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अब्दुल क़य्यूम अंसारी
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अब्दुल कय्यूम अन्सारी Abdul Qaiyum Ansari 2005 stamp of India.jpg 1 जुलाई 1905 डेहरी-ऑन-सोन, बंगाल प्रेसीडेन्सी 18 जनवरी 1973 (आयु 67) अमियावर, बिहार
श्रेणी:Articles with hCards
अब्दुल क़य्यूम अंसारी (1 जुलाई 1905 - 18 जनवरी 1973) भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सहभागी तथा सामाजिक कार्यकर्ता थे। https://books.google.com/books?id=0iVHBAAAQBAJ Muslim Politics in Bihar: Changing Contours Sajjad Mohammad 2014-08-13 Routledge 978-1-317-55982-5 28 en https://www.heritagetimes.in/abdul-qaiyum-ansari/ Abdul Qaiyum Ansari, who fought not only for independence but also against the social and economic inequalities Ahamed Syed Naseer 2020-07-01 Heritage Times en-US 2023-01-16 वे राष्ट्रीय एकता, धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे। वे मुस्लिम लीग की भारत से अलग मुस्लिम राष्ट्र के निर्माण की मांग का का विरोध करने के लिये भी जाने जाते हैं। श्री अंसारी ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष थे जिसके माध्यम से जिन्ना के दो राष्ट्र सिद्धांत के खिलाफ उन्होंने लड़ाई लड़ी।
जन्म और शिक्षा
उनका जन्म १ जुलाई १९०५ को बिहार के डेहरी-ऑन-सोन में एक धनी मोमिन/अंसारी परिवार में हुआ था। सासाराम और डेहरी-ऑन-सोन हाई स्कूल में अध्ययन करने के बाद, उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में सक्रिय भागीदारी के कारण समय-समय पर उनकी शिक्षा बाधित होती रही।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्रता-पूर्व के कार्यों में भागीदारी
वह बहुत कम उम्र में भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए थे और उसी के एक हिस्से के रूप में उन्होंने अपने गृह नगर में सरकार द्वारा संचालित स्कूल छोड़ दिया था। उन्होंने उन छात्रों के लिए एक राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आह्वान के जवाब में सरकारी स्कूलों का बहिष्कार किया था। इसके लिए उन्हें १६ वर्ष की छोटी उम्र में गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में डाल दिया गया।
एक युवा नेता के रूप में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ मिलकर काम किया और १९२८ में कलकत्ता की यात्रा के दौरान साइमन कमीशन के विरुद्ध छात्रों के आन्दोलन में भी भाग लिया।
वे एक कुशल पत्रकार, लेखक और कवि भी थे। वह स्वतंत्रता पूर्व दिनों में उर्दू साप्ताहिक "अल-इस्लाह" (सुधार) और एक उर्दू मासिक "मुसावत" (समानता) के संपादक थे।
मुस्लिम लीग का विरोध एवं मोमिन आन्दोलन का गठन
उन्होंने मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक नीतियों का विरोध किया। अब्दुल अंसारी भारत को विभाजित करके पाकिस्तान बनाने की मुस्लिम लीग की मांग के ख़िलाफ़ थे। मुस्लिम लीग की अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग का मुकाबला करने के लिए उन्होंने मोमिन आंदोलन शुरू किया। इस बैनर के तहत उन्होंने पिछड़े मोमिन समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुक्ति और उत्थान के लिए काम किया, जो उस समय भारत की मुस्लिम आबादी का कम से कम आधा हिस्सा था। इस लड़ाई में उनके साथ उनके प्रीय मित्र फ़ज़ल करीम अंसारी जो बिहार के गया जिले से थे उन्होंने हर एक फैसले में उनका साथ दिया और और मोमिन तहरीक को कामयाब करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे जीवन भर ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष रहे।
मोमिन आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का समर्थन किया, जिसके बारे में उनका मानना था कि वह एकजुट भारत की आजादी और सामाजिक समानता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की स्थापना और विकास के लिए लड़ रही है। उन्होंने कारीगरों और बुनकर समुदायों के कल्याण और देश के कपड़ा उद्योग में हथकरघा क्षेत्र के विकास के लिए भी काम किया।
उनकी पार्टी ने 1946 का आम चुनाव पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर लड़ा और मुस्लिम लीग के खिलाफ बिहार प्रांतीय विधानसभा में छह सीटें जीतने में कामयाब रही। इस प्रकार वह बिहार केसरी श्री कृष्ण सिंह के मंत्रिमंडल में बिहार के मंत्री बनने वाले पहले मोमिन बने और एक युवा मंत्री के रूप में उन्होंने दोनों दिग्गज बिहार केसरी श्री बाबू और बिहार विभूति अनुग्रह बाबू की प्रशंसा अर्जित की। आख़िरकार उन्होंने मोमिन कॉन्फ्रेंस को एक राजनीतिक संस्था के रूप में भंग कर दिया और इसे एक सामाजिक और आर्थिक संगठन बना दिया। वह लगभग सत्रह वर्षों तक बिहार मंत्रिमंडल में मंत्री रहे और विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों को संभाला और निःस्वार्थ सेवा और ईमानदारी के लिए प्रतिष्ठा बनाते हुए अपनी जिम्मेदारियों का सबसे कुशलता से निर्वहन किया।
स्वतन्त्रता के बाद के प्रयास
अक्टूबर 1947 में कश्मीर पर पाकिस्तान के आक्रमण के दौरान, वह इसकी निंदा करने वाले भारत के पहले मुस्लिम नेता के रूप में आगे आए और भारत के सच्चे नागरिक के रूप में इस तरह के आक्रमणों का मुकाबला करने के लिए मुस्लिम जनता को जागृत करने के लिए कड़ी मेहनत की। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने आज़ाद कश्मीर को "आजाद" कराने के लिए 1957 में इंडियन मुस्लिम यूथ कश्मीर फ्रंट की स्थापना की। सितंबर 1948 के दौरान उन्होंने हैदराबाद में रजाकारों के भारत-विरोधी विद्रोह में भारत सरकार का समर्थन करने के लिए भारतीय मुसलमानों को प्रोत्साहित किया।
अब्दुल कय्यूम अंसारी गरीबों और वंचितों के समर्थक थे। उन्होने शिक्षा और साक्षरता के प्रसार के लिए काम किया। उनकी पहल पर ही 1953 में भारत सरकार द्वारा पहला अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग आयोग नियुक्त किया गया था।
निधन
अब्दुल कय्यूम अंसारी की मृत्यु 18 जनवरी 1973 को हो गयी जब वे बिहार के अमियावर गांव में डेहरी-आरा नहर के ढहने से गांव को हुए नुकसान का निरीक्षण करने और बेघर लोगों के लिए राहत का आयोजन कर रहे थे।
भारत सरकार ने 1 जुलाई 2005 को उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया।
संदर्भ
श्रेणी:१९७३ में निधन
श्रेणी:1905 में जन्मे लोग
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