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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

शनि देव

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शनिदेव शनि ग्रह के अधिष्ठाता तथा न्याय, कर्म और अनुशासन के हिंदू देवता हैं। वे भगवान सुर्यनारायण तथा देवी छाया के पुत्र हैं। उनके भाई यमराज, बहन यमुना तथा गुरु शिवजी है। शनिदेव ब्रह्मांड के न्यायाधीश है, जो हर व्यक्ति को उसके सत्कर्मों अथवा दुष्कर्मों के अनुसार उसका सुफल अथवा दंड देते है। हिंदू देवता शनि शनिदेव Shani graha.JPG शनि मण्डल ग्रह ॐ शं शनैश्चराय नमः॥ ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:॥श्री शनिदेव का शनि अमावस्या पर पूजन विधि। शनिधाम। अभिगमन तिथि: ३० सितंबर २०१२ नीलादेवी अथवा धामिनी नौ सवारियां: हाथी, घोड़ा, हिरण, गधा, कुत्ता, भैंसा , गिद्ध , शेर और कौआशनिधाम। भगवान शनि का उद्भव शनिवार शनि ग्रह सूर्यदेव छाया यमराज , यमुना , वैवस्वत मनु , सवर्णि मनु , कर्ण , सुग्रीव , रेवन्त , भद्रा , भया , नास्त्य , दस्र , रेवन्त और ताप्ती शनि लिंग यमाग्राज , छायानन्दन , सूर्यपुत्र , काकध्वज आदि। बुध,धर्मपाल शनि जयंती शनिदेव को उनके गुरु भगवान शिव ने सभी जीवो के कर्मफल देने का अधिकारी बनाया था। इसी लिए शनिदेव निष्पक्ष रूप से न्याय करते है, वे अच्छे मनुष्यों को सुख,समृद्धि तथा शांति देते है तथा अत्याचारी,अहंकारी तथा अधर्मी मनुष्यों को सबक सिखाने के लिए उनके जीवनकाल में ही उन्हें भयावह यातनाएं देते हैं जिसे शनि की साढ़ेसाती कहते है। जन्म संज्ञा, सूर्यदेव की पत्नी, सूर्य के तेज को सहन नहीं कर पाती थीं, इसलिए उन्होंने अपनी एक प्रतिकृति छाया को अपना स्थान लेकर सूर्य के पास रहने के लिए नियुक्त किया और स्वयं शिव तपस्या करने चली गईं. सूर्य और छाया के मिलन से शनिदेव जन्म हुआ. शनिदेव का जन्म के समय उनका रंग गहरा काला तथा शरीर कुरूप था, जिसके कारण सूर्यदेव ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया और उन्हें देवलोक से निकाल दिया और उन्होंने छाया का भी अपमानित किया. अपनी मां के अपमान को देखकर शनिदेव ने अपने पिता को अपनी दृष्टि डाली जिसके सुर्यनारायण कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए, जिसके बाद सूर्यदेव ने भगवान शिव से क्षमा याचना की और अपने पूर्व रूप को प्राप्त किया. इस घटना के बाद शनि देव ने न्याय के देवता के रूप में कार्य करना शुरू किया और उन्हें कर्म के अनुसार फल देने का अधिकार मिला. कर्मफलदाता मां के प्रति अपने पिता सूर्य देव के व्यवहार से शनिदेव कुंठित रहते थे। इसके लिए शनिदेव सूर्य देव को अपना शत्रु मानते थे। उस समय शनिदेव ने ग्रहों में उच्च स्थान प्राप्त करने का प्रण लिया। मां छाया की तरह शनिदेव के सच्चे शिवभक्त बनें। शनिदेव को शिवभक्ति माता जी से विरासत में मिली। शनिदेव ने ग्रहों में सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने के लिए भगवान शिव की कठिन तपस्या की। इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें न्याय करने का अधिकार दिया। इसके साथ ही शिवजी ने शनिदेव को मोक्ष प्रदान करने का भी वरदान दिया। इस वरदान को पाकर शनिदेव को ग्रहों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ साथ ही न्याय करने का अधिकार मिला। शनि की साढ़ेसाती तथा महादशा शनि साढ़े साती वैदिक ज्योतिष में शनि देव के साढ़े सात वर्ष तक चलने वाले गोचर को कहते हैं, जिसमें व्यक्ति के वर्तमान, पिछली और अगली राशि पर शनि का प्रभाव पड़ता है. यह अवधि 7.5 साल की होती है और 3 चरणों में बंटी होती है, जिसमें हर चरण 2.5 साल का होता है. साढ़े साती को शनि का कर्मों के आधार पर फल देने का समय माना जाता है, जिसमें व्यक्ति को अनुशासन सिखाया जाता है और यह जीवन में परिवर्तन और चुनौतियों का दौर होता है. शुरुआती दौर में व्यक्ति को मानसिक कष्ट हो सकते हैं, और दूसरे चरण में शारीरिक या आर्थिक समस्याएं आ सकती हैं. यह समय शनि देव द्वारा व्यक्ति को जीवन की महत्वपूर्ण सीख और अनुशासन सिखाने का होता है. यदि व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, तो वह इस अवधि में शनिदेव उसे अभूतपूर्व सफलता और उन्नति भी प्रदान करते है। शनि की महादशा शनि महादशा ज्योतिष में लगभग 19 वर्षों तक चलने वाली एक महत्वपूर्ण अवधि है, जो आपके जीवन के कर्म, रिश्तों, स्वास्थ्य, वित्त और करियर पर गहरा प्रभाव डालती है. यह समय व्यक्तिगत विकास और चुनौतियों का हो सकता है, जहाँ व्यक्ति के अच्छे कर्मों का अच्छा और बुरे कर्मों का बुरा फल मिलता है. यह समय शनि देव द्वारा व्यक्ति को जीवन की महत्वपूर्ण सीख और अनुशासन सिखाने का होता है. यदि व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, तो वह इस अवधि में सफलता और उन्नति भी प्राप्त कर सकता है. शनि देव कर्मों के अनुसार फल देते हैं; अच्छे कर्म करने वालों को सफलता और बुरे कर्म करने वालों को कठिनाइयों और बर्बादी का सामना करना पड़ता है. शनिदेव की पूजाविधि सनातन शास्त्रों में निहित है कि शनिदेव के शरण में रहने वाले साधकों को अपने जीवन काल में तो सब सुखों की प्राप्ति होती है। मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः शनिदेव को मोक्ष प्रदाता भी कहा जाता है। शनिदेव को मोक्ष प्रदाता का वरदान भगवान शिव से प्राप्त हुआ है। शनिदेव को प्रसन्न करने के उपाय बहुत सरल हैं। पीपल के वृक्ष में शनिदेव का वास है, इसी लिए पीपल वृक्ष को जल चढ़ाने से, उसकी तीन प्रदक्षिणा करने से ही शनि प्रसन्न हो जाते हैं। शनिवार के दिन संध्याकाल में स्नान करने के बाद शनिदेव की मूर्ति/चित्रप्रतिमा के सामने सरसों के तेल का दिया प्रज्वलित करना चाहिए। फिर उनके सामने सच्चे हृदय से शनि चालीसा अथवा " ॐ शं शनैश्चराय नमः" मंत्र का जाप करना चाहिए। इसके बाद शनि देव को प्रसन्न करने के लिए काले चने, तिल के लड्डू, काली उड़द की दाल की खिचड़ी, गुड़-चना अथवा सरसों के तेल से बनी पूड़ी (गुलगुले) का भोग लगाया जा सकता है। अगर कुछ न हो सके तो काले उड़द की खिचड़ी, अथवा गुड अर्पित करने मात्र से शनि प्रसन्न होते हैं।इन सभी भोगों को लोहे के बर्तन में अर्पित करना चाहिए, जिसमें लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं होता। असहाय गरीबों, बुजुर्गों, जानवरों, अपंग लोगों की मदद करें और उन्हें भोजन कराएं. महिलाओं का अपमान न करें और हर प्राणी से प्रेमभाव तथा करुणाभाव रखें. शनिवार को तामसिक भोजन का सेवन न करें. शनि परिश्रम के कारक हैं, इसलिए कर्मयोगी बनें और परिश्रम करते रहें. संदर्भ श्रेणी:हिन्दू देवता