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हज़रत निज़ामुद्दीन
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सूफी संत रेलवे स्टेशन हजरत निजामुद्दीन (रेलवे स्टेशन) दरगाह हजरत निजामुद्दीन (दरगाह)
हज़रत ख्वाजा निज़ामुद्दीन right|250px|thumb| हज़रत ख्वाजा निज़ामुद्दीन dargah in Delhi इस्लाम, सुन्नी इस्लाम, सूफ़ी, चिश्तिया तरीक़ा निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली महबुब-ए-इलाही 1236-1325 फरीद्दुद्दीन गंजशकर (बाबा फरीद) नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी 1238 बदायुं, उत्तर प्रदेश ३ अप्रैल, १३२५ दिल्ली
हजरत निज़ामुद्दीन (حضرت خواجة نظام الدّین اولیا) (1325-1236) चिश्ती घराने के चौथे संत थे। इस सूफी संत ने वैराग्य और सहनशीलता की मिसाल पेश की, कहा जाता है इस प्रकार ये सभी धर्मों के लोगों में लोकप्रिय बन गए। हजरत साहब ने 92 वर्ष की आयु में प्राण त्यागे और उसी वर्ष उनके मकबरे का निर्माण आरंभ हो गया, किंतु इसका नवीनीकरण 1562 तक होता रहा। दक्षिणी दिल्ली में स्थित हजरत निज़ामुद्दीन औलिया का मकबरा सूफी काल की एक पवित्र दरगाह है।
निज़ामुद्दीन औलिया ने, अपने पूर्ववर्तियों की तरह, ईश्वर को महसूस करने के साधन के रूप में प्रेम पर जोर दिया। उनके लिए ईश्वर के प्रति प्रेम का अर्थ मानवता के प्रति प्रेम था। दुनिया के बारे में उनका दृष्टिकोण धार्मिक बहुलवाद और दयालुता की अत्यधिक विकसित भावना से चिह्नित था।भक्ति पोएट्री इन मीडिवल इंडिया, नीती ऍम्. सदरंगनी, पृष्ठ 63 14वीं शताब्दी के इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी का दावा है कि दिल्ली के मुसलमानों पर उनका प्रभाव इतना था कि सांसारिक मामलों के प्रति उनके दृष्टिकोण में एक आदर्श बदलाव आया। लोगों का झुकाव रहस्यवाद और प्रार्थनाओं की ओर होने लगा और वे दुनिया से अलग रहने लगे।Mystical Dimensions of Islam https://archive.org/details/mysticaldimensio00schi registration Annemarie Schimmel Annemarie Schimmel 1975 University of North Carolina Press Chapel Hill 0-8078-1271-4 348Amir Hasan Sijzi, Fawaid-ul-Fuad (Delhi, 1865), pp. 150, 195-97https://www.thehindu.com/features/metroplus/a-heritage-walk-through-three-chisti-shrines-in-new-delhi/article7568849.ece An afternoon with the saints Sudarshana Srinivasan 22 August 2015 The Hindu 3 December 2021 यह भी माना जाता है कि तुग़लक़ राजवंश के संस्थापक गयासुद्दीन तुग़लक़ ने निज़ामुद्दीन से बातचीत की थी। प्रारंभ में, वे अच्छे संबंध साझा करते थे लेकिन जल्द ही इसमें कड़वाहट आ गई और ग़ियास-उद-दीन तुगलक और निज़ामुद्दीन औलिया के बीच मतभेद के कारण संबंध कभी नहीं सुधरे और उनकी दुश्मनी के कारण उस युग के दौरान उनके बीच नियमित झगड़े होते रहे।March 2024
जीवनी
हज़रत ख्वाज़ा निज़ामुद्दीन औलिया का जन्म १२३८ में उत्तरप्रदेश के बदायूँ जिले में हुआ था। ये पाँच वर्ष की उम्र में अपने पिता, अहमद बदायनी, की मॄत्यु के बाद अपनी माताhttp://www.indiainfoweb.com/delhi/mosques/hazrat-nizamuddin-auliya-dargah.html Nizamuddin Auliya 1 अप्रैल 2009 https://web.archive.org/web/20080609034448/http://www.indiainfoweb.com/delhi/mosques/hazrat-nizamuddin-auliya-dargah.html 9 जून 2008 dead , बीबी ज़ुलेखा के साथ दिल्ली में आए। इनकी जीवनी का उल्लेख आइन-ए-अकबरी, एक १६वीं शताब्दी के लिखित प्रमाण में अंकित है, जो कि मुगल सम्राट अकबर के एक नवरत्न मंत्री ने लिखा थाNizamuddin Auliya https://web.archive.org/web/20110727161648/http://persian.packhum.org/persian/main?url=pf%3Ffile=00702015&ct=50&rqs=666 27 जुलाई 2011 आइन-ए-अकबरी, by अबू-अल-फ़ज़्ल इब्न मुबारक, इसका अंग्रेजी अनुवाद “एच. ब्लोक्मैन” और “कर्नल एच.एस.जारेट” ने १८७३-१९०७ में किया। The Asiatic Society of Bengal, Calcutta, Volume III, Saints of India. (Awliyá-i-Hind), page 365. "बहुतों ने उनके निर्देशन में आध्यात्मिक ऊँचाईयों को छुआ जैसे: शेख नसीरुद्दीन मोहम्मद चिरागी दिल्ली,मीर खुसरो, शेख अलॉल हक्क, शेख अखी सिराज, बंगाल में, शेख वजिहूद्दीन यूसुफ़ चँदेरीमें, शेख याकुब और शेख कमाल माल्वाहमें, मौलना घियास धर में, मौलाना मुघिस उजैन में, हुसैन गुजरात में, शेख बर्हानुद्दीन गरीब, शेख मुन्ताखब, ख्वाब हस्सन डेखां में ".
१२६९ में जब निज़ामुद्दीन २० वर्ष के थे, वह अजोधर (जिसे आजकल पाकपट्टन शरीफ, जो कि पाकिस्तान में स्थित है) पहुँचे और सूफी संत फरीद्दुद्दीन गंज-इ-शक्कर के शिष्य बन गये, जिन्हें सामान्यतः बाबा फरीद के नाम से जाना जाता था। निज़ामुद्दीन ने अजोधन को अपना निवास स्थान तो नहीं बनाया पर वहाँ पर अपनी आध्यात्मिक पढाई जारी रखी, साथ ही साथ उन्होंने दिल्ली में सूफी अभ्यास जारी रखा। वह हर वर्ष रमज़ान के महीने में बाबा फरीद के साथ अजोधान में अपना समय बिताते थे। इनके अजोधान के तीसरे दौरे में बाबा फरीद ने इन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, वहाँ से वापसी के साथ ही उन्हें बाबा फरीद के देहान्त की खबर मिली।
right|thumb|चिल्ला निज़ामुद्दीन औलिया, हुमायूँ का मकबरा, दिल्ली के करीब
निज़ामुद्दीन, दिल्ली के पास, ग़यासपुर में बसने से पहले दिल्ली के विभिन्न इलाकों में रहे। ग़यासपुर, दिल्ली के पास, शहर के शोर शराबे और भीड़-भड़क्के से दूर स्थित था। उन्होंने यहाँ अपना एक “खंकाह” बनाया, जहाँ पर विभिन्न समुदाय के लोगों को खाना खिलाया जाता था, “खंकाह” एक ऐसी जगह बन गयी थी जहाँ सभी तरह के लोग चाहे अमीर हों या गरीब, की भीड़ जमा रहती थी।
इनके बहुत से शिष्यों को आध्यात्मिक ऊँचाई की प्राप्त हुई, जिनमें ’ शेख नसीरुद्दीन मोहम्मद चिराग़-ए-दिल्ली”
In The Name Of Faith https://web.archive.org/web/20181110084151/https://timesofindia.indiatimes.com/Opinion/Editorial/In_The_Name_Of_Faith/rssarticleshow/msid-1922531,curpg-2.cms 10 नवंबर 2018 द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया, April 19, 2007.,
“अमीर खुसरो”, जो कि विख्यात विद्या ख्याल/संगीतकार और दिल्ली सलतनत के शाही कवि के नाम से प्रसिद्ध थे।
इनकी मृत्यु ३ अप्रेल १३२५ को हुई। इनकी दरगाह, हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह दिल्ली में स्थित है।Nizamuddin Dargah - Location https://web.archive.org/web/20110826041141/http://www.wikimapia.org/#lat=28.5904003&lon=77.2446585&z=16&l=0&m=a&v=2&show=/369452/%D8%B1%D9%88%D8%B6%D9%87-%D8%AD%D8%B6%D8%B1%D8%AA-%D9%86%D8%B8%D8%A7%D9%85-%D8%A7%D9%84%D8%AF%D9%8A%D9%86-%D9%88-%D8%A7%D9%85%D9%8A%D8%B1-%D8%AE%D8%B3%D8%B1%D9%88Tomb-of-Kh-Nizamuddin-Aulia 26 अगस्त 2011 Wikimapia.
आध्यात्मिक इतिहास
right|250px|thumb| निज़ामुद्दीन औलिया का मकबरा (प्याज गुंबद), जमात खाना मस्जिद (लाल दीवार) और मुगल राजकुमारी जहाँ आरा का मकबरा (बाईं ओर द्वार), सभी हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह में कॉम्प्लेक्स, दिल्ली
वह महज सोलह या सत्रह साल का था जब उसने पहली बार फ़रीदुद्दीन गंजशकर का नाम सुना और उसी समय उसके दिल में प्यार और सम्मान की भावनाएँ पैदा हो गईं। वह अपने शिष्यों को बताते हैं कि उन्हें किसी अन्य सूफी को सुनने या यहां तक कि उनसे मिलने के बाद कभी भी ऐसा महसूस नहीं हुआ। प्यार जलती आग की तरह बढ़ता गया. यदि उनके सहपाठी उनसे कोई काम लेना चाहते थे तो वे बाबा फरीद का नाम लेते थे और उनके नाम पर मांगी गई किसी भी चीज़ को उन्होंने कभी अस्वीकार नहीं किया। अपने पूरे जीवनकाल में उन्होंने किसी और के लिए ऐसा महसूस नहीं किया। 20 साल की उम्र में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वह उनके शिष्य बन गए। उन्होंने अपने जीवनकाल में तीन बार उनसे मुलाकात की।
मुख्य सिद्धांत
अहंकार को नष्ट करके और आत्मा को शुद्ध करके इस जीवन के भीतर ईश्वर को गले लगाने के पारंपरिक सूफी विचारों में विश्वास करने के अलावा, और यह सूफी प्रथाओं से जुड़े महत्वपूर्ण प्रयासों के माध्यम से संभव है, निज़ामुद्दीन ने चिश्ती सूफी के पिछले संतों द्वारा शुरू की गई अनूठी विशेषताओं का भी विस्तार और अभ्यास किया। भारत में ऑर्डर करें. इनमें शामिल हैं:
त्याग और ईश्वर पर पूरा भरोसा रखने पर जोर।
मानव जाति की एकता और सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव का त्याग।
जरूरतमंदों की मदद करना, भूखों को खाना खिलाना और पीड़ितों के प्रति सहानुभूति रखना।
सुल्तानों, राजकुमारों और अमीरों के साथ घुलने-मिलने की सख्त अस्वीकृति।
गरीबों और वंचितों से निकट संपर्क बनाने का उपदेश
सभी प्रकार के राजनीतिक और सामाजिक उत्पीड़न के प्रति समझौता न करने वाला रवैया अपनाना।
समा की अनुमेयता को अपनाना।
तथापि इस रुख पर कायम रहते हुए कि समा केवल तभी स्वीकार्य है जब संगीत वाद्ययंत्र और नृत्य मौजूद नहीं हैं।
रूढ़िवादी सुन्नी मान्यता को मानते हुए कि संगीत वाद्ययंत्र निषिद्ध हैं।
निज़ामुद्दीन ने सूफीवाद के सैद्धांतिक पहलुओं के बारे में ज्यादा चिंता नहीं की, उनका मानना था कि यह व्यावहारिक पहलू थे जो मायने रखते थे, क्योंकि आध्यात्मिक अवस्थाओं या स्टेशनों नामक विविध रहस्यमय अनुभवों का वर्णन करना वैसे भी संभव नहीं था, जिनका एक अभ्यास करने वाले सूफी ने सामना किया था। उन्होंने करामत के प्रदर्शन को हतोत्साहित किया और इस बात पर जोर दिया कि औलिया के लिए करामत की क्षमता को आम लोगों से छिपाना अनिवार्य था। शिष्यों को स्वीकार करने में भी वे काफी उदार थे। आमतौर पर जो भी उनके पास यह कहकर आता था कि वह शिष्य बनना चाहता है, उसे वह कृपा प्रदान की जाती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि वह हमेशा समाज के सभी वर्गों के लोगों से घिरे रहते थे।
वंशावली
हजरत अब्राहिम
2
हज़रत मुहम्मद
हज़रत अली इब्न अबी तालिब
हज़रत सईदना इमाम हुसैन इब्न अली
हज़रत सईदना इमाम अली इब्न हुसैन ज़ैन-उल-आबेदीन
हज़रत सईदना इमाम मोहम्म्द अल-बाक़र
हज़रत सईदना इमाम ज़ाफ़र अल-सादिक़
हज़रत सईदना इमाम मूसा अल-काज़िम
हज़रत सईदना इमाम अली अर-रिदा (असल में, अली मूसा रज़ा)
हज़रत सईदना इमाम मोहम्म्द अल-तक़ी
हज़रत सईदना इमाम अली अल-नक़ी
हज़रत सईदना जाफ़र बुख़ारी
हज़रत सईदना अली अज़गर बुख़ारी
हज़रत सईदना अबी अब्दुल्लाह बुख़ारी
हज़रत सईदना अहमद बुख़ारी
हज़रत सईदना अली बुख़ारी
हज़रत सईदना हुसैन बुख़ारी
हज़रत सईदना अब्दुल्लाह बुख़ारी
हज़रत सईदना अली उर्फ़ दानियल
हज़रत सईदना अहमद बदायनी
हज़रत सईदना सय्यद शाह ख़्वजा निज़ामुद्दीन औलिया
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आध्यात्मिक वंशावली
पैगंबर हज़रत मुहम्मद
अली इब्न अबी तालिब
हसन अल-बसरी
अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद अबुल फ़ाध्ल
फुधैल बिन इयाधबिन मसूद बिन बिशर तमीमी
इब्राहीम बिन अद-हम
हुज़ैफ़ा अल-माराशी
अबु हुबैरा बर्सी
इल्व मुम्शाद दिन्वारी
चिश्ती अनुक्रम का आरंभ
अबू इस-हाक़ शमी
अबू अहमद अब्दल
अबू मुहम्म्द बिन अबी अहमद
अबू यूसुफ़ बिन सामान
मौदूद चिश्ती
शरीफ़ ज़नदनी
उस्मान हरूनी
मौइनुद्दीन चिश्ती
कुत्बुद्दीन बख्तियार काकी
फ़रीदुद्दीन मसूद
निज़ामुद्दीन औलिया
औलिया को मिली उपाधियां
महबूब-ए-इलाही
सुल्तान-उल-मसहायक
दस्तगीर-ए-दोजहां
जग उजियारे
कुतुब-ए-देहली
उर्स
right|250px|thumb|मुगल शाहज़ादी जहां आरा बेगम का मक़्बर (दायें), निज़ामुद्दीन औलिया क मक़्बरा (बायें), जमात खाना मस्जिद (पीछे), निज़ामुद्दीन दर्गाह समूह दिल्ली.
इनका उर्स (परिवाण दिवस) दरगाह पर मनाया जाता है। यह रबी-उल-आखिर की सत्रहवीं तारीख को (हिजरी अनुसार) वार्षिक मनाया जाता है। साथ ही हज़रत अमीर खुसरो का उर्स शव्वाल की अट्ठारहवीं तिथि को होता है।
दरगाह
दरगाह में संगमरमर पत्थर से बना एक छोटा वर्गाकार कक्ष है, इसके संगमरमरी गुंबद पर काले रंग की लकीरें हैं। मकबरा चारों ओर से मदर ऑफ पर्ल केनॉपी और मेहराबों से घिरा है, जो झिलमिलाती चादरों से ढकी रहती हैं। यह इस्लामिक वास्तुकला का एक विशुद्ध उदाहरण है। दरगाह में प्रवेश करते समय सिर और कंधे ढके रखना अनिवार्य है। धार्मिक गात और संगीत इबादत की सूफी परंपरा का अटूट हिस्सा हैं। दरगाह में जाने के लिए सायंकाल 5 से 7 बजे के बीच का समय सर्वश्रेष्ठ है, विशेषकर रविवार को, मुस्लिम अवकाशों और त्यौहार के दिनों में यहां भीड़ रहती है। इन अवसरों पर कव्वाल अपने गायन से श्रद्धालुओं को धार्मिक उन्माद से भर देते हैं। यह दरगाह निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के नजदीक मथुरा रोड से थोड़ी दूरी पर स्थित है। यहां दुकानों पर फूल, लोबान, टोपियां आदि मिल जाती हैं।
वंशज
निज़ामुद्दीन औलिया का एक भाई था जिसका नाम जमालुद्दीन था। उन्होंने उससे कहा, "तुम्हारे वंशज मेरे वंशज होंगे"।खिलवट मैगेजीन ओफ सूफिज्म, प्रकाशन अहमदाबाद, भारत, 2016 सं. 109, पृष्ठ 31-36 पर ओमेर तरीन द्वारा "हजरत निजामुद्दीन ओलिया महबूब ई इलाही एंड थे एस्टैब्लिशमेंट ओएफ थे चिश्ती निजामी सूफी ओर्डर" जमालुद्दीन का एक बेटा था जिसका नाम इब्राहिम था। जमालुद्दीन की मृत्यु के बाद उनका पालन-पोषण निज़ामुद्दीन औलिया ने किया। निज़ामुद्दीन औलिया ने अपने भतीजे को अपने एक शिष्य (खलीफा) अखी सिराज आइने हिंद, जिसे आइना-ए-हिंद के नाम से जाना जाता है, के साथ पूर्वी भारत में बंगाल भेजा। अलाउल हक पांडवी (अशरफ जहांगीर सेमनानी के गुरु (पीर)) उनके शिष्य और खलीफा बन गए। अला-उल-हक पंडवी ने अपनी भाभी (सैयद बदरुद्दीन बद्र-ए-आलम जाहिदी की बहन) से शादी कीसैयद कयामुद्दीन नेज़ामी, (2004), "शरफ़ा की नगरी (खंड 1)", बिहार के सूफियों की जीवनी, "नेज़ामी अकादमी", कराची, पाकिस्तान। पृष्ठ 126 इब्राहिम से। उनका एक बेटा, फ़रीदुद्दीन तवेला बुख़्श था, जो बिहार का एक प्रसिद्ध चिश्ती सूफ़ी बन गया। उनका विवाह अलाउल हक पांडवी की बेटी से हुआ था। वह नूर कुतुब-ए-आलम पड़वी (अलाउल हक पांडवी के सबसे बड़े बेटे और आध्यात्मिक उत्तराधिकारी) के खलीफा बने। उनकी दरगाह चांदपुरा, बिहारशरीफ, बिहार में है। उनके कई वंशज प्रसिद्ध सूफ़ी हैं, जैसे मोइनुद्दीन सानी, नसीरुद्दीन सानी, सुल्तान चिश्ती निज़ामी, बहाउद्दीन चिश्ती निज़ामी, दीवान सैयद शाह अब्दुल वहाब (उनकी दरगाह छोटी तकिया, बिहारशरीफ में है), सुल्तान सानी, अमजद हुसैन चिश्ती निज़ामी, अन्य। उन्होंने चिश्ती निज़ामी आदेश को पूरे उत्तरी भारत में फैलाया। उनके सिलसिले का इजाज़त बिहार के सभी मौजूदा खानकाहों में मौजूद है। उनके वंशज अभी भी बिहार शरीफ में रहते हैं और दुनिया के कई हिस्सों में पाए जा सकते हैं। उस्मान हारूनी के चिल्लाह के वर्तमान सज्जादा नशीन उनके प्रत्यक्ष वंशज हैं। फरीदुद्दीन तवेला बुख़्श ने बेलची, बिहारशरीफ (प्रथम सज्जादा नशीन) में अपने चिल्लाह में उस्मान हारूनी के उर्स का स्मरण (उत्पन्न) किया।
निज़ामुद्दीन औलिया की एक बहन भी थी जिनका नाम बीबी रुकैया था, जिन्हें दिल्ली के अधचिनी गाँव में ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया की माँ बीबी ज़ुलेखा के बगल में दफनाया गया है। निज़ामुद्दीन औलिया ने शादी नहीं की। वह अपने पीर/शेख के पोते, जिसका नाम ख्वाजा मुहम्मद इमाम था, को लाया, जो बीबी फातिमा (बाबा फरीद और बदरुद्दीन इसहाक की बेटी) का बेटा था, जैसा कि सेरुल औलिया की किताब, निज़ामी बंसारी, ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया का जीवन और समय, खलीक द्वारा वर्णित है। अहमद निज़ामी. अभी भी ख्वाजा मुहम्मद इमाम के वंशज दरगाह शरीफ के देखभालकर्ता हैं।February 2024
अमीर खुसरो
अमीर खुसरो
अमीर खुसरो, हज़रत निजामुद्दीन के सबसे प्रसिद्ध शिष्य थे, जिनका प्रथम उर्दू शायर तथा उत्तर भारत में प्रचलित शास्त्रीय संगीत की एक विधा ख्याल के जनक के रूप में सम्मान किया जाता है। खुसरो का लाल पत्थर से बना मकबरा उनके गुरु के मकबरे के सामने ही स्थित है। इसलिए हजरत निज़ामुद्दीन और अमीर खुसरो की बरसी पर दरगाह में दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण उर्स (मेले) आयोजित किए जाते हैं।
चिश्ती निज़ामी आदेश
निज़ामुद्दीन औलिया चिश्ती निज़ामी सिलसिले के संस्थापक थे। उनके सैकड़ों शिष्य (खलीफा) थे, जिन्हें आदेश का प्रसार करने के लिए उनसे इजाज़ा (खिलाफत) प्राप्त था। चिश्ती निज़ामी संप्रदाय के कई सूफ़ी महान सूफ़ी के रूप में पहचाने जाते हैं; निम्नलिखित चिश्ती निज़ामी संप्रदाय के उल्लेखनीय सूफियों की सूची है, जिसमें उनके वंशजों के साथ-साथ उनके शिष्य और उनके बाद के शिष्य भी शामिल हैं:
नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी, अमीर ख़ुसरो, ख्वाजा बंदा नवाज़ गेसुदराज़ मुहम्मद अल-हुसैनी, अलाउल हक पांडवी और नूर कुतुब आलम, पांडुआ, पश्चिम बंगाल; अशरफ जहांगीर सेमनानी, किछौचा, उत्तर प्रदेश; हुसाम अद-दीन मानिकपुरी (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) फकरुद्दीन फकर देहलवी, महरौली, नई दिल्ली; शाह नियाज़ अहमद बरेलवी, बरेली, उत्तर प्रदेश; शफ़रुद्दीन अली अहमद और फ़ख़रुद्दीन अली अहमद, चिराग दिल्ली, नई दिल्ली; ज़ैनुद्दीन शिराज़ी, बुरहानपुर, मध्य प्रदेश; मुहिउद्दीन यूसुफ याह्या मदनी चिश्ती, मदीना; कलीमुल्लाह देहलवी चिश्ती, दिल्ली; निज़ामुद्दीन औरंगाबादी; निज़ामुद्दीन हुसैन, और मिर्ज़ा आग़ा मोहम्मद; मुहम्मद सुलमान तौन्सवी, पाकिस्तान, मोहम्मद मीरा हुसैनी, हेसामुद्दीन मानकपुरी, मियां शाह मोहम्मद शाह, होशियारपुर, पंजाब, भारत, मियां अली मोहम्मद खान, पाकपट्टन, पाकिस्तान। खुवाजा नोमान नैय्यर कुलचवी (खलीफा ए मजाज़) कुलाची, पाकिस्तान, खलीफा उमर तारिन चिश्ती-निजामी इश्क नूरी, कलंदराबाद, पाकिस्तान।
शाखाएं
चिश्ती सिलसिले ने निज़ामुद्दीन औलिया के साथ मिलकर चिश्ती निज़ामी सिलसिले का गठन किया। एक समानांतर शाखा जो बाबा फरीद के एक अन्य शिष्य अलाउद्दीन साबिर कलियरी के साथ शुरू हुई, वह चिश्ती साबिरी शाखा थी। लोग अपने नाम के पीछे शान से निज़ामी जोड़ने लगे। उन्होंने आध्यात्मिक रूप से अपने छात्रों, वंशजों और निज़ामी संप्रदाय के सूफियों के बीच कई महान सूफियों को बनाया।
चिश्ती निज़ामी आदेश की शाखाएँ इस प्रकार हैं:
नसीरिया
उनके शिष्य नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी ने निज़ामिया नसीरिया शाखा शुरू की।
हुसैनिया
हुसैनिया शाखा का नाम सैयद मुहम्मद कमालुद्दीन हुसैनी गिसुदराज़ बंदनवाज़ के नाम पर रखा गया है। वह नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी के सबसे प्रसिद्ध और प्रिय शिष्य थे। उन्होंने कर्नाटक के गुलबर्ग में जो खानकाह स्थापित की, वह आज भी अस्तित्व में है।
फाखरी
"फखरी" शाखा का नाम मुहिब उन नबी मौलाना फख्र उद दीन फख्र ए जहां देहलवी, शाह नियाज बे नियाज के पीर ओ मुर्शिद के नाम पर रखा गया है।
नियाज़िया
19वीं शताब्दी में शाह नियाज़ अहमद बरेलवी ने नियाज़िया शाखा की शुरुआत की।
सेराजिया
निज़ामिया सेराजिया शाखा की शुरुआत सेराजुद्दीन अकी सेराज ने की थी। इस शाखा को चिश्तिया सेराजिया के नाम से भी जाना जाता है।
अशरफिया
चिश्तिया अशरफिया शाखा की शुरुआत अशरफ जहांगीर सेमनानी ने की थी।'Hayate Makhdoom Syed Ashraf Jahangir Semnani(1975), Second Edition(2017) 978-93-85295-54-6, Maktaba Jamia Ltd, Shamshad Market, Aligarh 202002, India. उन्होंने एक खानकाह की स्थापना की, जो किचौचा शरीफ, उत्तर प्रदेश, भारत में अभी भी अस्तित्व में है।
फरीदिया
चिश्तिया सेराजिया फरीदिया सिलसिले की शुरुआत निज़ामुद्दीन औलिया के वंशज और चिश्ती सिलसिले की सेराजिया शाखा के सूफी फरीदुद्दीन तवेलाबुक्श ने की थी। इस शाखा को निज़ामिया सेराजिया फरीदिया के नाम से भी जाना जाता है।
इश्क़-नूरी
मुख्य चिश्ती-निज़ामी की शाखा इश्क नूरी सिलसिले की स्थापना 1960 के दशक में शेख ख्वाजा खालिद महमूद चिश्ती साहब ने लाहौर, पाकिस्तान में की थी। यह इस पारंपरिक सूफी वंश की सबसे समकालीन अभिव्यक्ति है। यह अधिकतर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में पाया जाता है, हालाँकि अब इसके कुछ अनुयायी पश्चिम में भी पाए जाते हैं।
लुत्फ़िया
सिलसिला चिश्तिया-निजामिया-लुतफिया को मौलाना लुत्फुल्लाह शाह दनकौरी ने जारी रखा। इस सिलसिले के अनुयायी पाकिस्तान, भारत, इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में पाए जाते हैं।
इन्हें भी देखें
औलिया
अजमेर शरीफ
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
औलिया-अल्लाह पर वीश्व की सबसे बड़ी साइट
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया- महबूब-ए-इलाही पर जालस्थल
निज़ामुद्दीन औलिया का जीवन
हज़रत ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया., मोइनुद्दीन चिश्ती जालस्थल पर
औलिया, निज़ामुद्दीन
औलिया, निज़ामुद्दीन
श्रेणी:भारतीय सूफ़ी
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श्रेणी:उत्तर प्रदेश के लोग
श्रेणी:बदायुं के लोग
श्रेणी:दिल्ली के लोग
श्रेणी:अरब से भारतीय
श्रेणी:दिल्ली
श्रेणी:मुस्लिम संत
श्रेणी:सूफ़ी
श्रेणी:एशिया में इस्लाम
श्रेणी:भारत में इस्लाम
भारत में इस्लाम