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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

फुलकारी

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अगस्त 2016 अगस्त 2016 thumb|200px|right|फुलकारी 'फुलकारी एक तरहां की कढाई होती है जो चुनरी /दुपटो पर हाथों से की जाती है। फुलकारी शब्द "फूल" और "कारी" से बना है जिसका मतलब फूलों की कलाकारी। इंडियन कल्चर में पंजाब का योगदान शानदार संगीत, लाजवाब खाने और खूबसूरत रंगों से कहीं ज़्यादा है। पटियाला सलवार सूट और फुलकारी एम्ब्रॉएडरी के बिना इंडियन फैशन बेहद नीरस होता। इस कढ़ाई का जन्म प्राचीन भारत (अब पाकिस्तान) में हुआ था जिसमें बेहद कुशल कारीगरी की ज़रूरत होती है। पारंपरिक कारीगरों ने खूबसूरत फूलों के मोटिफ्स से इस कला को परफेक्ट बना लिया। शुरुआती दौर में फुलकारी हर तरह के कपड़ों पर की जाती थी लेकिन बाद में ये सिर्फ स्कार्व्स और शॉल्स तक ही सीमित हो गई और कभी-कभी शूज़, बेल्ट्स और बैग्स जैसी ऐक्सेसरीज़ पर भी. कला का प्रतीक पुराने समय में बचपन में ही लड़कियां इस कला को सीख लेती थी और अपनी शादी के लिए दहेज बनाने लगती थी। यह लड़की की शख्शीअत की कला का प्रतीक मानी जाती थी। फुलकारी की पारंपरिक किस्में कपड़े की बड़ी वस्तुएं हैं और इसमें चोप, तिलपत्र, नीलक और बाग शामिल हैं। कभी-कभी, बाग को अलग श्रेणी में रखा जाता है, क्योंकि फुलकारी की अन्य किस्मों पर, कपड़े के कुछ हिस्सों देते हैं। जबकि बाग में कढ़ाई पूरे परिधान को कवर करती है। इसके अलावा, समकालीन आधुनिक डिजाइनों में सरल और कम कशीदाकारी दुपट्टे, ओढ़नी और शॉल, फुलकारी के रूप में संदर्भित किए जाते हैं। जबकि कपड़े जो पूरे शरीर को ढकते हैं और शादियों जैसे समारोहों में उपयोग होते हैं, बाग कहलाते हैं। फुलकारी आज भी पंजाबी शादियों का एक अभिन्न हिस्सा है। अतीत में, जैसे ही किसी लड़की का जन्म हो माताओं और दादी बागों और फुलकारियों की कढ़ाई करना शुरू कर देती थी जिन्हें शादी के समय दिया जाना था। परिवार की स्थिति के आधार पर, माता-पिता 11 से 101 बागों और फुलकारियों को दहेज देते थे। ऐतिहासिक रूप से, बागों के लिए उत्तम कढ़ाई पंजाब क्षेत्र के हजारा, पेशावर, सियालकोट, झेलम, रावलपिंडी, मुल्तान, अमृतसर, जालंधर, अंबाला, लुधियाना, नाभा, जींद, फरीदकोट, कपूरथला और चकवाल जिलों में बनाई जाती थी। मूल फुलकारी की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न सिद्धांत हैं। ऐसी ही एक धारणा है कि यह कढ़ाई देश के विभिन्न भागों में 7वीं शताब्दी से प्रचलित थी जहाँ ये लेकिन केवल पंजाब में ही बची रह गई। फुलकारी में पाए जाने वाले मूल भाव बिहार और राजस्थान के कुछ कशीदाकारी में भी पाए जाते हैं। एक और सोच यह है कि कढ़ाई की यह शैली ईरान से आई है जहां इसे गुलकरी कहा जाता था, जिसका अर्थ भी फूल पे कलाकारी है। फुलकारी मूल रूप से घर की महिलाओं द्वारा किए गए घरेलू काम का ही एक उत्पाद था। जिस कपड़े पर फुलकारी की कढ़ाई की जाती थी, वह हाथों से बना खद्दार (सादा-सूती कपड़ा) होता था। कपास पूरे पंजाब के मैदानों में उगाया जाता था और सरल प्रक्रियाओं की एक श्रृंखला के बाद इसे चरखा पर महिलाओं द्वारा धागे में पिरोया जाता था। यार्न बनने के बाद इसे लालारी द्वारा रंगा जाता और जुलाहा द्वारा बुना जाता। प्रयोग शादी और त्यौहार शगुनों के समय लोक दाज में लड़किओं को फुलकारियां के बाग़ देते थे। लांवा फेरे लेने के समय सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ https://web.archive.org/web/20220627053633/http://www.europediawaz.com/index.php?option=com_content&task=view&id=447&Itemid=146 27 जून 2022 अक्तूबर 2022 InternetArchiveBot Tribune of India article on Revival of Phulkari Detailed information of Phulkari on Lokesewa.com Phulkari and Bagh-Embroideries of the Punjab A small article on Phulkari PHULKARI - Ancient Textile of Punjab Founder of Phulkara website श्रेणी:पंजाबी विरासत