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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

धृष्टद्युम्न

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शाशवथी, शशिरेखा, अजवंती और धनुमती और कई अन्य पत्नियां (१०१ पत्नियां) द्रौपदी,(बहन) शिखंडी ,सत्यजीत,उत्तमानुज,युद्धमन्यु,प्रियदर्शन, सुमित्र,चित्रकेतु,सुकेतु, ध्वजकेतु,वीरकेतु ,सुरथ एवं शत्रुंजय द्रुपद (पिता) पांचाल धनुष बाण और खंडग क्षत्रिय राजा महाभारत यज्ञसेनी , यज्ञासेतू धृष्टद्युम्न धृष्टद्युम्न पांडवो की सेना के प्रधानसेनापति के रूप में। thumb|धृष्टद्यूम्न सेनापति के रूप में धृष्टद्युम्न पांचालराज द्रुपद का अग्नि तुल्य तेजस्वी पुत्र। यह पृषत अथवा जंतु राजा का नाती, एवं द्रुपद राजा का पुत्र था। Dronacharya का विनाश करने के लिये, प्रज्त्रलित अग्निकुंड से इसका प्रादुर्भाव हुआ था। फिर उसी वेदी में से द्रौपदी प्रकट हुई थी। अतः इन दोनों को ‘अयोनिसंभव’ एवं इसे द्रौपदी का ‘अग्रज बंधु’ कहा जाता है। अग्नि के अंश से इसका जन्म हुआ था। इसे ‘याज्ञसेनि’, अथवा ‘यज्ञसेनसुत’ भी कहते थे। द्रोण से बदला लेने के लिये, द्रुपद ने याज एवं उपयाज नामक मुनियों के द्वारा एक यज्ञ करवाया। उस यज्ञ के ‘हविष्य’ सिद्ध होते ही, याज ने द्रुपद की रानी सौत्रामणी को, उसका ग्रहण करने के लिये बुलाया। महारानी के आने में जरा देर हुई। फिर याज ने क्रोध से कहा, ‘रानी! इस हविष्य को यज ने तयार किया है, एवं उपयाज ने उसका संस्कार किया है। इस कारण इससे संतान की उत्पत्ति अनिवार्य है। तुम इसे लेने आवो, या न आओ’। इतना कह कर, याज ने उस हविष्य की अग्नि में आहुति दी। फिर उस प्रज्वलित अग्नि से, यह एक तेजस्वी वीरपुरुष के रुपो में प्रकट हुआ। इसके अंगों की कांति अग्निज्वाला के समान तेजस्वी थी। इसके मस्तक पर किरीट, अंगों मे उत्तम कवच, एवं हाथों में खड्ग, बाण एवं धनुष थे। अग्नि से बाहेर आते ही, यह गर्जना करता हुआ एक रथ पर जा चढा मानो कही युद्ध के लिये जा रहा हो। उसी समय, आकाशवाणी हुई, ‘यह कुमार पांचालों का दुःख दूर करेगा। द्रोणवध के लिये इसका अवतार हुआ है, यह आकाशवाणी सुनकर उपस्थित पांचालो को बडी प्रसन्नता हुई। वे ‘साधु, साधु’; कह कर, इसे शाबाशी देने लगे। द्रौपदी स्वयंवर के समय, ‘मत्स्यवेध’ के प्रण की घोषणा द्रुपद ने धृष्टद्युम्न के द्वारा ही करवायी थी स्वयंवर के लिये, पांडव ब्राह्मणो के वेश में आये थे। अर्जुन द्वारा द्रौपदीजीति जाने पर, ‘एक ब्राह्मण ने क्षत्रियकन्या को जीत लिया’, यह बात सारे राजमंडल में फैल गयी। सारा क्षत्रिय राजमंडल क्रुद्ध हो गया। बात युद्ध तक आ गयी। फिर इसने गुप्तरुप से पांडवों के व्यवहार का निरीक्षण किया , एवं सारे राजाओं को विश्वास दिलाया ‘ब्राह्मणरुपधारी व्यक्तियॉं पांडव राजपुत्र है’ । धृष्टद्युम्न अत्यंत पराक्रमी था। इसे द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या सिखाई। महाभारत युद्ध महाभारत युद्ध में यह पांडवपक्ष मे था। प्रथम यह पांडवों की सेना में एक अतिरथी था। इसकी युद्धचपलता देख कर, युधिष्ठिर ने इसे कृष्ण की सलाह से सेनापति बना दिया युद्ध में धृष्टद्युम्न ने बडे ही कौशल्य से अपना उत्तरदायित्व सभाला था। जब कौरव सेना का सेनापति द्रोणाचार्य था, तब भीम ने अश्वत्थामा नामक हाथी को मार कर, किंवदंती फैला दी कि, ‘अश्वत्थामा मृत हो गया’। तब पुत्रवध की वार्ता सत्य मान कर, उद्विग्र मन से द्रोणाचार्य ने शस्त्रसंन्यास किया। तब अच्छा अवसर पा कर, धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य का शिरच्छेद किया धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य का वध कर दिया। यह देख कर सात्यकि ने धृष्टद्युम्न की बहुत भर्त्सना की। तब दोनों में युद्ध छिडने की स्थिति आ गयी। परंतु कृष्ण ने युद्ध टाल दिया। मृत्यु युद्ध की अठारहवे दिन, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने अपने पिता के वध का बदला लेने के लिये, कौरवसेना का सैनापत्य स्वीकार किया। उसी रात को त्वेष एवं क्रोध के कारण पागलसा हो कर, वह पांडवों के शिबिर में सर्वसंहार के हेतु घुस गया। सर्वप्रथम अपने पिता के खूनी धृष्टद्युम्न के निवास में वह गया। उस समय जब वह सो रहा था। अश्वत्थामा ने उसको जगाया और अश्वत्थामा ने कहा, ‘मेरे पिता को निःशस्त्र अवस्था में तुमने हत्या की थी । इसलिये तुम्हारी भी ऐसे ही हत्या होगी। अश्वत्थामा ने ये बोल कर धृष्टद्युम्न को पीटना शुरू कर दिया। उसके बाद उसने धृष्टद्युम्न का सिर धड़ से अलग कर दिया। धृष्टद्युम्न के मरने के बाद उसकी बाकी पत्नियां, जिसमें दो स्त्रियाँ मौजूद है -शाशवती और शशिरेखा ने सती कर ली। २ बाहरी श्रेणी:महाभारत के पात्र