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प्रकाशानन्द
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प्रकाशानन्द (संस्कृत: प्रकाशानन्द), जिन्हें प्रकाशानन्द याति भी कहा जाता है, सोलहवीं शताब्दी के भारतीय दार्शनिक थे (लगभग १५५०–१६००), जो अद्वैत वेदान्त परम्परा से सम्बद्ध थे। वे विशेषतः दृष्टि-सृष्टि-वाद (dṛṣṭi-sṛṣṭi-vāda) नामक आमूल आदर्शवादी सिद्धान्त के लिए विख्यात हैं, जिसके अनुसार किसी वस्तु का अस्तित्व उसकी अनुभूति से अभिन्न है — अनुभव से परे कोई स्वतन्त्र जगत् नहीं है।
जीवनी
प्रकाशानन्द के विषय में विस्तृत जीवनीपरक सूचनाएँ उपलब्ध नहीं हैं। परम्परागत स्रोतों के अनुसार वे ज्ञानानन्द याति के शिष्य थे और सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में काशी (वाराणसी) क्षेत्र में सक्रिय थे। उनके शिष्य भारत के अनेक प्रदेशों में फैले, जो उनके दर्शन के व्यापक प्रभाव को प्रमाणित करता है।(en) "Prakāśānanda Yati", Hindupedia, The Hindu Encyclopedia, 17 दिसम्बर 2016।
चैतन्य-चरितामृत में उल्लिखित माया-वादी सन्न्यासी प्रकाशानन्द सरस्वती (वाराणसी) से इनका भ्रम नहीं होना चाहिए; अधिकांश विद्वान इन्हें दो भिन्न व्यक्ति मानते हैं।(en) Prabodhānanda and Prakāśānanda, Bhaktivinoda Institute।
दार्शनिक सिद्धान्त
दृष्टि-सृष्टि-वाद
प्रकाशानन्द ने वेदान्त की एक नितान्त आदर्शवादी और विषयवादी व्याख्या प्रस्तुत की। उनके मतानुसार:मार्टिन शिफ्लो (अनु॰, प्रस्तुति एवं टिप्पणी), Le collier de perles des doctrines du Vedānta, पेरिस, L'Harmattan, २००५।
जगत् के पदार्थों का अस्तित्व उनकी प्रत्यक्षानुभूति से अभिन्न है; मन से स्वतन्त्र कोई बाह्य वस्तु नहीं।
माया कोई सत्तावाची पदार्थ नहीं, अपितु वह नितान्त कल्पित (tuccha) है।
जगत् की कोई वास्तविक कारण-प्रक्रिया नहीं — सब कुछ आत्मगत है।
एकमात्र परमसत्य आत्मा-ब्रह्म है।
यह अत्यन्त कठोर दार्शनिक स्थिति ब्रह्म और किसी 'सघन' माया के बीच शेष द्वैत को सर्वथा समाप्त करने के उद्देश्य से प्रतिपादित की गई थी। यह सिद्धान्त प्रकाशात्मन् या सर्वज्ञात्ममुनि जैसे आचार्यों द्वारा समर्थित माया की अपेक्षाकृत 'यथार्थवादी' अवधारणाओं का विरोध करता है।
शङ्कराचार्य और विज्ञानवाद से सम्बन्ध
प्रकाशानन्द की वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली शङ्कर के ब्रह्मसूत्रभाष्य के आठ शताब्दी बाद रची गई। शङ्कर को सृष्टि की सापेक्षिक सत्ता स्थापित करने के लिए हिरण्यगर्भ और विराट् जैसी मध्यवर्ती कॉस्मिक सत्ताओं की कल्पना करनी पड़ती थी। प्रकाशानन्द ने एकजीव-सिद्धान्त के आधार पर इन सभी मध्यवर्ती पदों को अस्वीकार कर दिया: ब्रह्म स्वयं अपनी अज्ञान-शक्ति से जीव बन जाता है, किसी मध्यस्थ के बिना।मार्टिन शिफ्लो, Le collier de perles des doctrines du Vedānta, पेरिस, L'Harmattan, २००५, पृ॰ १७ एवं २३।
एक विशेष बिन्दु पर प्रकाशानन्द अपने पूर्ववर्ती से भी अधिक मूलगामी हैं। शङ्कर ने जाग्रत-अवस्था को स्वप्न-अवस्था के समकक्ष मानने से अस्वीकार किया था — यही योगाचार के बौद्ध विज्ञानवादियों के विरुद्ध उनके ब्रह्मसूत्रभाष्य (II, २, २७-३२) में खण्डन का आधार था। प्रकाशानन्द इस समकक्षता को स्वीकार करते हैं और शङ्कर के त्रि-स्तरीय सत्ता-भेद (पारमार्थिक, व्यावहारिक, प्रातिभासिक) को अज्ञानियों के लिए की गई रियायत मात्र बताते हैं।मार्टिन शिफ्लो, Le collier de perles des doctrines du Vedānta, पेरिस, L'Harmattan, २००५, पृ॰ २३।
यद्यपि यह स्थिति उन्हें बौद्ध विज्ञानवाद के निकट करती प्रतीत होती है, तथापि एक मौलिक भेद बना रहता है: जहाँ विज्ञानवाद शून्यता को परम सत्य मानता है, वहाँ प्रकाशानन्द आत्मा-ब्रह्म की पूर्ण और प्रकाशमय सत्ता (pūrṇa) का प्रतिपादन करते हैं। वेदान्तिक दर्शन पूर्ण (pūrṇa) को शून्य (śūnya) से सख्ती से पृथक् करता है।मार्टिन शिफ्लो, Le collier de perles des doctrines du Vedānta, पेरिस, L'Harmattan, २००५, पृ॰ १६, टिप्पणी २१।
एकजीव-वाद
प्रकाशानन्द एकजीव-वाद (ekajīvavāda) के प्रमुख प्रतिपादक हैं — वह सिद्धान्त जिसके अनुसार केवल एक ही जीव (व्यक्तिगत आत्मा) वास्तव में विद्यमान है। तत्त्व-मितव्ययिता के सिद्धान्त के अनुसार अज्ञान भी एकमात्र है, और एक उपाधि के रूप में उसी एकमात्र जीव को नियत करता है: एक अज्ञान, एक जीव।मार्टिन शिफ्लो, Le collier de perles des doctrines du Vedānta, पेरिस, L'Harmattan, २००५, पृ॰ २४।
गुरु की कल्पित सत्ता
दृष्टि-सृष्टि-वाद एक आन्तरिक कठिनाई उत्पन्न करता है: यदि समस्त प्रकट जगत् स्वप्नवत् है, तो श्रुति द्वारा अपेक्षित गुरु की क्या स्थिति है? प्रकाशानन्द ने वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली के श्लोक ४२ में कल्पितोऽपि गुरु (कल्पित गुरु) की अवधारणा द्वारा इसका समाधान किया। गुरु केवल शिष्य के अज्ञान की सीमा तक विद्यमान रहता है और मोक्ष-प्राप्ति के साथ ही अद्वैत में विलीन हो जाता है — इस प्रकार गुरु-शिष्य की यह परम्परा अद्वैत सिद्धान्त की पुष्टि करती है, उसका खण्डन नहीं।प्रकाशानन्द, वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली, श्लोक ४२; उद्धृत एवं अनूदित — मार्टिन शिफ्लो, Le collier de perles des doctrines du Vedānta, पेरिस, L'Harmattan, २००५, पृ॰ १९४–१९६।
पश्चिमी दर्शन से तुलना: प्रकाशानन्द और बर्कले
यह दार्शनिक दृष्टि से उल्लेखनीय है कि प्रकाशानन्द का दृष्टि-सृष्टि-वाद पश्चिमी दर्शन में आयरिश दार्शनिक जार्ज बर्कली (१६८५–१७५३) के esse est percipi — "होना अर्थात् प्रत्यक्षित होना" — सिद्धान्त से गहरी समानता रखता है। बर्कले ने यह मत अपने ग्रन्थ Principles of Human Knowledge (१७१०) में प्रतिपादित किया।
किन्तु यह तथ्य विचारणीय है कि प्रकाशानन्द का यह सिद्धान्त बर्कले से डेढ़ शताब्दी पूर्व प्रकट हुआ — और यह भारतीय वेदान्त-परम्परा के सर्वथा आन्तरिक तार्किक विकास का फल था, न कि किसी पाश्चात्य प्रभाव का। शङ्कर (आठवीं शताब्दी) से लेकर प्रकाशानन्द (सोलहवीं शताब्दी) तक फैली यह दार्शनिक यात्रा — गौडपाद, मण्डन मिश्र और अन्य आचार्यों से होती हुई — उन्हीं आधारभूत निष्कर्षों पर पहुँची जिन्हें पश्चिम में बर्कले ने दो शताब्दी बाद स्वतन्त्र रूप से प्रस्तुत किया।
फ्रांसीसी संस्कृतविद् और दार्शनिक मार्टिन शिफ्लो — जिन्होंने वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली का फ्रांसीसी अनुवाद किया है और जिन्होंने पेरिस IV - सोर्बोन विश्वविद्यालय में बर्कले और प्रकाशानन्द की तुलना पर शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत किया — ने इन दोनों परम्पराओं के साम्य और उनके स्वतन्त्र विकास को रेखांकित किया है। उनके अनुसार यह समानता एक "कॉपर्निकन क्रान्ति" के समकक्ष है जिसे भारतीय दर्शन ने अपनी आन्तरिक तर्क-शक्ति से बहुत पहले सम्पन्न कर लिया था।मार्टिन शिफ्लो, « La libération selon le Yoga et le Védānta », L'Enseignement philosophique, खण्ड ७२, अंक ४, १६ नवम्बर २०२२, पृ॰ ३५–४६ (DOI 10.3917/eph.725.0035)। तथा उनकी Le collier de perles des doctrines du Vedānta, पेरिस, L'Harmattan, २००५।
रचनाएँ
उनकी प्रमुख कृति वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली (Vedāntasiddhāntamuktāvalī) है — अद्वैत वेदान्त पर एक सारगर्भित ग्रन्थ। इस पर उनके शिष्य नानादीक्षित ने सिद्धान्तदीपिका नामक टीका लिखी। ग्रन्थ की संरचना द्वन्द्वात्मक (dialectical) है: विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों के आपत्तिकर्ताओं के प्रश्न द्वैत-बद्ध बुद्धि के अवरोधों का प्रतीक हैं, और प्रत्येक आपत्ति का क्रमशः निराकरण होता है जब तक कि मोक्ष में समस्त विवाद स्वतः समाप्त न हो जाए — नात्र विवदितव्यम् ("यहाँ अब विवाद नहीं करना चाहिए")।वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली, श्लोक ५८ की टीका; उद्धृत — मार्टिन शिफ्लो, Le collier de perles des doctrines du Vedānta, पेरिस, L'Harmattan, २००५, पृ॰ १७।
प्रमुख संस्करण एवं अनुवाद:
संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद : अनु॰ श्री प्रेम वल्लभ शास्त्री; सम्पा॰ श्री चण्डी प्रसाद शुक्ल एवं श्री कृष्ण पन्त शास्त्री; प्रका॰ श्री गौरीशङ्कर गोयनका, आच्युत ग्रन्थमाला कार्यालय, काशी, विक्रम संवत् १९९३ (~१९३६ ई॰)। archive.org पर उपलब्धVedanta Siddhanta Muktavali (with Hindi Translation), अनु॰ Shri Prem Vallabh Shastri, Achyut Grantha Mala Office, Kashi, Vikram Samvat 1993 (~1936)। archive.org पर उपलब्ध।
अंग्रेजी अनुवाद (संस्कृत पाठ एवं टिप्पणी सहित) : आर्थर वेनिस, बनारस, १८९८; पुनर्मुद्रण — चौखम्बा, वाराणसी, १९७५। archive.org पर उपलब्धThe Vedānta Siddhāntamuktāvalī of Prakāśānanda, अनु॰ Arthur Venis, Benares, 1898; repr. Caukhambha, Varanasi, 1975।
फ्रांसीसी अनुवाद एवं प्रस्तुति : मार्टिन शिफ्लो, Le collier de perles des doctrines du Vedānta, L'Harmattan, पेरिस, २००५। (ISBN 978-2-7475-8466-1)मार्टिन शिफ्लो, Le collier de perles des doctrines du Vedānta : Vedāntasiddhāntamuktāvalī, पेरिस, L'Harmattan, २००५।
अन्य कृतियाँ जो शाक्त-तान्त्रिक रुचि को प्रकट करती हैं:
तारा-भक्ति-तरङ्गिणी
मनोरमा (तन्त्रराज-टीका)
महालक्ष्मी-पद्धति
परवर्ती प्रभाव
प्रकाशानन्द शङ्करोत्तर अद्वैत-वेदान्त के इतिहास में दृष्टि-सृष्टि-वाद के सर्वाधिक कट्टर प्रतिपादक के रूप में विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनके दर्शन की परवर्ती अद्वैती विचारकों द्वारा चर्चा और कभी-कभी आलोचना भी की गई है।Surendranath Dasgupta, A History of Indian Philosophy, खण्ड २, Cambridge University Press, १९३२ (प्रकाशानन्द पर अनुभाग)।T. P. Ramachandran, "Prakāśānanda", in Preceptors of Advaita, सम्पा॰ T. M. P. Mahadevan।
सन्दर्भ
यह भी देखें
अद्वैत वेदान्त
माया (हिन्दू दर्शन)
आदि शंकराचार्य
जॉर्ज बर्कले
श्रेणी:अद्वैत वेदान्त के दार्शनिक
श्रेणी:भारतीय दार्शनिक
श्रेणी:16वीं शताब्दी के दार्शनिक
श्रेणी:संस्कृत लेखक