार' और 'व्यर्थ संदेह' नामक उपन्यासों की रचना की। इस तरह सेठजी की साहित्य-रचना का प्रारम्भ उपन्यास से हुआ। इसी समय उनकी रुचि कविता में बढ़ी। अपने उपन्यासों में तो जगह-जगह उन्होंने काव्य का प्रयोग किया ही, 'वाणासुर-पराभव' नामक काव्य की भी रचना की।
नाटक
सन् 1917 में सेठजी का पहला नाटक 'विश्व प्रेम' छपा। उसका मंचन भी हुआ। प्रसिद्ध विदेशी नाटककार इब्सन से प्रेरणा लेकर आपने अपने लेखन में आमूल-चूल परिवर्तन कर डाला। उन्होंने नई तकनीक का प्रयोग करते हुए प्रतीक शैली में नाटक लिखे। 'विकास' उनका स्वप्न नाटक है। 'नवरस' उनका नाट्य-रुपक है। हिन्दी में मोनो ड्रामा पहले-पहल सेठजी ने ही लिखे।
हिन्दी भाषा की हित-चिन्ता में तन-मन-धन से संलग्न सेठ गोविंददास हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अत्यन्त सफल सभापति सिद्ध हुए। हिन्दी के प्रश्न पर सेठजी ने कांग्रेस की नीति से हटकर संसद में दृढ़ता से हिन्दी का पक्ष लिया। वह हिन्दी के प्रबल पक्षधर और भारतीय संस्कृति के संवाहक थे।
बाहरी कड़ियाँ
हिंदी दिवसः हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने के बड़े पैरोकार- सेठ गोविंद दास
अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले सेठ गोविन्ददास
कुलीनता (शेठ गोविन्ददास स्वारा रचित तीन अंकों का नाटक)जून 2020 InternetArchiveBot (भारतीय अंकीय पुस्तकालय)
हिन्दी हित संरक्षक सेठ गोविन्ददास (संजीव 'सलिल')
Seth Govind Das
The Commercial Kingdom of Raja Gokuldas Colonial Administration and Social Developments in Middle India: The Central Provinces, 1986-1921. Ph. D. 1980 dissertation by Philip McEldowney
सन्दर्भ
श्रेणी:१९६१ पद्म भूषण
श्रेणी:मध्य प्रदेश के लोग
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श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी
श्रेणी:जबलपुर के लोग
श्रेणी:हिन्दीसेवी