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वायु पुराण
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वायु पुराण 220px डायमंड बुक नामक प्रकाशक द्वारा प्रकाशित आवरण पृष्ठ वेदव्यास डायमंड बुक भारत संस्कृत तथा हिन्दी अनुवाद पुराण शिव, भक्ति शिव पूजा प्रकरण पर आधारित पुराण ११,००० श्लोक
इस पुराण में शिव उपासना चर्चा अधिक होने के कारण इस को शिवपुराण का दूसरा अंग माना जाता है, फिर भी इसमें वैष्णव मत पर विस्तृत प्रतिपादन मिलता है। इसमें खगोल, भूगोल, सृष्टिक्रम, युग, तीर्थ, पितर, श्राद्ध, राजवंश, ऋषिवंश, वेद शाखाएं, संगीत शास्त्र, शिवभक्ति, आदि का सविस्तार निरूपण है।शिव ही सृष्टि के आदि पिता और माता पार्वती आदि माता है, उनके मिलन से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है, ब्राह्मण शिव का ज्ञानी रूप है, क्षत्रिय बलिष्ठ रूप, वैश्य पेटपालक और शूद्र मेहनती, लगानशील और शिव का रूद्र अवतार है।अतः सभी को शिव को निर्विवाद रूप से पूजना चाहिए।
विस्तार
इस पुराण में इसमें ११२ अध्याय एवं ११,००० श्लोक हैं।(इसकी श्लोक संख्या के बारे में विद्वान एकमत नहीं हैं । वायु पुराण के १०४ अध्याय में १८ पुराणों की श्लोक संख्या वर्णित है, इसके अनुसार वायु पुराण में २३,००० श्लोक थे । आचार्य कपिल द्विवेदी जी यह संख्या १०,००० मानते हैं ) लोग 'वायु पुराण' को स्वतन्त्र पुराण न मानकर 'शिव पुराण' और 'ब्रह्माण्ड पुराण' का ही अंग मानते हैं। परन्तु 'नारद पुराण' में जिन अठारह पुराणों की सूची दी गई हैं, उनमें 'वायु पुराण' को स्वतन्त्र पुराण माना गया है।ब्रज डिस्कवरी
वायु पुराण की संक्षिप्त जानकारी
इस पुराण में वायुदेव ने श्वेतकल्प के प्रसंगों में धर्मों का उपदेश किया है। इसलिये इसे वायु पुरण कहते है। यह पूर्व और उत्तर दो भागों से युक्त है। जिसमें सर्ग आदि का लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है, जहां भिन्न भिन्न मन्वन्तरों में राजाओं के वंश का वर्णन है और जहां गयासुर के वध की कथा विस्तार के साथ कही गयी है, जिसमें सब मासों का माहात्मय बताकर माघ मास का अधिक फ़ल कहा गया है जहां दान दर्म तथा राजधर्म अधिक विस्तार से कहे गये हैं, जिसमें पृथ्वी पाताल दिशा और आकाश में विचरने वाले जीवों के और व्रत आदि के सम्बन्ध में निर्णय किया गया है, वह वायुपुराण का पूर्वभाग कहा गया है। मुनीश्वर ! उसके उत्तरभाग में नर्मदा के तीर्थों का वर्णन है, और विस्तार के साथ शिवसंहिता कही गयी है जो भगवान सम्पूर्ण देवताओं के लिये दुर्जेय और सनातन है, वे जिसके तटपर सदा सर्वतोभावेन निवास करते है, वही यह नर्मदा का जल ब्रह्मा है, यही विष्णु है, और यही सर्वोत्कृष्ट साक्षात शिव है। यह नर्मदा जल ही निराकार ब्रह्म तथा कैवल्य मोक्ष है, निश्चय ही भगवान शिवने समस्त लोकों का हित करने के लिये अपने शरीर से इस नर्मदा नदी के रूप में किसी दिव्य शक्ति को ही धरती प्रर उतारा है। जो नर्मदा के उत्तर तट पर निवास करते है, वे भगवान रुद्र के अनुचर होते है, और जिनका दक्षिण तट पर निवास है, वे भगवान विष्णु के लोकों में जाते है, ऊँकारेश्वर से लेकर पश्चिम समुद्र तट तक नर्मदा नदी में दूसरी नदियों के पैतीस पापनाशक संगम है, उनमे से ग्यारह तो उत्तर तटपर है, और तेईस दक्षिण तट पर। पैंतीसवां तो स्वयं नर्मदा और समुद्र का संगम कहा गया है, नर्मदा के दोनों किनारों पर इन संगमों के साथ चार सौ प्रसिद्ध तीर्थ है। मुनीश्वर ! इनके सिवाय अन्य साधारण तीर्थ तो नर्मदा के पग पग पर विद्यमान है, जिनकी संख्या साठ करोड साठ हजार है। यह परमात्मा शिव की संहिता परम पुण्यमयी है, जिसमें वायुदेवता ने नर्मदा के चरित्र का वर्णन किया है, जो इस पुराण को सुनता है या पढता है, वह शिवलोक का भागी होता है।
सन्दर्भ
बाहरी कडियाँ
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